Vedic net

Vedic net Vedicnet is setup to support customer in their spiritual and cultural journey so that convenience and quality can be experienced.

we are presenting ourself as network of products and services providers for your spiritual Yatra.

Wonderful online lecture delivered by Dr. Hitarthi Vyas on Clock controlled cardiovascular health. This lecture was deli...
12/06/2024

Wonderful online lecture delivered by Dr. Hitarthi Vyas on Clock controlled cardiovascular health. This lecture was delivered under banner of Science Dialogue series, a free webinar series initiated by me and helped by my friends and students. Thank you Dr. Hitarthi for sharing your knowledge.

You can watch recorded lecture 'on Biotechnology and artificial intelligence' if missed lived and interactive lecture. Y...
12/03/2024

You can watch recorded lecture 'on Biotechnology and artificial intelligence' if missed lived and interactive lecture. You should also subscribe channel to know about next events/free webinar/courses etc.

This lecture was delivered by Dr. Ashwini Kumar, Asst. Professor, Sharda University under Science Dialogue Series( A free webinar series) Initiated by Dr. G...

Biobank facility in South India.
15/11/2023

Biobank facility in South India.

HYDERABAD: A biobank, which will house tissue samples of a lakh healthy people to enable researchers study the onset and progression of diseases, was .

C.G.Bhakta Institute of Biotechnology is going conduct 8th batch of online certificate course in Basics of Genomics and ...
10/11/2023

C.G.Bhakta Institute of Biotechnology is going conduct 8th batch of online certificate course in Basics of Genomics and proteomics from 24th November. This is 30 hours course ( Live lectures will be delivered) and course fee is only Rs. 700 for all. Resource persons of this course are from top institute like JNU, IIT, MSU etc. having not only theoretical knowledge but also have practical knowledge of the topic. Since lectures will be live you can ask questions and discuss any time during session( which is not possible in recorded lecture). You can watch feedback of participants on my LinkedIn page.

जय होभीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले," पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ?उनका ध्यान रखना , परिवार के ब...
07/06/2022

जय हो
भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले," पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... !

कृष्ण चुप रहे .... !

भीष्म ने पुनः कहा , "कुछ पूछूँ केशव .... ?
बड़े अच्छे समय से आये हो .... !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " .... !!

कृष्ण बोले - कहिये न पितामह ....!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न .... ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ... मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ... ईश्वर नहीं ...."

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े .... ! बोले , " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे .... !! "

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले .... " कहिये पितामह .... !"

भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या .... ?"

"किसकी ओर से पितामह .... ? पांडवों की ओर से .... ?"

" कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था .... ? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ और द्रोणाचार्य के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या .... ? यह सब उचित था क्या .... ?"

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह .... !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ..... !!
उत्तर दें दुर्योधन, दुःशाशन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन .... !!

🌱🌱🌱🌱🌱🌱

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह .... !!

"अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण .... ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है .... !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण .... !"

"तो सुनिए पितामह .... !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ .... !
वही हुआ जो हो होना चाहिए .... !"

"यह तुम कह रहे हो केशव .... ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ..... ? "

"इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... !

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था .... !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह .... !!"

" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो .... !"

" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह .... !
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण, मंदोदरी, माल्यावान जैसे सन्त हुआ करते थे ..... ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!"

"तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव .... ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा .... ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??"

ॐॐॐॐॐॐॐ

" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... !

वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा .... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह .... !
तब महत्वपूर्ण होती है धर्म की विजय , केवल धर्म की विजय .... !

भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह..... !!"

"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव .... ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?"

"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह .... !

ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !केवल मार्ग दर्शन करता है

सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है .... !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न .... !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ?
यही प्रकृति का संविधान है .... !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से .... ! यही परम सत्य है ..... !!"

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे......उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी .... !
उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है .... कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण .... !"

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था .... !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।

अहिंसा परमों धर्मः
धर्म हिंसा तथैव च |

ॐ सनातनः

🙏

12/05/2022

*🚩🙏 दुर्गा सप्तशती_और_गीता*

श्रीमद्भागवत गीता अर्थात श्री भगवान श्री कृष्ण ने गायी यद्यपि गीता एक उपदेश है फिर भी उसे गीता लयबद्ध रचना कहा गया है क्योंकि कर्म के दुस्तर सागर के ऊपर तैर रहा है वह निष्काम कर्म योग का उपदेश है जिसमें गान का सा माधुर्य है लय है वह तिरंगावलियों से ऊपर उठकर कर्मवीचियों के नर्तन को देखते रहने का दृष्टा भाव भी है। ऐसी अवस्था ज्ञान की ही होती है और आश्चर्य यह है कि इस गीत को अतीव चंचल तथा घटना प्रधान समरांगण में गाया गया है बांट के टुकड़े को बंसी बनाकर आये रागपुरुष के लिए ज्ञान ही एकमात्र शैली है वह पूर्ण पुरुष राग में ही व्यक्त हो सकता है इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि तटस्थभाव का सोदाहरण विवेचन कर्म संवेग में अच्छी तरह समझ में आ सकता है।

