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*हज़रत ख़्वाजा बंदा-नवाज़ गेसू-दराज़* (1321–1422) भारत के एक मशहूर चिश्ती सूफी बुजुर्ग और वली हैं, जिन्होंने गुलबर्गा (क...
03/05/2026

*हज़रत ख़्वाजा बंदा-नवाज़ गेसू-दराज़* (1321–1422) भारत के एक मशहूर चिश्ती सूफी बुजुर्ग और वली हैं, जिन्होंने गुलबर्गा (कर्नाटक) में सूफीवाद की तालीम को आम किया। दिल्ली में पैदा हुए , वे 15 साल की उम्र में हज़रत नसीरुद्दीन चिराग़ दिल्ली के मुरीद बने। उन्होंने मजहबी रवादारी, प्यार और भाईचारा का पैगाम दिया और आपकी मज़ार गुलबर्गा शरीफ में है।

*ख़्वाजा बंदा-नवाज़ गेसू-दराज़ की हायत ए मुबारक*

नाम: *सैयद मुहम्मद हुसैनी*

*अलकाब* : बंदा-नवाज़ (बंदों को प्यार करने वाला) और गेसू-दराज़ (लंबे बाल वाले)

*जन्म*: 13 जुलाई 1321 (दिल्ली)

*वफात /उर्स*: 1 नवंबर 1422
(गुलबर्गा)

*सिलसिला*: चिश्तिया (हज़रत नसीरुद्दीन चिराग़ दहलवी (दिल्ली के खलीफा)

दिल्ली से सफर के बाद गुलबर्गा (दक्कन) को अपना मरकज बनाया,
इलम हासिल करने के लिए वे बचपन में ही अपने वालिद के साथ दौलताबाद आ गए थे, जहाँ उन्होंने शुरुआती , बुनियादी तालीम हासिल की।

*इलम ए मारिफ़त व खिलाफत*: दिल्ली में नसीरुद्दीन चिराग देहलवी के साथ रहे और उनके वफात के बाद चिश्ती सिलसिले के जानशीन बने।

*सफर (गुलबर्गा)*: बहमनी सुल्तान ताज उद-दीन फिरोज शाह के पैगाम और दावत पर वे गुलबर्गा (कर्नाटक) चले गए।

*दीनी काम* : उन्होंने इलाके की जबान (उर्दू/दक्खनी) में सूफी तालीम का प्रचार किया, जिससे यह आम लोगों तक पहुँची।

*अदबी काम* : उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनमें सूफीवाद और रहस्यवाद पर रोशनी डाली गई है।

*ख्वाजा बंदा नवाज़ के मशहूर किताबें*
1) *मेराजुल आशिकीन* (Meraj-ul-Ashiqin)

2) *जवामे-उल-कलिम* (Jawame-ul-Kalim)

3) *अनिस्-उल-उश्शाक* (Anees-ul-Ushshaq)

4) *हदायत-ए-शुयूख* (Hidayat-e-Shuyookh)

5) *तरजुमा आदाब-उल-मुरीदीन* (Tarjuma Aadabul-Mureedeen)

6) *खतिमा* (Khatima)

7) *जवाहर-उल-उश्शाक* (Jawahir-ul-Ushshaq)

*दरगाह शरीफ़*: गुलबर्गा में मौजूद उनकी दरगाह (दरगाह शरीफ) आज भी सभी मजहब के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है।

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दुआगो - सय्यद शाह मुदस्सरपाश कादरी पिरजादा ( अक्कलकोट)

20/04/2026
उर्स मुबारक.... हजरत शाह मोहम्मद गौस ग्वालियरी कादरी शतारी रह
03/03/2026

उर्स मुबारक.... हजरत शाह मोहम्मद गौस ग्वालियरी कादरी शतारी रह

27/01/2026

एक बुज़ुर्ग शख़्स अपनी गुज़री हुई ज़िंदगी को याद करते हुए कहने लगा: “मैंने जवानी में ख़्वाहिश की थी कि शादी करूँ… अल्लाह ने शादी नसीब कर दी। फिर चाहा कि बच्चे हों… अल्लाह ने वो नेअमत भी दे दी।

लेकिन वक्त गुज़रते-गुज़रते मैं घर और काम की भागदौड़ में ऐसा उलझा कि उन्हीं बच्चों के साथ बैठने का सुकून भी कम पड़ने लगा।” वह आगे कहता है: “मैंने चाहा कि मेरा अपना एक अच्छा-सा घर हो, जिसके आँगन में एक छोटा बाग़ हो। मेहनत की, मशक्कत की—और अल्लाह ने ये चाहत भी पूरी कर दी।

लेकिन जब तक घर और बाग़ बनकर तैयार हुए, बच्चे बड़े हो गए… और फिर उनकी शादी की चिंता सर पर आ गई।” “उन्होंने भी शादी कर ली… लेकिन मैं काम की थकान से टूटा हुआ था। फिर मैंने सोचा कि अब रिटायर होकर आराम करूँगा। जब रिटायर हुआ तो एक अजीब-सी तन्हाई ने घेर लिया वो तन्हाई जो शायद ग्रैजुएशन के बाद भी नहीं थी।

उस वक़्त तो आगे बढ़ने का जोश था, लेकिन अब ज़िंदगी मेरे हाथ में थी… और मैं कमज़ोर हो चुका था।” फिर बुज़ुर्ग की आवाज़ भर्रा गई: “मैंने चाहा कि क़ुरआन हिफ़्ज़ कर लूँ… लेकिन याददाश्त जवाब दे चुकी थी। सोचा कि रोज़े रखूँ… मगर सेहत ने साथ छोड़ दिया। रातों को जागकर इबादत करनी चाही… लेकिन अब टाँगों में वो ताक़त कहाँ थी कि मुझे उठा पातीं।” उसने गहरी साँस ली और कहा: “इंसान ख़्वाहिशें पूरी कर लेता है… लेकिन वक़्त हाथ से निकल जाए तो सब कुछ होते हुए भी दिल खाली सा रह जाता है।”

रसूलुल्लाह ﷺ ने बड़ी हिकमत के साथ नसीहत फ़रमाई: “पाँच चीज़ों को पाँच चीज़ों से पहले ग़नीमत समझो: अपनी जवानी को बुढ़ापे से पहले, अपनी सेहत को बीमारी से पहले, अपनी मालदारी को तंगी से पहले, अपने ख़ाली वक़्त को मशग़ूलियत से पहले, और अपनी ज़िंदगी को अपनी मौत से पहले।”

अल्लाह तआला हमें अपने वक़्त, अपनी नेअमतों और अपनी ज़िंदगी की क़दर करने की तौफ़ीक़ दे। हमें उसका याद करने वाला, उसका शुक्र अदा करने वाला और उसकी इबादत में लगने वाला बना दे। आमीन।

25/01/2026

महशर में गुनहगारों के लिए दामन का सहारा काफी है.....
या रसूल अल्लाह (स.) दामन तो बड़ी चीज है ,बस नाम तुम्हारा (स) काफी है....

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