Mohar Singh Monu

Mohar Singh Monu जय भीम

07/04/2025

16/02/2025

*💐 स्वाभिमानी बुजुर्ग 💐*

बेटा गाड़ी साफ कर दूं ? रंजीत ने जैसे ही फ्यूल भरवाने के लिए अपनी कार को पेट्रोल पंप पर रोकी एक बुजुर्ग भागकर उसकी गाड़ी के करीब आया ,*नहीं अंकल अभी जल्दी में हूँ।*
कहते हुए रंजीत ने उस बुजुर्ग को टालना चाहा लेकिन वह उससे विनती करने लगा -

*बेटा दस मिनट भी नहीं लगेंगे !थोड़ा ठहर जाओ मैंने आज सुबह से अभी तक कुछ नहीं खाया है।दस - बीस रुपये दे देना बस !*

रंजीत को दया आ गई। *अंकल मैं आपको कुछ रुपये दे देता हूंँ। आप कुछ खा लीजियेगा।* यह कह रंजीत ने जेब से बटुआ निकाल लिया , लेकिन बुजुर्ग ने यह कहते हुए रुपये लेने से इंकार कर दिया कि *बेटा ! मैं भीख नहीं लेता ?*

*अंकल यह भीख नहीं है। आप मेरे पिता के समान हैं , लेकिन आपने सुबह से कुछ नहीं खाया है , इसलिये मैं आपको कुछ रुपये देना चाहता हूंँ।*

नहीं बेटा , आप जाइये , मैं इंतजार करूंगा। आप नहीं तो कोई और सही ?

यह कहते हुए वह बुजुर्ग वापस मुड़ गया। *उसका आत्मसम्मान और स्वाभिमान देख रंजीत हैरान हो गया।* वह बुजुर्ग उसे कोई आम इंसान नहीं लगा , इसलिए रंजीत अपनी कार छोड़ उस बुजुर्ग के पीछे आया।

अंकल ! क्या मैं आपसे दो मिनट बात कर सकता हूंँ ?

बोलो बेटा ?

आप कहां रहते हो ?

यहीं !

यहां कहां ?

*यह पेट्रोल पंप ही मेरा ठिकाना है। मैं यहीं रहता हूंँ।*

आपका कोई घर-द्वार ?

*घर था , लेकिन अब नहीं रहा ?*

मैं कुछ समझा नहीं अंकल ?

बच्चों को पढ़ाने और लायक बनाने के चक्कर में मैंने अपना घर बेचकर सब कुछ बच्चों की पढ़ाई में लगा दिया।

अब आपके बच्चे कहां रहते हैं ?

*एक विदेश में है और दूसरा इसी शहर में ?*

आप उनके साथ क्यों नहीं रहते ?

*उनके घर में मेरे रहने लायक कोई जगह नहीं है ?*

क्यों ?

मेरा एक बेटा इसी शहर में डॉक्टर है।साठ हजार किराये के बंगले में रहता है। पच्चीस लाख की गाड़ी से चलता है , लेकिन मेरे लिये उसके पास कुछ नहीं है। यह कहते-कहते उस बुजुर्ग की आंखों में आंसू छलक आये ?

*अंकल आप अपने बच्चों पर आपको गुजारा भत्ता देने के लिये मुकदमा दायर क्यों नहीं करते ?*
आपने ही अपना सब कुछ देकर उन्हें कमाने लायक बनाया है।

बुजुर्ग मुस्कुराया !! *मैंने उनकी परवरिश पर जो भी खर्च किया , वह सब अपनी मर्जी से किया था। अगर मैं वह सब कुछ उन पर मुकदमा करके मांग भी लूं , तो उन सब चीजों का अब मैं करूंगा क्या ?*

फिर भी आपको उनसे कुछ ना कुछ तो मिलना ही चाहिये ?

बेटा दो रोटी तो मैं अपनी मेहनत से आज भी कमा लेता हूंँ।

*रही बात मुकदमे की , तो अदालत में मुकदमा दायर कर बच्चों के प्रति स्नेह और माता-पिता के प्रति सम्मान नहीं मांगा जा सकता ?*

रंजीत नतमस्तक हो गया , लेकिन फिर उसने अपनी बात को मोड़ दिया.....अंकल अब मैं इतनी देर ठहर ही गया हूंँ तो आप मेरी कार पर जमी धूल साफ कर दीजिये।

वह बुजुर्ग अपने हाथ में थामे साफे से झटपट उसकी कार पर जमी धूल को साफ करने लगा , लेकिन उसकी जिंदगी पर जमी धूल को साफ करने में असमर्थ रंजीत मन ही मन सोच रहा था कि ......

*एक अकेले गरीब माता - पिता अपने बच्चों को लायक बनाने की हिम्मत रखते हैं , लेकिन जवान होने पर वही बच्चे सक्षम होने के बावजूद अपने बुजुर्ग हो चुके माता-पिता को संभालने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाते ?*

तभी रंजीत ने कहा अंकल मेरा गाड़ियों का शोरूम है , आप चाहें तो वहाँ गाड़ियों की देखभाल का काम कर सकते हैं।

बुजुर्ग के हाथ रुक गये , वह मुस्कुराये। और उन्होंने कहा कि *बेटा आप बहुत दयालु हो , लेकिन मुझे किसी की दया की जरूरत नहीं है।*
रंजीत ने आगे बढ़कर उस बुजुर्ग का हाथ अपने हाथों में लेकर उसे आश्वस्त किया कि अंकल वहाँ भी आपको आपकी मेहनत के बदले ही रुपये मिलेंगे।

