22/07/2026
गौर से पढ़ियेगा जनाब बहुत गहरी बात है
चिड़े की ख़ामोशी
सबने चिड़िया के दर्द पर किताबें लिखीं,
उसके आँसुओं पर तालियाँ भी खूब बजीं।
पर किसी ने उस चिड़े की आँखों में झाँककर नहीं देखा,
जो हर दिन अपनी थकान को मुस्कान के पीछे छिपा देता है।
जैसे-जैसे उसके कंधों पर ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती जाती हैं,
वैसे-वैसे उसके अपने सपने कहीं खोते जाते हैं।
माँ-बाप का सहारा बनना,
पत्नी का विश्वास निभाना,
बच्चों का भविष्य सँवारना,
और पूरे परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाना...
यही तो उसकी रोज़ की कहानी बन जाती है।
वह भी टूटता है,
उसे भी दर्द होता है,
उसे भी कभी किसी अपने के कंधे की ज़रूरत होती है।
लेकिन समाज उसे बचपन से यही सिखाता है—
"मर्द हो... दर्द मत दिखाना।"
वह अपने शौक़ बेच देता है,
अपनी इच्छाएँ मार देता है,
अपने अरमानों का गला घोंट देता है,
सिर्फ़ इसलिए कि उसके अपनों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे।
जब घर में खुशियाँ आती हैं,
तो लोग कहते हैं— "किस्मत अच्छी थी।"
और जब मुश्किलें आती हैं,
तो सबसे पहले उसी चिड़े की काबिलियत पर सवाल उठते हैं।
याद रखिए...
घोंसला सिर्फ़ तिनकों से नहीं बनता,
उसे बनाने में चिड़िया का प्रेम जितना ज़रूरी है,
उतना ही चिड़े का संघर्ष, त्याग और मौन बलिदान भी।
इसलिए कभी उस चिड़े से भी पूछ लीजिए—
"तुम कैसे हो?"
हो सकता है वह पहली बार रो पड़े,
क्योंकि बरसों से उसने अपने आँसुओं को
अपनी ज़िम्मेदारियों के नीचे दबाकर रखा है।
✍️ Writer: Nikhil Bansal