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04/02/2023
26/01/2023
17/06/2022

पिछले महीने जून में मैं महीने भर के लिए हरिद्वार में था, एक दिन चंडी देवी दर्शन को जाने का मन हुआ, विस्वास ही नही हुआ कि, इस गर्मी में वहां इतनी भीड़ थी,

मंदिर और उसका परिसर, भयानक बेलगाम भीड़, दो सेकेंड से ज्यादा शायद ही कोई विग्रह के समक्ष ठहर पाया होगा,

उससे पहले शिवरीनारायण मेले में भीड़ देखी, यहां तक भगवान को भोग लगाने के समय जब पट बंद हुए तो देखा कि लोग पट बंद होने का विरोध करने लगे, मंदिर में ही लोग चिल्लाने लगे थे,

अब केदारनाथ की खबरें आ रही हैं, लोगों को ढोने वाले करीब 400 घोड़े खच्चर मर गए इस साल, मोटे मुस्तंडों को ढोते ढोते,

राजा दशरथ चक्रवर्ती सम्राट थे किंतु पुत्रेष्टि यज्ञ के निमित्त ऋषि श्रृंगि के समक्ष अपने पैरों से नंगे पैर चलकर गए थे,

राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों के तर्पण के लिए राजा दिलीप के प्रारम्भ से भगीरथ तक ने अपने पुरुषार्थ से गंगावतरण कराया,

चौदह वर्षों तक वन वन भटकने वाले भगवान राम ने किसी की सवारी नही की, बारह वर्ष तक वनवास भोगने वाले सपत्नीक पांडवों ने कभी रथ आदि का उपयोग नही किया,

माता पार्वती शंकर जी को पाने के लिए तपस्या करने सुदूर वन में गईं तो घोड़ों पे चढ़कर नही गईं थीं, ध्रुव, प्रह्लाद आदि किसी सुविधा को लेकर नही वरन सुविधा त्याग कर ईश्वर को उपलब्ध हुए,

भगवान बुद्ध ने, महावीर ने, वर्षों अविचल रहकर तप किया, स्वयं चारों धामों की संकल्पना और स्थापना करने वाले आदि गुरु शंकराचार्य ने साधनादि को छोड़कर भारत भ्रमण किया था,

जाने ऐसे कितने उदाहरण हमारा इतिहास दे सकता है जिससे यह सिद्ध हो कि, ईश्वर प्राप्ति का एक मात्र उपाय समर्पण और तपस्या ही है,

किन्तु अब एक दूसरी परिपाटी चल निकली है, हमने संकल्प किया कि केदारनाथ जाना है, अब किसी को हैलीकॉप्टर चाहिए जो सीधा बाबा के प्रांगण में उतार दे, और जो अफोर्ड नही कर सकते वे AC गाड़ियों में जाएंगे, फिर वहां से घोड़े या खच्चर हायर करेंगे, एक दृश्य तो विचलित करने वाला था जिसमें एक सांड सा आदमी अपने से तीन गुने कम हाड़ मांस वाले आदमी की पीठ पर बैठकर यात्रा कर रहा था,

मतलब, क्या समझ लिया हमने धार्मिक यात्राओं को..? क्या समझ लिया देव विग्रहों को..? देवताओं को..?

मुझे नारियल फोड़ने को यदि पत्थर ना मिले तो क्या मैं वहां खड़े किसी आदमी के सर में मारकर नारियल फोड़ दूं, और बदले में उसे दस रूपए दे दूं..?

ये मूक और निरीह जीव जिसमें गरीब मनुष्य तथा घोड़े खच्चर शामिल हैं ये सिर्फ अशक्त लोगों के निमित्त हैं,

तीर्थ क्षेत्र में जाकर जाने अनजाने हम कैसा जघन्य पाप कर रहे हैं, क्या ईश्वर हमें क्षमा करेंगे..?

पुनश्च,

तीर्थयात्रा ना हुई, पिकनिक हो गया, सुनने को भी यही मिलता है, 'चलो इस बार केदारनाथ घूमकर आते हैं'

© दिनेश धीवर 'नयन'

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