Sarcasm Unleashed

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25/03/2024

नमस्कार स्वागत है भाईचारे के एक और पैगाम में। पिछले वीडियो के नायक साजिद के साहसिक और कार्य को देखकर हजारों की संख्या में भीड़ इकट्ठा हुई और उन वाजिब-उल-कत्ल बच्चों के जनाजे में कुछ 30 काफिर गए. (brigadier pratap saying about kaum) अब चलते हैं भाईचारे की एक और मिसाल जो बेंगलुरु में दी गयी। एक जाहिल जिसका नाम मुकेश है उसने शांतिप्रिय बाहुल्य क्षेत्र में हनुमान चालीसा बजाने का जघन्य अपराध किया है। अज़ान के पवित्र समय पर हनुमान चालीसा बजाने का जो अपराध इस मुशरिक ने किया उसको लेकर पांच मासूम बच्चे रोते हुए विनती करने गए और मुकेश ने जहालत दिखाते हुए इन बच्चों पर हमला कर दिया और बच्चों ने भाईचारा दिखाते हुए इस पर फूल बरसाने लगे और मुकेश की हिम्मत तो देखो वह खुद पुलिस के पास चला गया और पुलिस ने अच्छा भाईचारा निभाते हुए केस लेने से मना कर दिया भारत में धार्मिक सहिष्णुता की कितनी हृदयस्पर्शी कहानी है। एक हिंदू दुकानदार और शांतिप्रिय बच्चे धार्मिक संगीत की मनमोहक धुन और बहस के माध्यम से अपने धर्म का जश्न मनाने के लिए एक साथ आ रहे हैं।

मुझे यकीन है कि बच्चों द्वारा दुकान के मालिक को फूल भेंट करना वास्तव में दोनों समूहों को करीब ले आया। और सेक्युलरों के तर्क से कोई कैसे बहस कर सकता है? किसी दोस्ताना दिखने वाली घटना का विरोध करना स्पष्ट तौर पर भाईचारे के लिए ख़तरा है.

सचमुच, दूसरों के साथ सद्भाव से कैसे रहना है इसका एक ज्वलंत उदाहरण।
[9:55 AM]
धार्मिक भाईचारा का वास्तव में प्रेरक प्रदर्शन करते हुए, श्री इंकलाब खान ने खुद को कुछ आक्रामक हिंदू पड़ोसियों के साथ गलतफहमी में उलझा हुआ पाया! गलतफहमी यह थी कि हिंदू अपने घर को अपना समझ रहे थे वास्तव में घर तो इंकलाब खान का था। मूर्ख हिंदू यह नहीं समझते कि मुसलमानों का हक हर जगह है। हमारा देश दारुल हर्ब है(references) उनके लिए और इनका अधिकार है हमारे देश में कब्ज़ा करने का कहीं पर भी और वक़्फ़ बोर्ड इसकी इजाजत भी देता है चाहें वह मंदिर हो, कॉलेज, रेलवे स्टेशन, पार्क हो , जंगल हो इत्याद। जाहिर तौर पर, खान की बेहतरीन रसोई कटलरी पर रमज़ान कैरोल्स की जोशीली प्रस्तुति को गलती से कहीं अधिक आक्रामक समझ लिया गया।

उन उपद्रवी काफिरों (सिद्धेश, राजेश, तंगराज (पूरा परिवार!), लक्ष्मी, और विक्की) के सांस लेने से फितना फ़ैल रहा है - आइये इन्किलाब के कार्य की सराहना करे जिसने काफिरो को रोकने का प्रयास किया। हम कहते हैं, धार्मिक उत्साह।

अब, कुछ लोग खान के इस फैसले का उपहास कर सकते हैं कि उन्होंने पहले से ही राजावाड़ी अस्पताल में कुछ कागजी कांट-छांट के साथ खुद के लिए ठहरने की बुकिंग करा ली है। लेकिन स्पष्ट रूप से, खान एक दूरदर्शी व्यक्ति हैं जो आत्म-देखभाल के महत्व को समझते हैं, खासकर तनावपूर्ण रमज़ान के दौरान।

शुक्र है, हमेशा सतर्क रहने वाले अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और सुनिश्चित किया कि खान को पुलिस होल्डिंग सेल में पांच सितारा लॉज मिले जिसके वह हकदार हैं। आइए आशा करें कि उनके स्टाफ में एक अच्छा मालिश करने वाला व्यक्ति हो - गलतफहमी से उत्पन्न भावनात्मक चहल-पहल थका देने वाली होगी!