गीता वेदांत का ग्रंथ है इसका प्रमुख पात्र अर्जुन है मोह के आवेश में से उत्पन्न अवसाद अर्जुन को अक्रांत कर देता है उसके प्रश्नों में उत्सुकता नहीं है एक निराश भाव है जो कृष्ण से सीधा उत्तर मांगता है इस जय पराजय से क्या होना है यह व्यर्थ का रक्त पात्र अन्ततः किस लिए यह भविष्य में आहत और वर्तमान से पूछता है कि कृष्ण काल पुरुष है उसमें कर्मसमारंभ की परिणामी स्थितियां समाविष्ट है वह समाविष्ट के नायक हैं वे जानते हैं इसलिए भावीपरिस्थितियों का अवलोकन कर निर्णय सुनाते हैं।

सप्तशती के समाधि सूरथ अपनी वर्तमान मनोदशा से क्षुब्ध है उनके प्रश्नों में कुतूहल है उदासीनता उनमें नहीं है उनका उपद्रष्टा मुनि है उनके मोह की मीमांसा करने के लिए मुनि उपाख्यानों को उदाहरण के रूप में सुनाता है सप्तशती का
*मोह्यन्ते_मोहिताश्वैव_मोहमेष्यन्त्_चापरे*

( मुक्त कर रही हूं मोहित करती रही हूं और मोहबद्ध करती रहूंगी)

मोह को त्रिकाल व्यापृत करने वाली परमेश्वरी का भविष्य काल अर्जुन में है अर्थात अर्जुन भविष्य की चिंता से अवसन्न है और मोहिता का भूतकाल समाधि सूरथ के चरित्र में व्यक्त है प्रकृति की गुणात्मक अवस्था व्यक्ति में ही प्रवृत्त है और समष्टि में भी।
समष्टि मैं वह हर युग का नामकरण करती है जो व्यक्ति में अवस्था का निर्धारण करती है यदि वर्तमान अपने से प्रसन्न करने लगे उसकी जिज्ञासा विवेकोन्मुख हो तो एक रहस्य का अनावरण होता है प्रकृति का चरम तो नहीं पर उसकी शैली का भी परिचय प्राप्त होता है इस दृष्टि से गीता और शक्ति दोनों का बुद्ध एक है गीता का ज्ञान योग की भूमिका प्रस्तुत करती है सप्तशती भक्ति के सुरम्य उपवन से ही होकर परमेश्वरी की कृपा का प्रसाद प्राप्त कर आती है।

गीता का ज्ञानयोग व्यष्टि मे समष्टि दर्शन कराता है सप्तशती का कान्तासम्मित उपदेश समष्टि में व्यष्टि का दर्शन कराता है अर्जुन के मोहपाश को छिन्न करने के लिए भविष्यबद्ध उनको फ़लासक्ति से मुक्त रहने के लिए कृष्ण का उपदेश एक शाश्वत सत्य है कहीं लोग प्रशन्न करते हैं फलहीन कर्म करने में प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती फिर फल को परार्पित करके कोई व्यक्ति कर्म करेगा तो करेगा ही कैसे?
कृष्ण का समाधान दुरूह नहीं है दुरूह तब लगता है जब व्यक्ति की बुद्धि मोहमलाच्छन्न रहती है कर्म के साथ ही उसका परिणाम किवां फल नियत हो जाता है कोई भी काम एक साथ नहीं होता क्रमशः होता है इसलिए कर्म का जितना अंश होता जाता है फल भी उतने ही अंश में बनता जाता है माना हमें खीर बनानी है खीर एक साथ नहीं बनती दूध लाना भी खीर बनने का एक स्तर है चुल्हा जलाना दूध औटाना आदि सारे कर्म खीर बनने के स्तर हैं इन सभी की संपूर्णता खीर का पूरा तरह बन जाना है।

कर्ता का स्तर अथवा पात्रता कर्म विधि कर्म की मात्रा इत्यादि इस प्रकार के आधार हैं जो संपूर्ण होने पर ही अपेक्षित फल प्रकट करते हैं इसलिए कर्म के साथ परिणाम ही फल समवायीभाव से जुड़ा हुआ है उसे कर्म से भिन्न करके देखना मुग्धता नहीं तो और क्या है दूसरी बात यह है कि जब व्यक्ति फल पर केंद्रित हो जाता है तो उसमें कर्म से अधिक फल में रूचि हो जाती है परिणाम यह होता है कि कर्म का स्तर गिर जाता है।

सप्तशती में कर्म की व्याख्या नहीं है उसमें क्रियामयी प्रकृति की शैली का निर्देशन है दोनों ही ग्रंथ व्यक्ति को मोह एवं अहंकार से रहित होने का निर्देश देते हैं अर्जुन को शरणागत होने का उपदेश कृष्ण करते हैं समाधि सूरथ को असुरों का उपाख्यान मुनि कहते हैं की रक्तपात दोनों में है मोह की परिणति ऐसी ही होती है जहां बलि देने की प्रथा प्रचलित है वहां जब तक मेध्य पशु चित्कार नहीं करता घातक खड़ंग नहीं उठाता आशय यह है कि परमा की असिपात पशु पर मोह नही होता है।