एक अजनबी से इतनी आत्मीयता पाकर उस बुजुर्ग के चेहरे पर गजब का स्वाभिमान था।

सीख : *आज की पीढ़ी भौतिकता के चकाचौंध में अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रही है , क्योंकि मैकाले की शिक्षा पद्धति भाव-संवेदना शून्य भोगवादी फसल तैयार करती है।*

09/02/2025

*कलयुगी श्रवण*

संडे स्पेशल कहानी

मां कुंभ नहाने चलोगी ? मां तुम काफी दिन से कह रही थीं कि मुझे गंगा नहला ला , इस बार मैं तुम्हें नहला लाता हूं। आज ट्रेन का टिकट करा लिया है। ’’

यह सुन कर गोमती चहक उठी , ‘‘तू सच कह रहा है श्रवण , मुझे यकीन नहीं हो रहा ?’’

‘‘यकीन करो मां , ये देखो टिकटें ,’’ श्रवण ने जेब से टिकटें निकालकर गोमती को दिखाईं और बोला, ‘‘अब जाने की तैयारी कर लेना , जो - जो सामान चाहिये बता देना। अगले हफ्ते आज के ही दिन चलेंगे।’’

‘‘कौन - कौन चलेगा बेटा ? सभी चल रहे हैं न ?’’

‘‘नहीं मां , सब जा कर क्या करेंगे ? कुंभ पर बहुत भीड़ रहती है। सबको संभालना मुश्किल होगा। बस हम दोनों ही चलेंगे ?’’

गोमती ने श्वेता की ओर देखा। उनके अकेले जाने से कहीं बहू नाराज न हो जाये ? उन्हें लगा कि इतनी उम्र में अकेली बेटे के साथ कैसे जायेंगी ? श्रवण कैसे संभालेगा उन्हें ? घर में तो जैसे - तैसे अपना काम कर लेती हैं , बाहर कै से उठेंगी - बैठेंगी ? घड़ी - घड़ी श्रवण का सहारा मांगेंगी। फिर कहीं सब के सामने ही श्रवण झल्लाने लगा तो ? दुविधा हुई उन्हें ?

‘‘अब क्या सोचने लगीं, मांजी ? आप के बेटे कह रहे हैं तो घूम आइये ? हम सब तो फिर कभी चले जायेंगे। इसके बाद पूरे 12 साल बाद ही कुंभ पडे़गा।’’

‘‘बहू क्या श्रवण मुझे संभाल पायेगा ?’’ गोमती ने अपना संशय सामने रखा तो श्रवण हंस पड़ा।

‘‘मां को अब अपने बेटे पर विश्वास नहीं है। *जैसे आप बचपन में मेरा ध्यान रखती थीं , वैसे ही मैं भी रखूंगा। कहीं भी आप का हाथ नहीं छोडूंगा।* खूब मेला घुमाऊंगा। ’’

श्रवण की बात पर गोमती प्रसन्न हो गईं। उन की चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूरी होने जा रही थी। वह कबसे कुंभ स्नान कर मोक्ष पाने की कामना कर रही थीं। वे कई बार श्रवण से कह चुकी थीं कि मरने से पहले एक बार कुंभ स्नान करना चाहती हैं। कुंभ पर नहीं ले जा सकता तो ऐसे ही हरिद्वार ले चल। वक्त खिसकता रहा , बात टलती रही। अब जब श्रवण अपने आप कह रहा है तो उनका मन प्रसन्नता से नाचने लगा। उन्होंने बहू - बेटे को आशीर्वाद से लाद दिया।

1 रात 1 दिन का सफर तय कर मां बेटा दोनों इलाहाबाद पहुंचे। गोमती का तो सफर में ही बुरा हाल हो गया। ट्रेन के धड़धड़ के शोर और सीटी ने रात भर गोमती को सोने नहीं दिया।श्रवण का हाथ थामे वह बार बार टायलेट जाती रहीं। ट्रेन खिसकने लगती तो पांव डगमगाने लगते। गिरती पड़ती सीट तक पहुंचतीं।

‘‘अभी सफर शुरू हुआ है मां, आगे कैसे करोगी , संभालो स्वयं को ?’’

‘‘संभाल रही हूं बेटा , पर इस बुढ़ापे में हाथ पांव झूलर बने रहते हैं। पकड़ ढीली पड़ जाती है। इस का इलाज मुझ पर नहीं है। ’’ वह बेबस सी हो जातीं।

‘‘कोई बात नहीं , मैं हूं न , सब संभाल लूंगा।’’ श्रवण उनकी बेबसी को समझता।

खैर सोते जागते गोमती का सफर पूरा हुआ। गाड़ी इलाहाबाद स्टेशन पर रुकी तो प्लेटफार्म की चहल पहल और भीड़ देखकर वह हैरान रह गईं। श्रवण ने अपने कंधे पर बैग टांग लिया और एक हाथ से मां का हाथ पकड़ कर स्टेशन से बाहर आ गया।

