Shiv Shivaye

Shiv Shivaye Guru Siyag ki Shishya

https://youtu.be/MtyJAya1gik
30/05/2026

https://youtu.be/MtyJAya1gik

Enjoy the videos and music you love, upload original content, and share it all with friends, family, and the world on YouTube.

26/05/2026

. ۞═══════════════۞
कुण्डलिनी और मृत्योपरांत
सूक्ष्म शरीर का रहस्यमय ज्ञान ۞═══════════════۞

जिस प्रकार स्थूल शरीर का निर्माण अणुओं के समूह से होता है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर का भी निर्माण सूक्ष्मतम परमाणुओं के समूह से होता हैं। दोनों शरीर में कहीं कोई वैषम्य नही है। जैसे स्थूल शरीर काम करता हैं वैसे ही सूक्ष्म शरीर भी काम करता है।

दोनों शरीर में अन्तर बस इतना ही है कि सूक्ष्मतम परमाणुओं के कणों से निर्मित होने के कारण उसकी गति एक मिनट में तीन-चार हजार मील से भी अधिक हो सकती है, उसकी गति निर्बाध होती हैं। कोई भी भौतिक पदार्थ उसकी गति में विघ्न उपस्थित नहीं कर सकता।

जब किसी भी अवस्था में हमारी चेतना हमारे स्थूल शरीर से बाहर निकलती है तो हमारे सूक्ष्म शरीर को साथ लेकर निकलती हैं, क्योंकि वह बिना शरीर के रह ही नहीं सकती। चेतना का अस्तित्व शरीर में ही प्रकट होता है। भले ही वह भौतिक शरीर हो या अन्य कोई शरीर। शरीर के बाहर निकलने पर जो अशरीरी अनुभव होता हैं, उसे आत्मा का अनुभव समझना चाहिए।

जितना भी अशरीरी अनुभव होता है वह सब सूक्ष्म शरीर के माध्यम से होता हैं। निंद्रा के समय में भी कभी-कभी निस्स्वभाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और हम उस समय स्वप्नावस्था में अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा किसी अन्य जगत की यात्रा पर निकल पड़ते हैं, लेकिन उस समय हमारी चेतना को जो अशरीरी अनुभव होता हैं उसे हमारा मस्तिष्क बहुत ही अल्प मात्रा में ग्रहण कर पाता हैं, खैर...।
۞════════════۞
चक्र और कुण्डलिनी ۞════════════۞

हमारे भीतरी शरीर केवल पांच-छः और सात स्थानों पर आपसे में मिले हुए हैं वैज्ञानिक भाषा में उनको कान्टेक्ट फील्ड कहते हैं और योग की भाषा में कहते हैं चक्र। जिन बिन्दुओं पर सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से जुड़ता है उनका नाम 'चक्र' हैं।

उस बिन्दु यानी चक्र के चारों ओर बर्तुलाकार रूप में एक नैसर्गिक विद्युत शक्ति हर समय बराबर चक्कर काटती रहती है, योग उसी नैसर्गिक विद्युत शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति कहता है। दोनों शरीरों को भिन्न-भिन्न बिन्दुओं पर जोड़ने वाली जो विद्युत चुम्बकीय शक्ति हैं वह यदि आपस में मिल जाय तो वह कुण्डलिनी शक्ति का अनुभव होगा।

कुण्डलिनी शक्ति के अनुभव का कुछ अर्थ बस इतना ही है कि अलग-अलग जिन-जिन बिन्दुओं पर दोनों शरीर आपस में मिल रहे हैं और वहाँ जो शक्ति एकत्र हो गई है अथवा हो रही है वे आपस में मिल जायें। लेकिन यह सरल और सहज नहीं हैं। सभी बिन्दुओं और शक्तियों को आपस में मिलाने की अपनी यौगिक कला हैं, जिसे योग की भाषा में कुण्डलिनी साधना कहते हैं।

जब किसी कारणवश स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर बाहर निकल जाता है, तो उस अवस्था में स्थूल शरीर से उसका संबंध कैसे जुड़ा हुआ रहता है, यह प्रश्न सभी के मन में उठना स्वाभाविक है।