जहां मोह अपने पूर्ण बल से प्रकट हुआ ही नहीं वही उसकी असिधार चमकी नहीं सप्तशती के रक्तरंजित आख्यान मोह और दर्प के ध्वंस की ही कथा है इनके रहते पराम्बा का रूप दर्शन कैसे हो सकता है असुरो के रूप में प्रसृत मोह और अंहकार की वाहिनी को वह अव्यवस्था उत्पन्न करने के लिए निर्बंन्ध कैसे छोड़ सकती है।
उसके दिव्य वैभव और अतुलनीय ऐश्वर्य का दर्शन मोह से मुक्त होकर ही किया जा सकता है चण्ड और मुंण्ड देवी के अपरूप सौंदर्य को देखकर मोहित हो जाते हैं

और उसे स्त्रीरत्न को अपने स्वामी के रतनागार में ले जाने के लिए आतुर हो जाते हैं इस प्रचंड मोह का विनाश करने के कारण ही वह चंण्डी और चामुंण्डा बनती है स्त्री के रूप में पाने को अकुल शुंभ निशुंभ में मूर्ख ही निवास कर रहा है और वो की अनर्गल विस्तृति उसके लिए असहनीय है

महाप्रभु महादेव महादेवी की कृपा उन्हें पर आश्रित सचिन पांडे

🌹🌺🌷🙏💐🌼🌞🌻🌸🌳

12/05/2022

#भोजन के प्रकार .....

#भीष्म पितामह ने अर्जुन को ४ प्रकार से भोजन न करने के लिए बताया था ...!
१ ;- पहला भोजन ....
जिस भोजन की थाली को कोई लांघ कर गया हो वह भोजन की थाली नाले में पड़े कीचड़ के समान होती है ...!
२ :-दूसरा भोजन ....
जिस भोजन की थाली में ठोकर लग गई,पाव लग गया वह भोजन की थाली भिष्टा के समान होता है ....!
३ :- तीसरे प्रकार का भोजन ....
जिस भोजन की थाली में बाल पड़ा हो, केश पड़ा हो वह दरिद्रता के समान होता है ....!
४ :-चौथे नंबर का भोजन ....
अगर पति और पत्नी एक ही थाली में भोजन कर रहे हो तो वह मदिरा के तुल्य होता है .....
और सुनो अर्जुन अगर पत्नी,पति के भोजन करने के बाद थाली में भोजन करती है उसी थाली में भोजन करती है या पति का बचा हुआ खाती है तो उसे चारों धाम के पुण्य का फल प्राप्त होता है ...!
चारों धाम के प्रसाद के तुल्य वह भोजन हो जाता है ....!

और सुनो अर्जुन .....
बेटी अगर कुमारी हो और अपने पिता के साथ भोजन करती है एक ही थाली में तो उस पिता की कभी अकाल मृत्यु नहीं होती ....
क्योंकि बेटी पिता की अकाल मृत्यु को हर लेती है ! इसीलिए बेटी जब तक कुमारी रहे तो अपने पिता के साथ बैठकर भोजन करें ! क्योंकि वह अपने पिता की अकाल मृत्यु को हर लेती हैं ...!

☝🏼 #स्मरण रखियेगा !👇🏽

"संस्कार दिये बिना सुविधायें देना, पतन का कारण है ...!"

"सुविधाएं अगर आप ने बच्चों को नहीं दिए तो हो सकता है वह थोड़ी देर के लिए रोए ...
पर संस्कार नहीं दिए तो वे जीवन भर रोएंगे ....!"

12/05/2022

#फक्कड़_घुमक्कड़_2_41

**************************************

भृगुवंशी महर्षि जमदग्निकी पत्नी थीं रेणुका । उनके पांच पुत्र थे , सबसे छोटे पुत्र थे परशुराम। रेणुका ने सरोवर पर चित्ररथ गन्धर्व को अप्सराओं के साथ विहार करते देखकर विचारा कि वह भी जमदग्निके साथ विहार करे । इस अपवित्र सङ्कल्प के आते ही उसका तेज नष्ट हो गया । जब वह लौटकर आयी , तब जमदग्निने उसको हततेज देखकर ध्यानसे विचारा तो सब रहस्य जान लिया । अपवित्र रेणुकाको अपने पास रखना अनुचित जानकार उन्होंने अपने बड़े पुत्रसे कहा तुम रेणुकाका संहार करो । वह यह नहीं कर सका । शेष तीन पुत्र भी यह नहीं कर सके । तब सबसे छोटे पांचवे पुत्र परशुराम ने पिता की आज्ञा पाते ही रेणुका का संहार कर डाला और जमदग्निसे वरदान माँगा कि रेणुका का फिर जीवित होकर पहले की तरह ही हो जाय और उसे बीचकी घटना की कुछ भी खबर न रहे । जमदग्निके 'तथास्तु' कहनेसे रेणुका फिर पूर्वके समान ही पवित्र और वर्चस् से युक्त हो गयी ।

अब आपको इस कथाका अर्थ समझना होगा । जमदग्नि कौन हैं ? उनकी पत्नी रेणुका कौन हैं ? उनके चार पुत्रों सहित पांचवे पुत्र परशुराम कौन हैं ?

सबसे पहले परशुरामजी कौन हैं ?

