23/08/2022
हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा और शिक्षण संस्थानों को चुनने की बात आज भी जब होती है, तो देश के 33 सैनिक स्कूल अग्रदूत की तरह टिके हुए नज़र आते हैं। और मेरी पढाई भी ऐसे ही एक सैनिक स्कूल, सैनिक स्कूल तिलैया से हुई है। इस स्कूल ने मुझे क्या-क्या दिया है, इसका वर्णन शब्दों में कर पाना बहुत कठिन है लेकिन मैं अपने छोटे भाइयों जो ऐसे ही किसी स्कूल की तैयारी में लगे हुए हैं और उनके माता -पिता जिनके मन में फीस, रैगिंग, छुट्टियाँ आदि तमाम चीज़ों को लेकर ऊहापोह की स्थिति चल रही है, के लिए जरूर कुछ कहना चाहता हूँ। मैंने इस स्कूल में 2001 से 2002 तक पढ़ाई की और यहाँ से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। दसवीं की बोर्ड परीक्षा की बात इसीलिए क्योंकि वह वक़्त अब भी मेरे जहन में चलचित्र की तरह चलता रहता है। मैं, मेरे दोस्त सलिल सरोज, जो अभी लोक सभा सचिवालय में कार्यकारी अधिकारी हैं, के साथ बोर्ड परीक्षा से तीन महीने पहले से रोज़ लगभग 14 घंटे की पढ़ाई साथ-साथ करते और हर विषय के सेम्पल पेपर्स सॉल्व करते और यह सिलसिला लगातार बोर्ड परीक्षा तक चलता रहा। हम दोनों एक साथ पढ़ते तो थे लेकिन प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही थी। वो मेरी कॉपी चेक करता और मैं उसकी और इसका परिणाम यह था कि हम दोनों ने बोर्ड परीक्षा में बेहतरीन अंक हासिल किए। यह स्कूल दोस्ती, प्रतिस्पर्धा, सहयोग, साथ और एकता सिखाने की मिशाल है। यहाँ हर बच्चे को खेल-कूद, पढ़ाई, स्पीच, सामाजिक कार्य जैसे श्रमदान आदि के लिए तैयार करते हुए जीवन की कठिनाओं को पार पाने की तरकीबें भी सिखाई जाती हैं। कमोबेश ऐसी गतिविधियाँ हर स्कूल में होती है।
मेरे स्कूल के जैसे अन्य स्कूल में घटी कहानियों को किताब के रूप में संकलित किया है मेरे दोस्त सलिल सरोज और अमित झा ने। इस किताब में हास्य, रूदन, क्रोध, ईर्ष्या, मोहब्बत हर भावना की कहानियां एक बच्चे की नज़र से लिखी गई गई जो कहीं ना कहीं आपको अपनी कहानी लगेगी। मैंने अपनी प्रति खरीद ली है। आप भी सहयोग करें और इसे खरीदें और अपने दोस्तों को भी बताएँ। किताब आर्डर करने का लिंक