यह दिल को छूने वाली कहानी वास्तव में रमज़ान की भावना का प्रतीक है - प्रतिबिंब, आत्म-सुधार और शायद हल्के चाकू के स्पर्श का समय यदि आपके पड़ोसी आपके कलात्मक प्रयासों को गलत समझते हैं। बस याद रखें, दोस्तों, थोड़ी सी सांस्कृतिक संवेदनशीलता बहुत काम आती है - खासकर जब दूसरे व्यक्ति के पास रसोई की दराज में एक अच्छी तरह से धारदार चाकू हो|

21/03/2024

नमस्कार! स्वागत है आपका sarcasm unleashed चैनल पर।

जैसा कि आप जानते हैं कि रमजान का मुकद्दस महीना चल रहा है। हमारे शांतिप्रिय समुदाय के लोगों ने आपसी भाईचारे के लिए कई सारे प्रशंसनीय और उत्कृष्ट कार्य किए हैं। कल ही 19 मार्च को हमारे भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य में बदायूं जिले mein साजिद नाम के व्यक्ति ने देश में भाईचारा बढ़ाने का उत्तम उदाहरण रखा है। आप जानते ही हैं कि रमजान के महीने में कुर्बानी देना एक सबाब का काम है इसलिए साजिद ने वाजिब-उल-क़त्ल दो बच्चों की कुर्बानी की है। इन बच्चों के नाम हैं आयुष जो तेरह साल का है और हनी जो छः साल का है। हालाँकि इनके नाम और उम्र से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि काफिर तो काफिर ही है।
वैसे आपको पता होना चाहिए कि साजिद नाम का अर्थ होता है जो केवल परमेश्वर के सामने झुकता है और इसीलिए साजिद झुक नहीं सकता है। इससे समझ में ये आना चाहिए कि साजिद इनकी गर्दनें काटने के लिए झुका नहीं था बल्कि आयुष और हनि खुद उसके पास अपनी गर्दन लेकर गए और उन्होंने अपना सर दे दिया। इस वारदात के बारे में हमारे कुछ वरिष्ठ पत्रकार यह कह रहे हैं कि साजिद ने हत्या की है जो की एक सरासर झूठ है। भले ही उन बच्चों की मां रो-रो के कहे कि वह साजिद तो भैया था फिर गर्दन काट के खून क्यूं पिया? क्योंकि हमारे magsaysay award winner पत्रकारों ने इस बात की पुष्टि नहीं की। यहाँ तक कि हमारे प्रसिद्ध रोज़ेदार फैक्ट चेकर ने भी इस पर अभी तक कुछ नहीं कहा है। जब हमारे जाने माने सम्मानित पत्रकार हत्या की बात नहीं कर रहे तो हम भला इसे कैसे मान लें? कुछ सूत्रों के अनुसार यह भी पता चला है कि पुलिस ने साजिद का एनकाउंटर कर दिया है। हमारे विचार में ये अत्यंत ही दुखद, अन्यायपूर्ण और सरासर असंवैधानिक है। भाई जब हमारा संविधान मजहब का अनुसरण करने की आजादी देता है तो साजिद अपने मजहब का अनुसरण क्यों नहीं कर सकता? अब ऐसा करने से कुछ ही हिंदू तो कम होंगे। इससे किसी का क्या ही बिगड़ा है? वैसे भी देश में 80 करोड़ हिंदू हैं और अगर कुछ हिंदूओं की कुर्बानी दे दी जाए क्योंकि वह काफिर हैं, वाजिब -उल-कत्ल हैं, तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट रहा है। वैसे भी हमारी मुक़द्दस आसमानी किताब की आयतों के अनुसार भी इसकी पूरी अनुमति है (references)। आयुष और हनी के अलावा कुछ और कुरबानी हिंदू भी थे जैसे कन्हैया लाल हो गए, चंदन शर्मा हो गए, और ऐसे कई छोटे-मोटे नाम जिनका आपको पता भी नहीं होगा। हर दिन तो सैकड़ो लोग मरते है। क्या फर्क पड़ता है?

वैसे भी साजिद के मजहब का अबोध बालकों के साथ पुराना इश्क है भले ही वह मदरसों के अंदर हो या मदरसों के बाहर।
मजहब के अनुसार काफिरों को, मुर्तदों को, मुनाफिकों को कत्ल करने की सलाह दी गई है। और अगर कोई यह सलाह मान कर अपने मज़हबी क़ानूनों का पालन करता है तो इसमें क्या गलत है? हिंदू शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में सर धंसा कर क्यूं रह नहीं सकता है? हिंदू अपने बच्चों की गर्दनें क्यू नहीं कटवा सकता?

अरे मेरे प्यारो हिंदुओं, रुको, रोज़े रखो, इफ्तारों में जाओ, जालीदार टोपी पहन के गले मिलो, अजमेर शरीफ और हाजी अली जैसी दरगाहों में जाकर चादरें चढ़ाओ, भाईजान बनो, भाईचारा बढ़ाओ। मेरे प्यारे हिंदुओं भाईचारा निभाने के लिए सिर्फ़ उनका भाई बनना काफ़ी नहीं है। आपको उनके लिए चारा भी बनना पड़ेगा।

खैर, हम तो सिर्फ़ आपको सच बता सकते हैं और भाईचारे का रास्ता बता सकते हैं। आपने क्या समझा ये हमें कमेंट्स में बताना न भूलें। आपके विचारों का हमें इंतज़ार रहेगा। मिलते हैं अगली बार भाईचारे का एक और पैग़ाम लेकर। तब तक के लिए, नमस्कार।

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