परशुरामजी को 'भृगुपति ' भी कहते हैं , क्योंकि वे भृगुकुलमें सर्वश्रेष्ठ हैं जैसे रघुकुलमें सर्वश्रेष्ठ श्रीराम 'रघुपति' कहलाते हैं, उसी तरह परशुराम भृगुपति के रूप में प्रसिद्ध हैं

"आयहु भृगुकुल कमल पतंगा !(रा०मा०१/२६७/१) ," देखत भृगुपति बेषु कराला "(रा०मा०१/२६८/१)

आदि गोस्वामी तुलसीदासजी के वचनोंसे यह चरितार्थ ही है ।

अब भृगुपति का वर्णन वेदोंमें इस प्रकार हुआ -
जल तत्त्व या रेतको षट्चक्रोंकी अग्निमें खूब भूनकर भस्म कर देनेके कारण भृगुपति का अर्थ गोपथ-ब्राह्मण में है -

"ताभ्यः श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यः(अद्भय:) यद्भेत आसीत्तदभृज्यत तस्माद् भृगु: समभवत् ,तद् भृगोर्भृगुत्वम् । - (गोपथब्राह्मण १/३)

अर्थात् - तपाये हुए जलों से जो रेत उत्पन्न हुआ, वह भूँजा गया , इसीलिए वह 'भृगु' कहलाया । भूँजने के कारण ही भृगुका भृगुत्व है । जलों को भस्म करने के लिये इस शरीरको यदि भाड़ मान लें यो योगी उसका भड़भूँजा है । वह जलों की भस्म बनाकर उसको अपने शरीर पर लगाता है , यही उसके ब्रह्मचर्य का तेज है । ब्रह्मचारी के शरीर पर जो स्वाभाविक तेज या कान्ति रहती है , वह वीर्यकी भस्म ही है । अर्थात् उसके शरीरमें तपके द्वारा रेतका परिपाक होता है और वह भस्मरूपमें परिणत हो जाता है ।

मेघ भी जलकी भस्म है --

"अभ्रं वा अपां भस्म (शतपथ ०७/५/२/४ )

अग्निका संयोगसे तप्त होकर जल आकाशगामी होता है । इसीलिए तपके द्वारा मनुष्य ऊर्ध्वरेता बनता है । बाहर ब्रह्माण्डमें सूर्यके तापसे जैसे मेघ बनते हैं , वैसे ही शरीरके भीतर तपकी अग्निके द्वारा रसों के परिपाक से रेत की भस्म बनती है । वही शरीरी की त्वचा के ऊपर तेज और कान्तिके रूपमें प्रकट होती है । ब्रह्मचारीके लिये इसप्रकार की भस्म परम विभूति है । यह भस्म ही उसके मण्डन के लिये श्रेष्ठ अंगराग है । इस भस्म से भासित होने के कारण ही बटुरूपधारी शिवको कालिदासने 'ज्वलन्निव ब्रह्ममयेन तेजसा ' लिखा है ।

अब रेणुकाका मलिन होना और परशुराम के द्वारा उसकी मलिनता का नाशकर पुनः शुद्धरूपमें स्थापित करनेकी कथा का मर्म क्या है..,,?

वीर्य या रेत का नाम ही रेणु या रेणुका है । रेणु (रेतस-वीर्य) को भस्म करने वाली शारीरिक अग्नि ही उसका पति जमदग्नि (Metabolic fire) है ।
पाँच चक्र ही उसके पांच पुत्र हैं । सबसे प्रथम अर्थात् मूलाधार-चक्र उसका ज्येष्ठ पुत्र और विशुद्धिचक्र कनिष्ठपुत्र परशुराम है । शेष तीन चक्र तीन पुत्र हैं । यह रेणु (रेतस -वीर्य) चित्ररथ गन्धर्व ( चित्र अर्थात् दृष्टिका विषय )को देखने मात्र से मलीन हो जाता है , मनके अपवित्र विचारों से ही अपवित्र हो जाती है । विकारयुक्त विचार ही मनुष्य की पवित्रता को नष्ट कर देनेके लिये काफी हैं । मानसिक विचारोंकी विकृति से ब्राह्म तेज की तुरन्त हानि हो जाती है । पूर्ण ब्रह्मचर्यकी परिभाषामें शारीरिक क्रिया नीचे की चीज है , मानसिक सङ्कल्पों की पवित्रता सबसे महत्व की वस्तु है । काम के विचार पहले मन में प्रकट होते हैं । काम को मनसिज , मनोभव , मनोज या सङ्कल्प योनि कहा गया है । उसका उदय हमारे भीतरी विचारों में ही देखा जाता है । पूर्ण ब्रह्मचर्यके लिये शुद्ध विचार परम आवश्यक सञ्जीवनी हैं ।

एक बार जब रेणु अपवित्र हो जाती है तब उसका पवित्र करना कितना कठिन है , यह ऊपर की कथा से ज्ञात होता है । प्रथम चक्र की या दूसरे , तीसरे और चौथे चक्र की यह सामर्थ्य नहीं है कि वे अशुद्ध रेतको पुनः पूर्ववत् शुद्ध कर सकें । इसीलिए रेणुका के पहले चार पुत्र यदि वे चाहते , तो भी जमदग्निकी इच्छानुसार अपनी माताको नवीन जीवन नहीं दे सकते थे । यह सामर्थ्य परशुराममें ही थी अर्थात् पाँचवे चक्र की शक्ति पर अधिकार प्राप्त योगी अपवित्र और अशुद्ध रेणु को पुनः पवित्र बना सकता है । प्रत्येक चक्र को यदि हम भर्जन-क्रिया की एक एक मंजिल मानें तो पाँचवे पड़ाव को पार करने पर ही रेणुको पूर्णतया भूँजने में सफलता प्राप्त होती है ।
तात्पर्य है जमदग्नि (शारीरिक अग्नि वीर्य भूनने वाली) की पत्नी रेणुका (रेतस -वीर्य) जब चित्ररथ (नेत्रोंका विषय -नेत्रोंके द्वारा) गन्धर्व को देखती है तब , रेणुका का मन अपवित्र हो जाता है ( दृष्टमात्र से ही ) , उसे फिर उसी पवित्र अवस्था लाना परशुराम के अतिरिक्त किसीके वश में नहीं ।

