03/05/2026
*हज़रत ख़्वाजा बंदा-नवाज़ गेसू-दराज़* (1321–1422) भारत के एक मशहूर चिश्ती सूफी बुजुर्ग और वली हैं, जिन्होंने गुलबर्गा (कर्नाटक) में सूफीवाद की तालीम को आम किया। दिल्ली में पैदा हुए , वे 15 साल की उम्र में हज़रत नसीरुद्दीन चिराग़ दिल्ली के मुरीद बने। उन्होंने मजहबी रवादारी, प्यार और भाईचारा का पैगाम दिया और आपकी मज़ार गुलबर्गा शरीफ में है।
*ख़्वाजा बंदा-नवाज़ गेसू-दराज़ की हायत ए मुबारक*
नाम: *सैयद मुहम्मद हुसैनी*
*अलकाब* : बंदा-नवाज़ (बंदों को प्यार करने वाला) और गेसू-दराज़ (लंबे बाल वाले)
*जन्म*: 13 जुलाई 1321 (दिल्ली)
*वफात /उर्स*: 1 नवंबर 1422
(गुलबर्गा)
*सिलसिला*: चिश्तिया (हज़रत नसीरुद्दीन चिराग़ दहलवी (दिल्ली के खलीफा)
दिल्ली से सफर के बाद गुलबर्गा (दक्कन) को अपना मरकज बनाया,
इलम हासिल करने के लिए वे बचपन में ही अपने वालिद के साथ दौलताबाद आ गए थे, जहाँ उन्होंने शुरुआती , बुनियादी तालीम हासिल की।
*इलम ए मारिफ़त व खिलाफत*: दिल्ली में नसीरुद्दीन चिराग देहलवी के साथ रहे और उनके वफात के बाद चिश्ती सिलसिले के जानशीन बने।
*सफर (गुलबर्गा)*: बहमनी सुल्तान ताज उद-दीन फिरोज शाह के पैगाम और दावत पर वे गुलबर्गा (कर्नाटक) चले गए।
*दीनी काम* : उन्होंने इलाके की जबान (उर्दू/दक्खनी) में सूफी तालीम का प्रचार किया, जिससे यह आम लोगों तक पहुँची।
*अदबी काम* : उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनमें सूफीवाद और रहस्यवाद पर रोशनी डाली गई है।
*ख्वाजा बंदा नवाज़ के मशहूर किताबें*
1) *मेराजुल आशिकीन* (Meraj-ul-Ashiqin)
2) *जवामे-उल-कलिम* (Jawame-ul-Kalim)
3) *अनिस्-उल-उश्शाक* (Anees-ul-Ushshaq)
4) *हदायत-ए-शुयूख* (Hidayat-e-Shuyookh)
5) *तरजुमा आदाब-उल-मुरीदीन* (Tarjuma Aadabul-Mureedeen)
6) *खतिमा* (Khatima)
7) *जवाहर-उल-उश्शाक* (Jawahir-ul-Ushshaq)
*दरगाह शरीफ़*: गुलबर्गा में मौजूद उनकी दरगाह (दरगाह शरीफ) आज भी सभी मजहब के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है।
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दुआगो - सय्यद शाह मुदस्सरपाश कादरी पिरजादा ( अक्कलकोट)