शहर आकर श्रवण ने देखा कि आकाश में घटायें घुमड़ रही थीं। यह सोचकर कि क्या पता कब बादल बरसने लगें , उसने थोड़ी देर स्टेशन पर ही रुकने का फैसला किया। मां के साथ वह वेटिंग रूम में जा कर बैठ गया। थोड़ी देर बाद मां से बोला , ‘‘मां , नित्यकर्म से यहीं निबट लो। जब तक बारिश नहीं रुकती है , तब तक हम आराम से यहीं रुकेंगे। पहले आप चली जाओ ,’’ और उसने इशारे से मां को बता दिया कि कहां जाना है। थोड़ी देर में गोमती लौट आईं। फिर श्रवण चला गया। श्रवण जब लौटा तो उस के हाथ में गरमागरम चाय के 2 कुल्हड़ और एक थैली में समोसे थे। मां बेटे ने चाय पी और समोसे खाये। थोड़ा आराम मिला तो गोमती की आंखें झपकने लगीं। पूरी रात आंखों में कटी थी। गोमती ने वहीं सोफे की टेक लेकर आंखें मूंद लीं।

करीब घंटे भर बाद सूरज फिर से झांकने लगा। वर्षा के कारण स्टेशन पर भीड़ बढ़ गई थी। अब धीरे धीरे छंटने लगी। गोमती और श्रवण ने भी आटो रिक्शा पकड़कर गंगाघाट तक पहुंचने का मन बनाया।

आटो रिक्शा ने मेलाक्षेत्र शुरू होते ही उन्हें उतार दिया। करीब 1 किलोमीटर पैदल चलकर वे गंगाघाट तक पहुंचे। गिरते पड़ते बड़ी मुश्किल से एक डेरे में थोड़ा सा स्थान मिला। दोनों ने चादर बिछाकर अपना सामान जमाया और नहाने चल दिये।

गोमती ने अपने अब तक के जीवन में इतनी भीड़ नहीं देखी थी। कहीं लाउडस्पीकरों का शोर , कहीं भजन गाती टोलियां , कहीं साधु संतों के प्रवचन, कहीं रामायण पाठ , खिलौने वाले , झूले वाले , पूरी कचौरी , चाट व मिठाई की दुकानें , धार्मिक किताबों , तसवीरों , मालाओं व सिंदूर की दुकानें , हर जाति धर्म के लोगों को देख देखकर गोमती चकित थीं। लगता था किसी दूसरे लोक में आ गई हैं। *वह श्रवण का हाथ कसकर थामे थीं।*

भीड़ में रास्ता बनाता श्रवण उन्हें गंगा किनारे तक ले आया। यहां भी खूब भीड़ और धक्कम धक्का था। श्रवण ने हाथ पकड़कर मां को स्नान कराया , फिर स्वयं किया। गोमती ने फूल बताशे गंगा में चढ़ाये। जाने कब से मन में पली साध पूरी हुई थी।हर्षातिरेक में आंसू निकल पडे़। *गोमती ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि हे गंगा मैया श्रवण सा बेटा हर मां को देना। आज उसी के कारण तुम्हारे दर्शन कर सकी हूं।*

श्रवण ने मां को मेला घुमाया। खूब खिलाया पिलाया।

‘‘थक गई हूं , अब नहीं चला जाता श्रवण ?’’ गोमती के कहने पर श्रवण उन्हें डेरे पर ले आया।

‘‘मां तुम आराम करो। मैं घूमकर अभी आया। थोड़े रुपये अपने पास रख लो ,’’ उसने मां को रुपये थमाये।

‘‘मैं इन रुपयों का क्या करूंगी ? तू है तो मेरे पास। फिर 5-10 रुपये हैं मेरे पास ,’’ गोमती ने मना किया।

‘‘वक्त बेवक्त काम आयेंगे। तुम्हारा ही कुछ लेने का मन हो या कहीं मेले में मेरी जेब ही कट जाये तो…?’’ श्रवण के समझाने पर गोमती ने रुपये ले लिये। गोमती ने रुपये संभालकर रख लिये। उन्हें ध्यान आया कि ऐसे मेलों में चोर- उचक्के खूब घूमते हैं। लोगों को बेवकूफ बनाकर हाथ की सफाई दिखाकर खूब ठगते हैं।

श्रवण चला गया और गोमती थैला सिर के नीचे लगा बिछी चादर पर लेट गई। उन का मन आह्लादित था। श्रवण ने खूब ध्यान रखा है। लेटे लेटे आंखें झपक गईं। *जब आँखें खुलीं तो देखा कि सूरज ढलने जा रहा है लेकिन श्रवण अभी लौटा नहीं है ?*

उन्हें चिंता हो आई। अनजान जगह , अजनबी लोग , श्रवण के बारे में किस से पूछें ? अपना थैला टटोल कर देखा। सब- कुछ यथास्थान सुरक्षित था। कुछ रुपये एक रूमाल में बांधकर चुपचाप कपड़ों के साथ थैले में डाल लाई थीं। सोचा था पता नहीं परदेश में कहां जरूरत पड़ जाये ? उसी रूमाल में श्रवण के दिये रुपये भी रख लिये।

वह डेरे से बाहर आकर इधर उधर देखने लगीं। आदमियों का रेला एक तरफ तेजी से भागने लगा। वह कुछ समझ पातीं कि चीखपुकार मच गई। पता लगा कि मेले में हाथी बिगड़ जाने से भगदड़ मच गई है। काफी लोग भगदड़ में गिरने के कारण कुचलकर मर गये हैं।

यह सुनकर गोमती का कलेजा मुंह को आने लगा। कहीं उनका श्रवण भी क्या इसी कारण अभी तक नहीं आया है ? उन्होंने एक यात्री के पास जाकर पूछा ‘‘भैया यह किस समय की बात है ?’’

