24/12/2017
मोदी पर जो हर तीसरे दिन अपेक्षाओं पर खरे न उतरने का दबाव बनाया जाने लगता है, बंधुआ मजदूर की तरह गरिआया जाता है, उसका मूल कारण है कि वो किसी ताकतवर क्लैन से नहीं है. उनका जो सरनेम है उसमें से दबंगई की भीनी भीनी खुशबू नहीं आती. न ही कभी भगवान विष्णु ने उनकी जाति में अवतार लिया, जिससे कोई परमानेंट नायक वाला कनेक्टिंग पॉइंट बन सके. मोदी की जाति को हीन समझने की ग्रंथि जो हमारे अंतर्मन में दबी है, उसे नायक के तौर पर वह आदमी हमें बर्दाश्त नहीं होता. कोई भी असुविधाजनक फैसला हमें छोटे आदमी की नाफरमानी की तरह लगता है, भले ही यह बात हम समझ न पाएं.
हिंदुस्तान कबीलों का समुच्चय है. यहाँ ठाकुर, बाभन, यादव, जाट, कुर्मी, जाटव जैसे ताकतवर और अभिजात्य कबीले हैं. मोदी बेचारे का भी कबीला है लेकिन वो अभिजात्य नहीं है. वो सेवक ही है, महाभारत के विदुर की तरह. जिससे उनसे केवल जरूरत और वक्ती तौर पर ही काम लिया जा सकता है. बाप नहीं माना जा सकता. जबकि यहाँ अमर सिंह, नरेश अग्रवाल, तेजस्वी यादव जैसों के पर्मानेंट समर्थक हैं, और उनको बाप मानते हैं, नाम के आगे जो लगा है, उसके आधार पर.
मोदी के विरोध में जो भी खड़ा हुआ है उसका सरनेम चैक करें, सब ताकतवर जातीय क्षत्रप हैं. अपने अलावा सबको हीन समझने वाले. सबके पास कहानियां हैं जिनमें उनके तथाकथित पूर्वज ने सूर्य, चंद्र, इंद्र, वरुण, सागर, महासागर, अंग्रेज, मुगल, राक्षस यहाँ तक कि भगवान तक को झुका दिया. मगर कभी सुना है किसी तेली जाति के आदमी ने देवासुर संग्राम में हिस्सा लिया हो. तो फिर बताएं कि मोदी बात बात पर गरियाने लायक होते हैं या नहीं?
राहुल गाँधी के इमेज मैनेजरों ने जो उनकी रीमॉडलिंग करने की सोची, तो उन्होंने सीधे जाति की इसी ताकत को पकड़ा, बोले हम उच्च कुल के ब्राह्मण हैं. बुलेट राजा. उच्च कुल के पारसी क्यों नहीं बोले? क्योंकि उन्हें पता है कि लोग किस चीज़ से कनेक्ट करेंगे.
मनमोहन सिंह को छोड़ दें तो प्रधानमंत्री पूरे देश के प्रति जवाबदेह होता है, मोदी हैं भी, वो अपने को प्रधानसेवक कहे भी थे, मगर हम इस बात को उतना सीरियसली न लें. प्रधानमंत्री ही समझें न समझ आ रहा हो तो अगली बार बदल दें, मगर अभी समय दें, सम्मान दें और लूज़ मोशन के मरीज की तरह बर्ताव न करें