जो ये कहते हैं सोच बदलिये दृष्टिकोण बदलेगा , यह सब विचारों का अन्तर है , मैं उन लोगों को बता दूँ सोच बदलकर शारीरिक और मानसिक स्तर से आप महान् बनने का प्रयास कर सकते हैं , क्योंकि इसका शारीरिक क्रिया पर कोई प्रभाव नहीं होगा किन्तु यौगिक क्रियामें बहुत हानि होती है जिसे आप जान भी नहीं पाते हैं । क्योंकि आपका मन सही है आपका दृष्टिकोण सही है किन्तु चित्र ( नेत्रोंके विषय ) को देखके आपके मन पर बेशक प्रभाव न पड़े किन्तु आपका रेणु मलीन हो जाता है , जिससे आपका वीर्य उर्ध्वमुखी न होकर अधोमुखी ही रहता है और आप ऊर्ध्वरेता नहीं बन सकते , आप योग से भ्रष्ट हो जाते , किन्तु आपको आधुनिक सोच और महानता के चलते इसका ज्ञान ही नहीं , आपके लिये तो केवल बाह्य इन्द्रियाँ ही महत्वपूर्ण हैं । आपने शरीर को ही स्वयं समझ लिया है । आप इससे ऊपर उठ भी कैसे सोच सकते है ?

भगवान् परशुराम आखिर ऐसे ही उर्ध्वरेता ब्रह्मचारी नहीं बन गये.....

10/05/2022

#चरैवेति_१४६

**********************************

सुख दुःख का भोक्ता कौन?

तत्र जरामरणकृतं दुःखं प्राप्नोति चेतनः पुरुषः।
लिङ्गस्याsविनिवृत्तेस्तस्माद् दुःखं स्वभावेन।।
सा.का.55 तत्रेति ;

तेषु देवमानुष तिर्यग्योनिषु,जराकृतं, मरणकृतं चैव दुःखं चेतनः(चेतनवान)पुरुषः प्राप्नोति।

देव मनुष्य और तिर्यग् तीन प्रकार की योनियाँ हैं। देवता तो ऊर्ध्वलोकों में रहने से वे जरा अर्थात् वृद्धापन तथा मरण रूप दुःखों से मुक्त हैं। इनमें से जो इस मर लोक में रहते हैं वे हैं मनुष्य और तिर्यक् योनि वाले।तिर्यग्योनि में से जो चेतनवान पुरुष (पुर+उष = जो चेतनब्रह्म की ऊर्जा अथवा ऊष्मा से चेतनवान),पुरतः+उष: हैं वे चेतनवान ही जरारूप वृद्धावस्था के दुःख और मरण दुःख को पाते हैं।

"न प्रधानं,न बुद्धिर्नाहंकारो, न तन्मात्राणीन्द्रियाणि,महाभूतानि च्"

न प्रधानप्रकृति, न बुद्धि, न अहङ्कार, न तन्मात्र, न इन्द्रियाँ और न ही पाँचों महाभूत जरामरण के त्रास को पाते हैं। हाँ जब यही लिङ्ग रूपमें अधिष्ठान रूप होकर चेतन से युक्त होते हैं तभी उपरोक्त सभी संघातों पूर्ण होकर पुरुष संज्ञा से युक्त जब चेतन के संसर्ग को पाते हैं तभी इन सभी संघातों से युक्त चेतन पुरुष सुख दुःख का भोक्ता हो जाता है। जब तक लिङ्ग रूप लिङ्ग शरीर से मुक्त नही होता तब तक दोनों दुःखों का भोक्ता बना रहता है।

"लिङ्ग निवृत्तौ मोक्षो, मोक्षप्राप्तौ नास्ति दुःखमिति"

लिङ्गरूप प्रधान प्रकृति, बुद्धि, अहङ्कार, तन्मात्र, इन्द्रियों और पाँचों भूतों से मुक्त हुए को लिङ्ग निवृत्ति कहा जाता है। लिङ्ग के निवृत्ति (लिङ्ग के व्यापार) से, मुक्त हुए को मोक्ष कहा जाता है। मोक्ष प्राप्त के लिए कोई दुःख नही है।

भगवान गौड़पादाचार्य जी कहते हैं-

"तत् पुनः केन निवर्त्तते?