‘‘मां जी , शाम 4 बजे नागा साधु हाथियों पर बैठकर स्नान करने जा रहे थे और पैसे फेंकते जा रहे थे। उनके फेंके पैसों को लूटने के कारण यह कांड हुआ है। जो जख्मी हैं उन्हें अस्पताल पहुंचाया जा रहा है और जो मर गये हैं उन्हें जेसीबी से वहां से हटाया जा रहा है। आपका भी कोई है क्या ?’’

‘‘भैया मेरा बेटा 2 बजे घूमने निकला था और अभी तक नहीं लौटा है।’’

‘‘उसका कोई फोटो है मांजी’’ , यात्री ने पूछा ?

‘‘फोटो तो नहीं है। अब क्या करूं’’ , गोमती रोने लगीं ?

‘‘मां जी आप रोओ मत। देखो सामने पुलिस चौकी है। आप वहां जाकर पता करो। ’’

गोमती ने चादर समेटकर थैले में रखी और पुलिस चौकी पहुंच कर रोने लगीं। लाउडस्पीकर से कई बार एनाउंस कराया गया। फिर एक सहृदय सिपाही अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर गोमती को वहां ले गया जहां मृतकों को एक साथ रखा गया था। 1-2 अस्थायी बने अस्पतालों में भी ले गया , जहां जख्मी पड़े लोग कराह रहे थे और डाक्टर उनकी मरहमपट्टी करने में जुटे थे। श्रवण का वहां भी कहीं पता न था। तभी गोमती को ध्यान आया कि कहीं श्रवण डेरे पर लौट न आया हो और उनका इंतजार कर रहा हो या उन्हें डेरे पर न पाकर वह भी उन्हीं की तरह तलाश कर रहा हो। हालांकि पुलिस चौकी पर वह अपने बेटे का हुलिया बता आई थीं और लौटने तक रोके रखने को भी कह आई थीं।

गोमती ने आकर मालूम किया तो पता चला कि उन्हें पूछने कोई नहीं आया था। वह डेरे पर गईं , वहां भी नहीं ?आधी रात कभी डेरे में , कभी पुलिस चौकी पर कटी। जब रात के 12 बज गये तो पुलिस वालों ने कहा , ‘‘मां जी , आप डेरे पर जाकर आराम करो। आप का बेटा यहां पूछने आया तो आप के पास भेज देंगे ?’’

पुत्र के लिये व्याकुल गोमती उसे खोजते हुये डेरे पर लौट आईं। चादर बिछाकर लेट गईं लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी। कहां चला गया श्रवण ? इस कुंभ नगरी में मैं कहां ढूंढूंगी उसे ? यहां उनका अपना है कौन ? *यदि श्रवण न मिला तो अकेली घर कैसे लौटेंगी ? बहू का सामना कैसे करेंगी ?* वे खुद को ही कोसने लगीं। व्यर्थ ही कुंभ नहाने की जिद कर बैठी। टिकट ही तो लाया था श्रवण , यदि मना कर देती तो टिकट वापस भी हो जाते , ऐसी फजीहत तो न होती ?

फिर गोमती को खयाल आया कि कोई श्रवण को बहला फुसलाकर तो नहीं ले गया। वह है भी सीधा। आसानी से दूसरों की बातों में आ जाता है। किसी ने कुछ सुंघाकर बेहोश ही कर दिया हो और सारे पैसे व घड़ी अंगूठी छीन ली हो। मन में उठने वाली शंका कुशंकाओं का अंत न था ?

दिन निकला। वह नहाना धोना सब भूलकर सीधी पुलिस चौकी पहुंच गईं। एक ही दिन में पुलिस चौकी वाले उन्हें पहचान गये थे। देखते ही बोले , ‘‘मांजी तुम्हारा बेटा नहीं लौटा ?’’

रोने लगीं गोमती , ‘‘कहां ढूंढू़ं , तुम्हीं बताओ ? किसी ने मारकाट कर कहीं डाल दिया हो तो ? तुम्हीं ढूंढ़कर लाओ ’’ गोमती का रोते रोते बुरा हाल हो गया।

‘‘अम्मां , धीरज धरो , हम जरूर कुछ करेंगे ? सभी डेरों पर एनाउंस करायेंगे। आपका बेटा मेले में कहीं भी होगा , जरूर आप तक पहुंचेगा। आप अपना नाम और पता लिखा दो। अब जाओ स्नान ध्यान करो।’’ पुलिस वालों को भी गोमती से हमदर्दी हो गई थी।

गोमती डेरे पर लौट आईं। गिरती पड़ती गंगा भी नहा लीं और मन ही मन प्रार्थना की कि हे गंगा मैया , मेरा श्रवण जहां कहीं भी हो कुशल से हो , और वहीं घाट पर बैठ कर हर आने जाने वाले को गौर से देखने लगीं। उन की निगाहें दूर दूर तक आने जाने वालों का पीछा करतीं। कहीं श्रवण आता दीख जाये। गंगाघाट पर बैठे सुबह से दोपहर हो गई। कल शाम से पेट में पानी की बूंद भी न गई थी। ऐंठन सी होने लगी। *उन्हें ध्यान आया कि यदि वे यहां स्वयं ही बीमार पड़ गईं तो अपने श्रवण को कैसे ढूंढ़ेंगी ?* उसे ढूंढ़ना है तो स्वयं को ठीक रखना होगा। यहां कौन है जो उन्हें मनुहार कर खिलायेगा ?