ज्ञात होना चाहिए कि मिलन के जो बिन्दु हैं उनमें एक सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु हैं जो नाभि से जुड़ा हुआ है। बाहर निकलने पर सभी अन्य बिन्दुओं से तो सूक्ष्म शरीर का संबंध भंग हो जाता है लेकिन उस बिन्दु से नहीं।

सूक्ष्म शरीर एक विशेष सूक्ष्मतम तन्तु द्वारा उस बिन्दु से बराबर अपना सम्पर्क बनाएं रखता है ताकि वह वापस लौट सके स्थूल शरीर में, और स्थूल शरीर में प्रवेश करते ही उसका संबंध अन्य बिन्दुओं से अपने आप जुड़ जाता है।

जिसे सूक्ष्मतम तन्तु कहा है, उसे योगीगण रजत रज्जु कहते हैं, इसलिए कि उसका रंग सफेद धागे की तरह होता है और वह बाल के पांचवे हिस्से के बराबर पतला होता है, इसलिए आंखो से दिखलायी नहीं देता। लेकिन विशेष यंत्रो द्वारा वैज्ञानिकों ने उसे देखा हैं और उसे नाम दिया है 'सिल्वर कॉट'।

मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर जहां और जितना दूर जाता हैं वहां तक वह तन्तु बढ़ता जाता है। जिस स्थिति में जिस अवस्था में और जिस स्थान पर सूक्ष्म शरीर रहता है वहां उस सूत्र के माध्यम से वह स्थूल शरीर से जुड़ा हुआ रहता है। लेकिन मृत्यु के समय यह स्थिति नहीं रहती हैं।

मृत्यु के समय नाभि के निकटस्थ बिन्दु से भी सूक्ष्म शरीर अपना संबंध तोड़ लेता हैं, जिसके फलस्वरूप वह पुनः स्थूल शरीर में वापस लौटने में असमर्थ हो जाता है।

लेकिन कब चाहता है सूक्ष्म शरीर अपने साथी स्थूल शरीर का साथ छोड़ना, उसमे तो स्थूल शरीर की तरह परिवर्तन तो होता नहीं। परिवर्तन होता है स्थूल शरीर में लेकिन उसका प्रभाव अवश्य पड़ता है सूक्ष्म शरीर पर।

मृत्यु दो प्रकार की होती है सहज मृत्यु और असहज मृत्यु। सहज मृतयु को प्राकृतिक मृत्यु कहते हैं। इस मृत्यु के पूर्व सूक्ष्म शरीर क्रम से एक-एक सम्पर्क बिन्दु से अपना संबंध तोड़ता हैं और अन्त में तोड़ता हैं मुख्य बिन्दु से।

पहले बिन्दु से संबंध टूटने पर नेत्र की ज्योति मन्द से मन्दतर होने लगती है। दूसरे बिन्दु से संबंध टूटने पर स्मृति दोष उत्पन्न होने लगता है, स्मृति कमजोर होती चली जाती है। तीसरे बिन्दु से संबंध टूटने पर स्वाद समाप्त हो जाता हैं। भोज्य पदार्थों के प्रति रुचि कम जागृत होती है।

चौथे बिन्दु से सम्पर्क भंग होने पर निद्रा का समय कम होने लगता है। कभी-कभी पूरी रात नींद ही नही आती। भौतिक पदार्थों अथवा वस्तुओं के प्रति आकर्षण भी समाप्त होने लगता हैं, मनमे एक अरुचि सी उत्पन्न हो जाती हैं। पाचवें बिन्दु से सम्पर्क टूटने पर शरीर शिथिल और कमजोर होने लग जाता है।

एक स्थान को छोड़कर अन्यत्र जाने की भी इच्छा नही होती। सदैव मौन रहने की ही इच्छा रहती हैं। छठें बिन्दु से संबंध भंग होने पर सोच विचार और निर्णय करने क्षमता का ह्रास हो जाता हैं। श्वास-प्रश्वास की गति में भी शिथिलता उत्पन्न होने लगती हैं। सातवें बिन्दु से सम्पर्क टूटते ही व्यक्ति गहरी निद्रा की स्थिति में चला जाता है और उसी अवस्था में उसकी मृत्यु हो जाती हैं।