तब कौन निर्वृत्ति वाला है? इस पर आगे कहते हैं-

" पंचविंशतितत्त्वज्ञानं स्यात्"

जिन्हें पच्चीस तत्त्वों का ज्ञान हो चुका है वे।
जिन्हें सभी तत्त्वों के कार्य का ज्ञान हो चुका है और वे उन तत्त्वों के कार्य की वृत्ति से वृत्तिहीन हो कर आत्मप्रकाश से पूर्ण हो गए हैं। वही कार्यों से मुक्त होकर सुख दुःख आदि से मुक्त मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

#नेति_नेति_नेति

सुप्रभात

17/03/2022

अगर कोई कहे भरी बरसात मे पी लेने दो तो क्या पीने लगोगे या फिर राजा को रानी से प्यार हो गया तो रानी ढुंढने निकलोगे।
Plz .Don't act on these silly things Preserve your sanskriti

17/03/2022

Copied...🌺🌿

प्रश्न ये है कि...🤔

बॉलीवुड का इस्लामीकरण कैसे हुआ....?

सभी जानते हैं कि संजय दत्त के पिता सुनील दत्त एक हिंदू थे और उनकी पत्नी फातिमा राशिद यानी नर्गिस एक मुस्लिम थीं।

लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि संजय दत्त ने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन वह इतना चतुर भी है कि अपना फिल्मी नाम नहीं बदला।

जरा सोचिए कि हम सभी लोग इन कलाकारों पर हर साल कितना धन खर्च करते हैं। सिनेमा के मंहगा टिकटों से लेकर केबल टीवी के बिल तक।

हमारे नादान बच्चे भी अपने जेबखर्च में से पैसे बचाकर इनके पोस्टर खरीदते हैं और इनके प्रायोजित टीवी कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए हजारों रुपए के फोन करते हैं।

एक विचारणीय बिन्दू यह भी है कि बाॅलीवुड में शादियों का तरीका ऐसा क्यों है कि शाहरुख खान की पत्नी गौरी छिब्बर एक हिंदू है।

आमिर खान की पत्नियां रीमा दत्ता /किरण राव और सैफ अली खान की पत्नियाँ अमृता सिंह / करीना कपूर दोनों हिंदू हैं।

इसके पिता नवाब पटौदी ने भी हिंदू लड़की शर्मीला टैगोर से शादी की थी।

फरहान अख्तर की पत्नी अधुना भवानी और फरहान आजमी की पत्नी आयशा टाकिया भी हिंदू हैं।

अमृता अरोड़ा की शादी एक मुस्लिम से हुई है जिसका नाम शकील लदाक है।

सलमान खान के भाई अरबाज खान की पत्नी मलाइका अरोड़ा हिंदू हैं और उसके छोटे भाई सुहैल खान की पत्नी सीमा सचदेव भी हिंदू हैं।

अनेक उदाहरण ऐसे हैं कि हिंदू अभिनेत्रियों को अपनी शादी बचाने के लिए धर्म_परिवर्तन भी करना पड़ा है।

आमिर खान के भतीजे इमरान की हिंदू पत्नी का नाम अवंतिका मलिक है। संजय खान के बेटे जायद खान की पत्नी मलिका पारेख है।

फिरोज खान के बेटे फरदीन की पत्नी नताशा है। इरफान खान की बीवी का नाम सुतपा सिकदर है। नसरुद्दीन शाह की हिंदू पत्नी रत्ना पाठक हैं।

एक समय था जब मुसलमान एक्टर हिंदू नाम रख लेते थे क्योंकि उन्हें डर था कि अगर दर्शकों को उनके मुसलमान होने का पता लग गया तो उनकी फिल्म देखने कोई नहीं आएगा।

ऐसे लोगों में सबसे मशहूर नाम युसूफ खान का है जिन्हें दशकों तक हम दिलीप_कुमार समझते रहे।

महजबीन अलीबख्श मीना कुमारी बन गई और मुमताज बेगम जहाँ देहलवी मधुबाला बनकर हिंदू ह्रदयों पर राज करतीं रहीं।

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी को हम जॉनी वाकर समझते रहे और हामिद अली खान विलेन अजित बनकर काम करते रहे।

हममें से कितने लोग जान पाए कि अपने समय की मशहूर अभिनेत्री रीना राय का असली नाम सायरा खान था।

आज के समय का एक सफल कलाकार जॉन अब्राहम भी दरअसल एक मुस्लिम है जिसका असली नाम फरहान इब्राहिम है।

जरा सोचिए कि पिछले 50 साल में ऐसा क्या हुआ है कि अब ये मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि उनका मुस्लिम नाम उनका ब्रांड बन गया है।

यह उनकी मेहनत का परिणाम है या हम लोगों के अंदर से कुछ खत्म हो गया है?

जरा सोचिए कि हम कौनसी फिल्मों को बढ़ावा दे रहे हैं?
क्या वजह है कि बहुसंख्यक बॉलीवुड फिल्मों में हीरो मुस्लिम लड़का और हीरोइन हिन्दू_लड़की होती है?