गोमती ने आलू की सब्जी के साथ 4 पूरियां खाईं। गंगाजल पिया तो थोड़ी शांति मिली। 4 पूरियां शाम के लिये यह सोच कर बंधवा लीं कि यहां तक न आ सकीं तो डेरे में ही खा लेंगी या भूखा श्रवण लौटेगा तो उसे खिला देंगी ? श्रवण का ध्यान आते ही उन्होंने कुछ केले भी खरीद लिये।ढूंढ़ती ढूंढ़ती अपने डेरे पर पहुंच गईं। पुलिस चौकी में भी झांक आईं।

देखते ही देखते 8 दिन निकल गये। मेला उखड़ने लगा लेकिन श्रवण नहीं लौटा ? अब पुलिस वालों ने सलाह दी ‘‘अम्मां , अपने घर लौट जाओ। लगता है आपका बेटा अब नहीं लौटेगा ?’’

‘‘मैं इतनी दूर अपने घर कैसे जाऊंगी। मैं तो अकेली कहीं आई गई नहीं ,’’ वह फिर रोने लगीं।

‘‘अच्छा अम्मां , अपने घर का फोन नंबर बताओ। घर से कोई आकर ले जायेगा ,’’ पुलिस वालों ने पूछा ?

‘‘घर से मुझे लेने कौन आयेगा ? अकेली बहू , बच्चों को छोड़कर कैसे आयेगी ?’’

‘‘बहू किसी नाते रिश्तेदार को भेजकर बुलवा लेगी। आप किसी का भी नंबर बताओ ?’’

गोमती ने अपने दिमाग पर लाख जोर दिया , लेकिन हड़बड़ाहट में किसी का नंबर याद नहीं आया। दुख और परेशानी के चलते दिमाग में सभी नंबर गड्डमड्ड हो गये। वह अपनी बेबसी पर फिर रोेने लगीं। बुढ़ापे में याददाश्त भी कमजोर हो जाती है।

पुलिस चौकी में उन्हें रोता देख राह चलता एक यात्री ठिठका और पुलिस वालों से उनके रोने का कारण पूछने लगा ? पुलिस वालों से सारी बात सुनकर वह यात्री बोला , ‘‘आप इस वृद्धा को मेरे साथ भेज दीजिये। मैं भी उधर का ही रहने वाला हूं। आज शाम 4 बजे की ट्रेन से जाऊंगा। इन्हें ट्रेन से उतारकर बस में बिठा दूंगा। यह आराम से अपने गांव पीपला पहुंच जायेंगी। ’’

सिपाहियों ने गोमती को उस अनजान व्यक्ति के साथ कर दिया और उस व्यक्ति का पता और फोन नंबर अपनी डायरी में लिख लिया। गोमती उसके साथ चल तो रही थीं , पर मन ही मन डर भी रही थीं कि कहीं यह कोई ठग न हो ? पर कहीं न कहीं किसी पर तो भरोसा करना ही पड़ेगा , वरना इस निर्जन में वह कब तक रहेंगी ?

‘‘मां जी , आप डरें नहीं , मेरा नाम बिट्ठन लाल है। लोग मुझे बिट्ठू कह कर पुकारते हैं। राजकोट में बिट्ठन लाल हलवाई के नाम से मेरी दुकान है। आप अपने गांव पहुंचकर किसी से भी पूछ लेना। भरोसा रखो आप मुझ पर। यदि आप कहेंगी तो मैं आपको घर तक छोड़ आऊंगा। *यह संसार एक दूसरे का हाथ पकड़कर ही तो चल रहा है।’’*

अब मुंह खोला गोमती ने , ‘‘भैया , विश्वास के सहारे ही तो तुम्हारे साथ आई हूं। इतना उपकार ही क्या कम है कि तुम मुझे अपने साथ ले लाये हो ? तुम मुझे बस में बिठा दोगे तो पीपला पहुंच जाऊंगी , पर बेटे के न मिलने का गम मुझे खाये जा रहा है ?’’

अगले दिन लगभग 1 बजे गोमती बस से अपने गांव के स्टैंड पर उतरीं और पैदल ही अपने घर की ओर चल दीं। उनके पैर मन मन भर के हो रहे थे।उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा था कि बहू से कैसे मिलेंगी ? इसी सोच विचार में वह अपने घर के द्वार तक पहुंच गईं। वहां खूब चहल पहल थी। घर के आगे कनात लगी थीं और खाना चल रहा था। एक बार तो उन्हें लगा कि वह गलत जगह आ गई हैं। *तभी पोते तन्मय की नजर उन पर पड़ी तो वह खुशी से चिल्लाया , ‘‘पापा , दादी मां लौट आईं। दादी मां जिंदा हैं ?’’*

उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर सब दौड़ कर बाहर आये। शोर मच गया , ‘अम्मां आ गईं ,’ ‘गोमती आ गई , श्रवण भी दौड़कर आ गया और मां से लिपटकर बोला, ‘‘तुम कहां चली गई थीं मां , मैं तुम्हें ढूंढ़कर थक गया ?’’

बहू श्वेता भी दौड़कर गोमती से लिपट गई और बोली, ‘‘हाय हम ने सोचा था कि…..............?

