15/07/2026
हिन्दी में ‘बाल साहित्य’ के बाद सीधे ‘बड़ों का साहित्य’ आ जाता है, जबकि बाँग्ला में इन दोनों के बीच एक श्रेणी ‘किशोर साहित्य’ की होती है, जिसमें रहस्य-रोमांच से भरपूर साहसिक, जासूसी, भूतिया इत्यादि कहानियाँ और उपन्यास होते हैं।
किशोर साहित्य को बाँग्ला में सम्मानजनक स्थान मिला हुआ है और यही कारण है कि प्रायः सभी बड़े एवं नामचीन बाँग्ला लेखकों ने किशोरों को ध्यान में रखकर कुछ-न-कुछ लिखा है। कुछ लेखक तो किशोर साहित्य के लेखक के रूप में ही ज्यादा जाने जाते हैं। बाँग्ला का किशोर साहित्य न केवल स्तरीय एवं उत्कृष्ट है, बल्कि इसका जखीरा भी बहुत विशाल है।
बाँग्ला साहित्य के महान लेखक विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय ने किशोरों को ध्यान में रखकर पाँच उपन्यास लिखे हैं, जिनमें से चार को साहसिक गाथाओं और एक को जासूसी कहानी की श्रेणी में रखा जा सकता है। पाँचों कहानियों के हिन्दी अनुवाद इस संग्रह में शामिल हैं।
संग्रह की पहली कहानी ‘चाँद का पहाड़’ अफ्रीका के जंगल-पर्वतों में एक भारतीय किशोर शंकर रायचौधरी के रोमांचक अभियान की गाथा है। पुर्तगाली खोजी (स्वर्णान्वेषी) दियेगो अलवरेज उसके मार्गदर्शक होते हैं। इस गाथा को “महान भारतीय साहसिक गाथा” की उपमा दी जा सकती है। मूल बाँग्ला उपन्यास की भूमिका में लेखक ने स्पष्ट किया है कि यह कहानी किसी विदेशी कहानी पर आधारित नहीं है, बल्कि इसकी घटनाएं एवं पात्र उनकी खुद की कल्पना की उपज हैं। हाँ, अफ्रीका की भौगोलिक स्थितियों के वर्णन के लिए उन्होंने कुछ विदेशी भू-पर्यटकों की पुस्तकों की मदद ली है।
दूसरी कहानी ‘सुन्दरबन में सात साल’ में गंगासागर मेले में एक बालक जलदस्युओं के चंगुल में पड़कर सुन्दरबन के जंगलों में पहुँच जाता है और वहाँ वह सात वर्षों तक रहता है। बेशक, उसके दो दोस्त भी बन जाते हैं वहाँ। इस दौरान तरह-तरह के रोमांचक एवं जोखिम भरे अनुभवों से गुजरता है वह। इस कहानी की शुरुआत (लगभग एक तिहाई अंश) भुवन मोहन राय ने 1895 में की थी। 1950 से पहले विभूतिभूषण ने (लगभग दो-तिहाई अंश लिखते हुए) इसे पूरा किया।
तीसरी कहानी ‘वीरान टापू का खजाना’ में रहस्यमयी सुलू सागर में स्थित एक वीरान एवं अज्ञात टापू का जिक्र है, जहाँ घने जंगलों के नीचे 9वीं शताब्दी के एक हिन्दू राजा की राजधानी के ध्वंसावशेष दबे हैं और उन ध्वंसावशेषों में कहीं छुपा है राजसी खजाना। नवयुवक सुशील एक पुराने जहाजी जमातुल्ला और अपने चचेरे भाई सनत के साथ इस टापू के रोमांचक अभियान पर निकलता है।
चौथी कहानी ‘मिश्मी लोगों का कवच’ एक जासूसी कहानी है, जिसमें एक किशोर जासूसी का प्रशिक्षण अभी ले ही रहा होता है कि उसके मामाजी पड़ोसी गाँव की एक हत्या की गुत्थी सुलझाने की जिम्मेवारी उस पर डाल देते हैं। कहानी के अन्तिम हिस्से में पारलौकिकता का भी पुट है, जो कि (पूर्वोत्तर भारत की एक जनजाति) मिश्मी लोगों द्वारा युद्ध से पहले पहने जाने वाले रक्षा-कवच पर केन्द्रित है।
पाँचवी एवं अन्तिम कहानी ‘मौत का डंका’ युद्ध पर आधारित साहसिक एवं प्रेम कहानी है। परिस्थितिवश दो भारतीय नवयुवक चीन पहुँचकर चीन-जापान के दूसरे युद्ध (1937-45) में चीन की ओर से शामिल हो जाते हैं। दो अमेरिकी नर्सों के साथ उनकी दोस्ती भी हो जाती है। युद्ध की विभीषिकाओं के बीच कई बार वे सभी मौत के मुँह में जाने से बचते हैं।
किशोर उम्र के पाठक-पाठिकाओं के लिए खास तौर पर लिखी गयी कहानियों से उनका सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होना चाहिए, बल्कि उनकी जानकारियों में वृद्धि भी होनी चाहिए— इस बात को ध्यान में रखकर संग्रह के अन्त में एक विस्तृत परिशिष्ट जोड़ा जा रहा है।
आशा है, किशोर पाठक-पाठिकाओं को यह संग्रह पसन्द आयेगा। देखा जाय, तो किशोरों को उनके जन्मदिन पर उपहार के रूप में अथवा विद्यार्थियों को प्रतियोगिताओं में पुरस्कार के रूप में देने के लिए यह पुस्तक सर्वथा उपयुक्त है।
पुस्तक का लिंक: https://store.pothi.com/book/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%B7%E0%A4%A3-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%95-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%B0-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8/