क्योंकि ऐसा फिल्म उद्योग का सबसे बड़ा फाइनेंसर दाऊद इब्राहिम चाहता है। टी-सीरीज का मालिक गुलशन कुमार ने उसकी बात नहीं मानी और नतीजा सबने देखा।

आज भी एक फिल्मकार को मुस्लिम हीरो साइन करते ही दुबई से आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाता है। इकबाल मिर्ची और अनीस इब्राहिम जैसे आतंकी एजेंट सात सितारा होटलों में खुलेआम मीटिंग करते देखे जा सकते हैं।

सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों की सफलता की गारंटी बना दिए गए हैं।

अक्षय कुमार, मनोज कुमार और राकेश रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं।

तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहा अली खान और जरीन खान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम हैं और इस्लामी कठमुल्लाओं को उनका काम गैरमजहबी लगता है।

फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी - बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है।

इन फिल्मों के गीतकार और संगीतकार भी मुस्लिम हों तभी तो एक गाना मौला के नाम का बनेगा और जिसे गाने वाला पाकिस्तान से आना जरूरी है।

इन अंडरवर्ड के हरामखोरों की असिलियत को पहचानिये और हिन्दू समाज को संगठित करिये तब ही हम अपने धर्म की रक्षा कर पाएंगे ।

कुछ समय के लिए इस चित्रपट_नगरी का बहिष्कार करने की जरूरत है।

🙏हम आपको बता दे कि वर्तमान में सिर्फ दो ही लोगो का नाम पूरे बॉलीवुड में चल रहा है सलमान खान , करन जौहर..

अब अंदाजा खुद लगा लो सुशांत सिंह की आत्महत्या क्यो हुई...✍

🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔

भारत_को_आखिर_बॉलीवुड_ने_दिया_क्या_है?
1. बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके।

2. विवाह किये बिना लड़का- लड़की का शारीरिक सम्बन्ध बनाना।

3. विवाह के दौरान लड़की को मंडप से भगाना।

4. चोरी डकैती करने के तरीके।

5. भारतीय संस्कारों का उपहास उड़ाना।

6. लड़कियों को छोटे कपड़े पहने की सीख देना....जिसे फैशन का नाम देना।

7. दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये।

8. गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना।

9. भगवान का मजाक बनाना और अपमानित करना।

10. पूजा- पाठ ,यज्ञ करना पाखण्ड है व नमाज पढ़ना ईश्वर की सच्ची पूजा है।

11. भारतीयों को अंग्रेज बनाना।

12. भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बताना और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ बताना।

13. माँ बाप को वृध्दाश्रम छोड़ के आना।

14. गाय पालन को मज़ाक बनाना और कुत्तों को उनसे श्रेष्ठ बताना और पालना सिखाना।

15. रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गर कोल्ड ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है।

16. पंडितों को जोकर के रूप में दिखाना, चोटीरखना या यज्ञोपवीत पहनना मूर्खता है मगर बालों के अजीबो- गरीब स्टाइल (गजनी) रखना व क्रॉस पहनना श्रेष्ठ है उससे आप सभ्य लगते हैं।

17. शुद्ध हिन्दी या संस्कृत बोलना हास्य वाली बात है और उर्दू या अंग्रेजी बोलना सभ्य पढ़ा-लिखा और अमीरी वाली बात...

हमारे देश की युवा पीढ़ी बॉलीवुड को और उसके अभिनेता और अभिनेत्रियों का अपना आदर्श मानती है.....अगर यही बॉलीवुड देश की संस्कृति सभ्यता दिखाए ..तो सत्य मानिये हमारी युवा पीढ़ी अपने रास्ते से कभी नहीं भटकेगी...

ये पोस्ट उन हिन्दू छोकरों के लिए है जो फिल्म देखने के बाद गले में क्रॉस मुल्ले जैसी छोटी सी दाड़ी रख कर खुद को मॉडर्न समझते हैं हिन्दू नौंजवानों की रगो में धीमा जहर भरा जा रहा है।

फिल्म____जेहाद_____
सलीम - जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मों को देखें, तो उसमें आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / ईसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा. इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते हैं।

फिल्म "शोले" में धर्मेन्द्र भगवान् शिव की आड़ लेकर हेमा मालिनी" को प्रेमजाल में फंसाना चाहता है, जो यह साबित करता है कि - मंदिर में लोग लडकियां छेड़ने जाते हैं. इसी फिल्म में ए. के. हंगल इतना पक्का नमाजी है कि - बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढने चल देता है.कि- उसे और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए.

"दीवार" का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है। और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है.

"जंजीर" में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.

फिल्म 'शान" में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते हैं, लेकिन इसी फिल्म में "अब्दुल" जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है.

फिल्म"क्रान्ति" में माता का भजन करने वाला राजा (प्रदीप कुमार) गद्दार है और करीमखान (शत्रुघ्न सिन्हा) एक महान देशभक्त, जो देश के लिए अपनी जान दे देता है.

अमर-अकबर-अन्थोनी में तीनों बच्चों का बाप किशनलाल एक खूनी स्मगलर है, लेकिन उनके बच्चों अकबर और एन्थॉनी को पालने वाले मुस्लिम और ईसाई महान इंसान हैं. साईं बाबा का महिमामंडन भी इसी फिल्म के बाद शुरू हुआ था.

फिल्म "हाथ की सफाई" में चोरी - ठगी को महिमामंडित करने वाली प्रार्थना भी आपको याद ही होगी.