*‘‘मांजी नहीं रहीं , यही न बहू , ‘‘इसीलिये आज अपनी सास की तेरहवीं कर रही हो और तू श्रवण मुझे छोड़कर यहां चला आया ?* मैं तो पगला गई थी। घाट घाट तुझे ढूंढ़ती रही। तू सकुशल है। तुझे देखकर मेरी जान लौट आई है।’’

*बेटे और बहू की निगाहें मां से टकराईं और नीचे झुक गईं ?*

‘‘अब यह दावत मां के लौट आने की खुशी के उपलक्ष्य में है। सब खुशी खुशी खाओ। मेरी मां वापस आ गई हैं ,’’ खुशी से श्रवण नाचने लगा ?

*औरतों में कानाफूसी होने लगी* , लेकिन फिर भी सब श्वेता और श्रवण को बधाई देने लगे ?

वे सभी रिश्तेदार जो गोमती की गमी में शामिल होने आये थे , गोमती के पांव छूने लगे। कोई बाजे वालों को बुला लाया। बाजे बजने लगे। बच्चे नाचने कूदने लगे। माहौल एकदम बदल गया। *श्रवण को देखकर गोमती सब भूल गईं ?*

शाम होते होते सारे रिश्तेदार खा पीकर विदा हो गये। रात को थककर सब अपने अपने कमरों में जाकर सो गये। गोमती को भी काफी दिन बाद निश्चिंतता की नींद आई।

अचानक रात में मांजी की आंखें खुल गईं , वह पानी पीने उठीं। देखा तो श्रवण के कमरे की बत्ती जल रही थी और धीरे धीरे बोलने की आवाज आ रही थी। गोमती कमरे की दीवार से सटकर श्रवण के कमरे के बाहर कान लगाकर सुनने लगीं। *श्वेता कह रही थी कि " तुम तो मां को मोक्ष दिलाने गये थे , मां तो वापस आ गईं ?"*

*"मां का हाथ गंगा में छोड़ नहीं पाया तो मैं मां को डेरे में छोड़कर आ गया था। मुझे क्या पता था कि मां लौट आयेंगी ?"*

लेकिन पिछले 8 दिन से मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही थी। मैंने मां को मारने या त्यागने का पाप किया था। मैं सारा दिन यही सोचता कि भूखी प्यासी मेरी मां पता नहीं कहां कहां भटक रही होंगी। *मां ने मुझ पर विश्वास किया और मैंने मां के साथ विश्वासघात किया।* मां को इस प्रकार गंगा घाट पर छोड़कर आने का अपराध जीवन भर दुख पहुंचाता रहेगा। अच्छा हुआ कि मां लौट आईं और मैं मां की मृत्यु का कारण बनते बनते बच गया ?

*बेटे की बातें सुनकर गोमती के पैरों तले जमीन कांपने लगी ?* सारा दृश्य उनकी आंखों के आगे सजीव हो उठा ? वह इन 8 दिनों में लगभग सारा मेला क्षेत्र घूम लीं थीं। उन्होंने बेटे के नाम की जगह- जगह घोषणा कराई पर अपने नाम की घोषणा कहीं नहीं सुनी ? *इतना बड़ा झूठ बोला श्रवण ने मुझसे ? मुझसे मुक्त होने के लिये ही मुझे इलाहाबाद लेकर गया था। मैं इतना भार बन गई हूं कि मेरे अपने ही मुझे जीते जी मारना चाहते हैं ?*

वह खुद को संभाल पातीं कि धड़ाम से वहीं गिर पड़ीं ? *वह सब झेल गईं , पर यह सदमा न झेल सकीं ?*

27/01/2025

*सफलता चाहिए तो खुद को बस में रखो, दूसरों को नहीं*

25/01/2025

*तकलीफ देने के बाद जताई*
*गई हमदर्दीऔर नजरअंदाज करने के बाद दी गई अहमियत कोई मायने नहीं रखती*

13/01/2025

मेरी "फ्रेंड लिस्ट" में सन् 2025 की महान "शख्सियत"
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जय भीम

12/01/2025

*बिखरते रिश्तों का पुनर्मिलन*

12 जनवरी 2025

संडे स्पेशल कहानी

विभा और वैभव के विवाह को मुश्किल से पाँच वर्ष ही हुये थे कि उनके बीच वैचारिक मतभेद इतना बढ़ गया कि नौबत तलाक तक आ पहुँची। उन्होंने इस समस्या का समाधान विवाह-विच्छेद में ढूँढा।

उनका चार वर्षीय बेटा अनिरुद्ध इन घटनाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ था। तलाक के बाद वह कभी माँ के साथ रहता तो कभी पिता के साथ ?

समय बीतने के साथ अनिरुद्ध का बाल मन माता-पिता दोनों का साथ पाने के लिये तरसने लगा। कभी वह विभा से पूछता “हम पापा के साथ क्यों नहीं रहते ? *जैसे सबके मम्मी-पापा साथ रहते हैं , वैसे ही मेरे पापा हमारे साथ क्यों नहीं रहते ?”*

तो कभी वह वैभव से सवाल करता ,
“पापा आप खाना क्यों बनाते हो ? *सबके घर पर मम्मी खाना बनाती हैं , हमारे घर पर क्यों नहीं ?”* अनिरुद्ध के इन सवालों पर दोनों निःशब्द रह जाते। उनके बीच की खाई इतनी गहरी थी कि उसे पाटना नामुमकिन लगता ?