लेकिन जो योगी, साधकगण रजतरज्जु द्वारा अपने स्थूल शरीर को सुरक्षित छोड़कर सैकड़ों वर्ष तक सूक्ष्म शरीर द्वारा साधना करते हैं उनकी बात अलग है। वे हठ योग द्वारा स्थूल शरीर को इतना साध लेते हैं इतना सक्षम बना लेते हैं और बना लेते हैं इतना योग्य की सभी मिलन बिन्दुओं से सूक्ष्म शरीर का संबंध तोड़ भी लेते हैं और जोड़ भी लेते हैं समयानुसार।

वे दोनों कलाओं से परिचित होते हैं, तोड़ने की कला से भी और जोड़ने के कला से भी, सूक्ष्म शरीर के अलग होने पर स्वभावतः स्थूल शरीर को नष्ट हो जाना चाहिए, जैसा कि प्राकृतिक नियम है, लेकिन ऐसा होता नहीं।

इसलिए कि स्थूल और सूक्ष्म शरीर के बीच में जो छाया शरीर हैं उसका अस्तित्व स्थूल शरीर के साथ बराबर बना रहता है, भले ही सैकड़ों वर्ष क्यों न व्यतीत हो जाय, वह नष्ट नहीं होगा, बराबर बना रहेगा स्थूल शरीर के साथ।

एक बात और यहाँ समझ लेना चाहिए कि सम्पर्क बिन्दु के रूप में जिन चक्रों और उनकी शक्तियों की चर्चा हुई है वे सब सूक्ष्म शरीर में हैं स्थूल शरीर में तो उनके केवल सम्पर्क बिन्दु के स्थान मात्र हैं, जो स्पष्ट दिखलायी देते हैं।

एक विषय थोड़ा अधूरा छूट जाता है और वह है असहज मृत्यु यानी अप्राकृतिक मृत्यु। किसी भयंकर दुर्घटना के कारण, एकाएक हृदय गति के बन्द हो जाने के कारण, इन दोनों के अतिरिक्त फांसी से, विष से और पानी में डूबने के कारण मृत्यु जब होती हैं तो उस अवस्था में एकाएक सूक्ष्म शरीर अलग नहीं होता हैं। उसे अलग होने में समय लगता हैं और जब तक सूक्ष्म शरीर अलग नहीं होता तब तक सच्चे अर्थो में मृत्यु भी नहीं होती। वह अवस्था बड़ी ही विषम और दारुण होती है।

घटना घटने के बाद सर्वप्रथम नाभि के निकट जो कान्टेक्ट फील्ड हैं उससे सूक्ष्म शरीर का संबंध टूटता है। उसके पश्चात अन्य कान्टेक्ट फील्डों से और अन्त में भंग होता है संबंध उसका हृदय के निकट के 'कान्टेक्ट फील्ड' से और तब होती है वास्तविक मृत्यु। दुर्घटना घटने और वास्तविक मृत्यु होने के बीच समय की कोई सीमा नही है, दो से आठ घंटे भी लग सकते हैं और इससे अधिक भी।

https://youtu.be/l5SgyR0feGU
25/05/2026

https://youtu.be/l5SgyR0feGU

Enjoy the videos and music you love, upload original content, and share it all with friends, family, and the world on YouTube.

https://youtu.be/a__LnLsa42Q
24/05/2026

https://youtu.be/a__LnLsa42Q

गुरु भाई गजानंद जी ऑटो वाले पलाना👇👇+919252896281

https://youtu.be/csrWlwTrnhY
24/05/2026

https://youtu.be/csrWlwTrnhY

Enjoy the videos and music you love, upload original content, and share it all with friends, family, and the world on YouTube.

Address

Delhi

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Shiv Shivaye posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Shiv Shivaye:

Share