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देखले??? 😂 D
03/01/2023

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आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
02/01/2023

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श्रीराम's   -   - Business Revolution दस हज़ार करोड़ 🌳
18/12/2022

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माँ का आशीर्वाद लेकर मैं श्रीराम  #अखंडभारतजोड़ो यात्रा की घोषणा करता हूँ।जय बजरंगबअली🚩
17/09/2022

माँ का आशीर्वाद लेकर
मैं श्रीराम #अखंडभारतजोड़ो यात्रा की घोषणा करता हूँ।

जय बजरंगबअली🚩

पीले-पीले फूल खिल गए अमलतास की डाल परयाद तुम्हारी टाँका किसने मौसम की रूमाल परअमलतास को देखकर शंकर राव नायडू की यह दो पं...
04/05/2022

पीले-पीले फूल खिल गए अमलतास की डाल पर
याद तुम्हारी टाँका किसने मौसम की रूमाल पर
अमलतास को देखकर शंकर राव नायडू की यह दो पंक्तियाँ सहज ही याद आती हैं। हमारे यहां की गर्मियाँ पलाश, गुलमोहर और अमलतास की शोभा से ही सजी धजी हैं। इसके जाते जाते कुटज आएंगे उनकी बात तब करेंगे। यह गर्मियों के तीन 'क' में से एक है, कर्णिकार। यह अपने अम्लीय तासीर के कारण यह अमलतास के नाम से ज्यादा लोकप्रिय है। डोगरी में इसे करोंगल पुकारते वहीं गुजरात मे इसका स्थानीय नाम गीरवाला है। हमारे यहां छत्तीसगढ़ी में इसे सोनारी कहते हैं और बस्तर में इसे डोन्डेरा कहते हैं। छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से सरगुजा में यह धनबो कहलाता है। अमलतास महत्वपूर्ण औषधीय पादप है पर ज्यादातर लोग इसके पीले फूलों की झालर से ज्यादा आकर्षित हैं।
कुछ साल पहले यह जानकर हैरान हुआ था कि इसके फूलों का साग बनता है। इन फूलों को पहले उबाल लिया जाता है फिर जैसे बाकी साग बनता है, वैसे ही बना लीजिए। अभी पढा कि गुजरात मे इसका गुलकंद बनता है। मैंनें अमलतास को हमेशा जंगलों में देखा है जहां यह अपने पीले फूलों का झूमर लिए अलग ही नजर आता है। प्रस्तुत तस्वीरों में से एक तस्वीर मैंने तीन साल पहले ली थी जिसमें एक पूरा पेड़ ही दिखाई दे रहा है। यह पेड़ मेरी रहगुजर में था जिसे पिछले साल जाने किस इंसानियत के दुश्मन ने काट दिया! मेरी राह यह दोस्त अब नजर नहीं आता, उसकी यह तस्वीर भर बाकी है। मन कसक उठता है आज भी उसका ठूंठ देखकर।
इधर फेसबुक पर ही एक कविता मिली कुमार शिव जी की। इसका शीर्षक है, 'तुमने छोड़ा शहर'। कविता में इस मौसम के फूलों के साथ एक याद चल रही है। यह कविता अच्छी लगी सो अपनी इन तस्वीरों के साथ इसे साझा कर रहा हूँ। अमलतास का शुक्रिया कि इस बहाने कुछ अच्छा पढ़ने को मिल जाता है।
तुम ने छोड़ा शहर
धूप दुबली हुई
पीलिया हो गया है अमलतास को
बीच में जो हमारे ये दीवार थी
पारदर्शी इसे वक्त ने कर दिया
शब्द तुम ले चलीं गुनगुनाते हुए
मैं संभाले रहा रिक्त ये हाशिया
तुमने छोड़ा शहर
तम हुआ चम्पई
नींद आती नहीं है हरी घास को
अश्वरथ से उतर कर रुका द्वार पर
पत्र अनगिन लिए सूर्य का डाकिया
फिर मेरा नाम ले कर पुकारा मुझे
दूरियों के नियम फेंक कर चल दिया
तुम ने छोड़ा शहर
उड़ रही है रुई
ढक रहे फूल सेमल के आकाश को
दौड़ता ही रहा अनवरत मैं यहाँ
तितलियों जैसे क्षण हाथ आए नहीं
जिन्दगी का उजाला छिपा ही रहा
दिन ने मुख से अधेंरे हटाए नहीं
तुमने छोड़ा शहर
याद बन कर जूही
फिर से महका रही घर की वातस को
भीड़ के इस समन्दर में हम अजनबी
एक अदृश्य बंधन में बंध कर रहे
जंगलों में रहे, पर्वतों में रहे
हम जहाँ भी रहे कोरे कागज रहे
तुमने छोड़ा शहर
नाव तट से खुली
शंख देखा किए रेत की प्यास को
from Piyush Kumar's wall.

03/02/2022

“जल, जमीन, जंगल का संघर्ष ‘स्प्रिंग थंडर’ में फिल्म समीक्षक व पत्रकार दीपक दुआ लिखते हैं https://t.co/slDM3qdE5y”

Spring Thunder: A fight for Jal Jungal Jameen Dedicated to people of JharkhandExclusively available on Bollywood UncutDi...
27/01/2022

Spring Thunder: A fight for Jal Jungal Jameen
Dedicated to people of Jharkhand
Exclusively available on Bollywood Uncut

Directed by: Sriram Dalton
Produced by: Megha Dalton & Shashi Singh
https://youtu.be/vEe0A36ZuzE

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