अनिरुद्ध का जन्मदिन निकट था। तलाक के बाद वह कभी माँ तो कभी पिता के साथ अपना जन्मदिन मनाता। इस बार विभा उसे मॉल लेकर गई और बोली “अपने जन्मदिन के लिए कोई तोहफा पसंद कर लो।” लेकिन महँगे उपहार देखकर भी अनिरुद्ध के चेहरे पर मुस्कान न आई। *विभा खीझकर बोली “आखिर तुम्हें क्या चाहिये ?” अनिरुद्ध ने धीरे से कहा “पापा ?”*

यह सुनकर विभा रात भर सो न सकी। वह जानती थी कि अनिरुद्ध की यह चाह पूरी करना आसान नहीं , क्योंकि उसके अहंकार ने ही उसे इस स्थिति में ला खड़ा किया था। *तलाक के लिए विभा की ज़िद ही जिम्मेदार थी। वैभव अपने माता-पिता के साथ रहना चाहता था लेकिन विभा को उनके साथ रहना मंजूर नहीं था।* उसे अपने सपनों को उड़ान देने का जुनून था। हॉस्टल में पली-बढ़ी विभा छोटे शहर और सीमित जीवन में घुटन महसूस करती थी। उसने वैभव को स्पष्ट कह दिया ,

*“या तो माता-पिता के साथ रहो , या मेरे साथ ?”*

परिणामस्वरूप उनका तलाक हो गया।

अब अकेलेपन में विभा को अपने फैसले पर पछतावा होने लगा था। वह महसूस कर रही थी कि यदि उसने अपने अहम को दरकिनार कर दिया होता तो आज उसका एक सुंदर परिवार होता ?

अगले दिन विभा ने साहस जुटाकर एक बड़ा निर्णय लिया। वह अनिरुद्ध को लेकर ससुराल पहुँची। उसने वैभव की माँ के चरण स्पर्श किये और पिताजी को नमन करते हुये कहा ,
“माँ मुझे माफ कर दो। मैं आप सबके साथ रहना चाहती हूँ। मैंने जो किया , उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती , लेकिन अनिरुद्ध के लिये हम सबका साथ रहना बहुत ज़रूरी है।”

अनिरुद्ध खुशी से दादा-दादी से लिपट गया। वैभव जब ऑफिस से लौटा तो विभा को देखकर हैरान रह गया। वह चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ा , लेकिन तभी विभा ने उसका हाथ थाम लिया और कहा “वैभव क्या तुम मेरे साथ फिर से जीवन के रास्तों पर चलना स्वीकार करोगे ? मैं माँ-बाबूजी के साथ इसी घर में रहूँगी। *मुझसे अब और अकेले नहीं जिया जाता ? तुमसे बिछड़कर ही समझा कि तुम्हारी अहमियत क्या है ?”*

वैभव ने भी सब भुलाकर विभा को सीने से लगा लिया। उनके आँसुओं ने सभी गिले-शिकवे मिटा दिये। अनिरुद्ध के जन्मदिन की तैयारियाँ शुरू हो गईं। इस बार वह सबसे ज्यादा खुश था। उसे उसका सबसे पसंदीदा उपहार मिल गया था— माँ, पापा और दादा-दादी का साथ। उसके जीवन में खुशियों की नई बहार आ गई थी।

सीख : *जीवन में रिश्तों की अहमियत को समय रहते समझना चाहिये। अहंकार और जिद से रिश्ते टूट सकते हैं , लेकिन सच्चे प्रेम और समर्पण से उन्हें फिर से जोड़ा जा सकता है।*

21/12/2024

जीवन अनमोल है, बुजुर्गों का सम्मान करें

आजकल हार्ट अटैक के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि अपने बुजुर्गों का ख्याल रखना कितना जरूरी है। जिन बुजुर्गों ने हमें बचपन से स्नेह और सुरक्षा दी, आज उन्हें हमारी सेवा और प्यार की जरूरत है।

उनके साथ समय बिताएं, उनकी बातें सुनें, और उनकी जरूरतों का ध्यान रखें। याद रखें, जैसा हम आज करेंगे, वैसा ही कल हमारे साथ होगा। बच्चों को भी सिखाएं कि वे अपने दादा-दादी और माता-पिता का सम्मान करें।

समय रहते अपने कर्तव्य निभाएं, क्योंकि वक्त लौटकर नहीं आता। बुजुर्ग हमारे परिवार की जड़ें हैं, इन जड़ों को सहेजें।

मोहर सिंह

21/12/2024

Lucc हो या सहारा, pacl, Kbcl, कर्मभूमि, शाइन सिटी, Gca, टोगो, बाइकबोट, रोजवैली, आदर्श, नवजीवन या समृद्धा या कोई और कंपनी सभी बहुराज्यीय ठगी मामले हैं इसलिए केंद्र को के तहत निवेशकों का भुगतान करना चाहिए।










B.S.P AP Mission 2024

जितने रास्ते संसार में "कलह" की ओर जाते हैं, उतने ही रास्ते "शांति" की ओर भी जाते हैं.!सोच "सकारात्मक" रखिए "सही दिशा" व...
09/12/2024

जितने रास्ते संसार में "कलह" की ओर जाते हैं, उतने ही रास्ते "शांति" की ओर भी जाते हैं.!
सोच "सकारात्मक" रखिए "सही दिशा" व "मार्ग" अपने आप मिल जाता है..!!

