19/05/2023
🔔कबीर साहेब जी द्वारा स्वामी रामानंद को गुरु धारण करने की लीला🔔
स्वामी रामानन्द जी एक विद्वान पुरुष थे। वेदों व गीता जी के मर्मज्ञ ज्ञाता माने जाते थे।
जिस समय कबीर परमेश्वर (कविर्देव) अपने लीलामय शरीर में पाँच वर्ष के हो गए तब गुरु मर्यादा बनाए रखने के लिए लीला की। ढ़ाई वर्ष की आयु के बच्चे का रूप धारण करके सुबह-सुबह अंधेरे में पंचगंगा घाट की पौडि़यों के ऊपर लेट गए, जहाँ पर स्वामी रामानन्द जी प्रतिदिन स्नानार्थ जाया करते थे।
कबीर साहेब के सिर में रामानन्द जी के पैर की खड़ाऊ लग गई। कविर्देव ने जैसे बालक रोते हैं ऐसे रोना शुरु कर दिया। रामानन्द जी तेजी से झुके और देखा कि कहीं बालक को चोट तो नहीं लग गई तथा प्यार से उठाया। उसी समय रामानन्द जी के गले की कण्ठी (माला) निकल कर परमेश्वर कविर्देव के गले में डल गई। रामानन्द जी ने कहा कि बेटा राम - राम बोलो। राम के नाम से दुःख दूर हो जाते हैं, पुत्र राम - राम बोलो, कबीर साहेब के सिर पर हाथ रखा। शिशु रूप में कबीर साहेब चुप हो गए।
एक दिन स्वामी रामानन्द जी का कोई शिष्य कहीं पर सत्संग कर रहा था। कबीर साहेब वहाँ पर चले गए। वह ऋषि जी श्री विष्णु पुराण की कथा सुना रहा था।
कथा के पश्चात कबीर साहेब जी ने कुछ प्रश्न किए जिनका उत्तर उस ऋषि के पास नहीं था और कबीर साहेब जी ने कहा कि जो गुरु आपके हैं वही गुरु मेरे हैं इस बात पर अपनी बेइज्जती महसूस करके कबीर साहेब की शिकायत अपने गुरु रामानंद से की स्वामी रामानन्द जी बोले कि कल सुबह उसको बुला कर लाओ। कल देखना तुम्हारे सामने मैं उसको कितना दण्ड दूँगा।
अगले दिन सुबह-सुबह कबीर साहेब को दस नादान व्यक्तियों ने पकड़ कर श्री रामानन्द जी के सामने उपस्थित कर दिया। रामानन्द जी ने यह दिखाने के लिए कि मैं कभी छोटी जाति वालों के दर्शन भी नहीं करता, यह झूठ बोल रहा था कि इसने मेरे से दीक्षा ली है, आगे पर्दा लगा लिया।
स्वामी रामानंद जी विष्णु जी की काल्पनिक मूर्ति बनाकर मानसिक पूजा करने लगे उस समय भी ठाकुर जी की मूर्ति पर माला डालना भूल गए और मुकट रख दिया मुकट उतारे तो पूजा खंडित तब कबीर साहेब जी जो 5 वर्ष की आयु में बाहर बैठे थे बोले स्वामी जी इस माला की गांठ खोल लो मुकट उतारना नहीं पड़ेगा
अब रामानन्द जी काहे के मुकुट उतारे था, काहे की गाँठ खोले था। कुटिया के सामने लगा पर्दा भी स्वामी रामानन्द जी ने अपने हाथ से फैंक दिया और सारे ब्राह्मण समाज के सामने उस कबीर परमेश्वर को सीने से लगा लिया। रामानन्द जी ने कहा कि हे भगवन! आपका तो इतना कोमल शरीर है जैसे रूई हो और मेरा तो पत्थर जैसा शरीर है। एक तरफ तो प्रभु खड़े हैं और एक तरफ जाति व धर्म की दीवार है। प्रभु चाहने वाली पुण्यात्माऐं धर्म की बनावटी दीवार को तोड़ना श्रेयकर समझते हैं। वैसा ही स्वामी रामानन्द जी ने किया। सामने पूर्ण परमात्मा को पा कर न जाति देखी न धर्म देखा, न छुआ-छात, केवल आत्म कल्याण देखा। इसे ब्राह्मण कहते हैं।
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परबेश।
गरीबदास गति को लखै, कौन वरण क्या भेष।।
स्वामी रामानन्द जी ने कहा हे कबीर प्रभु! मैंने आपको कब दीक्षा दी है?
कबीर साहेब बोले एक समय आप स्नान करने के लिए पँचगंगा घाट पर गए थे। मैं वहाँ लेटा हुआ था। आपके पैरों की खड़ाऊ मेरे सिर में लगी थी तो आपने कहा था कि बेटा राम नाम बोलो मेने आपको उसी समय से गुरु रूप में स्वीकार कर लिया था।
कबीर परमेश्वर जी स्वामी रामानंद जी की आत्मा को साथ लेकर सतलोक गए और सभी ब्रह्मांडों से परिचित कराया तब रामानंद ने अपनी वाणियों में कहा है
बोलत रामानंदजी, सुन कबीर करतार।
गरीबदास सब रूपमें, तुमहीं बोलन हार।।
तुम साहिब तुम संत हो, तुम सतगुरु तुम हंस।
गरीबदास तुम रूप बिन और न दूजा अंस।।
हे कबीर परमेश्वर आप ही परमात्मा हो आप ही संत हो आप ही सतगुरु हो। अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि आपके अलावा पूर्ण परमात्मा कोई नहीं है।
तब कबीर साहेब जी ने कहा कि हे स्वामी जी आने वाले समय में लोग कहेंगे कि कबीर साहेब ने कोई गुरु नहीं बनाया इसलिए भक्ति बिना गुरु के भी कर सकते हैं।
इस भ्रमणा को दूर करने के लिए ही कबीर साहेब जी ने स्वामी रामानंद को गुरु बनाकर उनका उद्धार किया और यह लीला की और सभी मानव को संदेश दिया की बिना गुरु के मोक्ष नहीं हो सकता।
कबीर साहेब जी अपनी अमृत वाणी में कहते हैं
कबीर गुरु बिन माला फेरते , गुरु बिन देते दान l
गुरु बिन दोनों निष्फल है ,पूछो वेद पुराण ll
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