*" अनाथ "* संडे स्पेशल कहानी राघव अपनी माँ को बहुत दिनों से नीति से शादी करवाने को मना रहा था किन्तु वो तैयार नहीं थीं। ...
08/12/2024

*" अनाथ "*

संडे स्पेशल कहानी

राघव अपनी माँ को बहुत दिनों से नीति से शादी करवाने को मना रहा था किन्तु वो तैयार नहीं थीं। वजह केवल इतनी थी कि नीति एक अनाथ लड़की थी, जो राघव की सहकर्मी भी थी। मजबूरी में फिर राघव ने कोर्ट में जाकर शादी कर ली।

राघव नीति के साथ शादी के बाद जब घर वापस लौटा तो उसकी मां सुलोचना ने कहा कि *" राघव ये अनाथ तुम्हारी पत्नी भले हो सकती है , पर मेरी बहू नहीं !""* इतना कहकर राघव की मां अपने कमरे में चली गई।

" मांजी चाय !" अगली सुबह नीति सास को चाय देते हुये बोली।

" मैं तुझ जैसी अनाथ की माँ नहीं हूं , समझी.... ? *तूने मेरे बेटे को अपनी बातों में फंसा लिया , पर मुझे नहीं फंसा पायेगी !"* सुलोचना जी उसे ताना देते हुये बोली।

सास के ताने सुनकर नीति का कलेजा छलनी हो गया। परन्तु फिर भी वह बात घुमाकर बोली। " अपने पति की माँ को और क्या कहते हैं मांजी , मुझे नहीं पता , आप ही बता दीजिये ?" यह कहकर नीति अपने कमरे में चली गई।

*नीति जितना सुलोचना जी का दिल जीतने की कोशिश करती , उतना ही सुलोचना जी उसका तिरस्कार करतीं* , किन्तु नीति के चेहरे पर शिकन तक ना आती , हालाँकि वो अकेले में आंसू भी बहाती , पर राघव को जाहिर ना करती ?

" क्यों सह रही हो इतना सब नीति ? मुझसे शादी करके तुम्हें सिवा तिरस्कार के कुछ नहीं मिला ?" आज फिर किसी बात पर सुलोचना जी ने नीति को काफी सुनाया , तो राघव उसका उदास चेहरा देखकर बोला ?

" अरे मिला क्यों नहीं , बचपन से माँ के लिये तरसी हूँ। तुमने मुझे माँ दी है ना ? स्कूल में जब बच्चों की मम्मी आती थीं तो मैं अनाथ उन्हें देखकर ईश्वर से शिकायत करती थी । देखो ईश्वर ने मुझे सास के रूप में माँ दे दी !" नीति मुस्कुरा कर बोली।

*" किसे बहला रही हो नीति ? तुम भी जानती हो कि माँ तुम्हें बहू तो क्या , इंसान तक नहीं समझतीं ?* हमेशा अपने तानों से तुम्हारा कलेजा छलनी करती रहती हैं ? तुम्हें क्या लगता है कि तुम मुझे नहीं बताती हो तो मुझे पता नहीं है ?" राघव बोला।

" राघव मुझे माँ की बहू नहीं , बेटी बनना है। इसलिये वो मुझे कितना भी जला - कटा सुनायें , कितना भी मेरा कलेजा छलनी करें , मैं उफ़ नहीं करूंगी ? क्योंकि इस अनाथ को माँ चाहिये ? और तुम हम माँ - बेटी के बीच मत आया करो ? मेरी माँ बहुत अच्छी हैं। बस थोड़ा नाराज़ हैं , जो कि लाजमी भी है। *उनके कितने ख्वाब होंगे तुम्हारी शादी को लेकर , जो मुझ अनाथ की वजह से टूट गये !"* नीति उदास होकर बोली।

सुलोचना जी बाहर से सब सुन रही थीं। इतने दिनों में उनका नीति के प्रति दुर्व्यवहार और नीति का धैर्य, उन्हें खुद की सोच पर बहुत शर्मिंदगी हुई ?

*ये बेचारी मुझसे माँ का प्यार पाने को इतना सब कुछ सह रही है और मैं सिर्फ इसका तिरस्कार कर रही हूँ , जबकि गलती अकेले इसकी ही तो नहीं है। शादी तो मेरे बेटे ने की है इससे !"*

उन्होंने सोचा , उनकी आंखों में इस वक़्त आंसू थे। " ना बेटा तू अनाथ नहीं है , मैं हूँ ना तेरी माँ !" अचानक सुलोचना जी अंदर आईं और भरे गले से बोलीं।

नीति को यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी सास ने उसे स्वीकार कर लिया है ?

" हाँ बेटा इतनी अच्छी बहू तो मैं भी ना खोज पाती , जो मेरे बेटे ने खोजी है ? और मैं मूढ़ मगज सिर्फ इस बात से उसका तिरस्कार कर रही कि वो अनाथ है , जबकि मुझे तो इसकी माँ बनकर उसके जीवन की ये कमी भरनी चाहिये थी !" सुलोचना जी बोलीं और उन्होंने अपनी बहू को गले से लगा लिया।

नीति भी सास के गले लगकर फूट - फूटकर रोने लगी , क्योंकि आज उसने माँ को जो पाया था।

सीख : *दोस्तों कहानी की सीख यही है कि यदि हम धैर्य रखें , तो जीवन में सब कुछ संभव है।

जिस शरीर के साथ पैदा हुए है। उसके जिम्मेदार हम नहीं है लेकिन जिस चरित्र और किरदार के साथ विदा होंगे उसके पूरे जिम्मेदार ...
03/12/2024

जिस शरीर के साथ पैदा हुए है। उसके जिम्मेदार हम नहीं है लेकिन जिस चरित्र और किरदार के साथ विदा होंगे उसके पूरे जिम्मेदार
हम स्वयं ही होंगे ।

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