कुल मिलाकर आपको इनकी फिल्म में हिन्दू नास्तिक मिलेगा या धर्म का उपहास करता हुआ कोई कारनामा दिखेगा और इसके साथ साथ आपको शेरखान पठान, DSP डिसूजा, अब्दुल, पादरी, माइकल, डेबिड, आदि जैसे आदर्श चरित्र देखने को मिलेंगे।

हो सकता है आपने पहले कभी इस पर ध्यान न दिया हो लेकिन अबकी बार ज़रा ध्यान से देखना। केवल सलीम / जावेद की ही नहीं बल्कि कादर खान, कैफ़ी आजमी, महेश भट्ट, आदि की फिल्मो का भी यही हाल है।

फिल्म इंडस्ट्री पर दाउद जैसों का नियंत्रण रहा है. इसमें अक्सर अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है और पंडित को धूर्त, ठाकुर को जालिम, बनिए को सूदखोर, सरदार को मूर्ख कामेडियन, आदि ही दिखाया जाता है.

"फरहान अख्तर" की फिल्म "भाग मिल्खा भाग" में "हवन करेंगे" का आखिर क्या मतलब था?

pk में भगवान् का रोंग नंबर बताने वाले आमिर खान क्या कभी अल्ला के रोंग नंबर 786 पर भी कोई फिल्म बनायेंगे ?

मेरा मानना है कि - यह सब महज इत्तेफाक नहीं है बल्कि सोची समझी साजिश के तहत है ,एक चाल है।

बॉलीवुड इंडस्ट्री की काली सच्चाई।
जो आपकी आंखे खोल के रख देगी।

बॉलीवुड इंडस्ट्री चलती है अंडरवर्ल्ड के पैसे से।
जिसका बादशाह आज दाऊद है।
बॉलीवुड पर कबजा है D gang का।

ये खेल हमेशा से चल रहा है पर सुशांत की मौत ने बस थोड़ा सा हमारा ध्यान खींचा है।

ये फिल्म इंडस्ट्री ऊपर से तो आपको सेक्युलर होने का दिखावा दिखाएगी पर अंदर कट्टर मस्लिमवाद चलता है यहां।

यहां अगर आप हिन्दू है तो एक ही सूरत में चल सकते है भर भर के अपने धर्म संस्कृति को गालियां दो।
उनके द्वारा सेट किए गए एजेंडे की फिल्मो में काम करो।

यहां फिल्म भी जुमा शुक्रवार के दिन रिलीज होती है।

सुशांत भी हर मौके ओर मुद्दे पर खुद को सेक्युलर और हिन्दू विरोधी दर्शाता था फिर भी सफल नहीं हो पाया। यहां तक कि उसने राजपूत लिखना भी छोड़ दिया था।

सलमान खान इसके पीछे हाथ धो के पड़ा था।

लगातार 7 फिल्मों से सलमान ने उसको बाहर फिकवा दिया जो सुशांत करने वाला था।

सुशांत के अलावा भी कुछ नाम बताता हूं जिनके कैरियर को ख़तम कर दिया गया।
सबसे पहले गुलशन कुमार जो शुद्ध हिंदूवादी चेहरा था उस सड़क पे दौड़ा के मरवाया दाऊद गैंग ने।

सन्नी देओल और उसके परिवार का करियर गदर मूवी के बाद ख़तम कर दिया गया और इतनी अच्छी मूवी को कोई अवॉर्ड नहीं मिला क्युकी उसमे पाकिस्तान और मुस्लिम की हकीकत दिखाई गई।

नील नितिन मुकेश की छोटी सी कहा सुनी की वजह से खान गैंग ने करियर ख़तम कर दिया।

सोनू निगम जो एक जाना माना अच्छा गायक था। धार्मिक होने की वजह से उसको इंडस्ट्री से गायब कर दिया।

विवेक ओबेरॉय को खान गैग ने किनारे लगा दिया।

पूरी खान लॉबी अरजीत सिंह के पीछे पड़ी है आज भी।

ऋतिक रोशन को एशिया के सबसे hnsdm यूथ की लिस्ट में आता है उसको इंडस्ट्री से ख़तम कर दिया गया।
सिर्फ अपने पिता की प्रोडक्शन हाउस की वजह से कुछ चल पा रहा।

अजय देवगन ,काजोल, कंगना जैसे जाने कितने हिन्दू विचार धारा के सेलिब्रिटी है जो सिर्फ अपने प्रोडकशन हाउस की वजह से वहा पर है नहीं तो कबके गायब हो चुके होते।

जाने कितने ऐसे ख़तम किए गए आधे चेहरों को तो सलमान खान अकेले खा गया । जिससे रनबीर कपूर तक नहीं बच पाया।

यहां सिर्फ अमिताभ जैसे हिन्दू चल सकते है जो अपने kbc के शो में राजस्थानी महिला की घुघट प्रथा का जोरदार विरोध करते है।

और बुर्के में आने वाली महिला के लिए तलिया बजाते है वाह वाही करते है कि आप अपने कल्चर को कितना अच्छे से फॉलो कर रही।

इस देश की हर मजबूत स्तम्भ को जेहादियों ने अपना मोहरा बना रखा है चाहे मीडिया हो,पॉलिटिक्स हो ।

न्यायव्यवस्था हो या बॉलीवुड।
जिस तरह से हमने राजनीति से इनको उखाड़ फेक रहे है वैसे ही फिल्म इंडस्ट्री से भी फेकना होगा। कारण सिर्फ हिन्दुओं के करियर का नहीं है ।

जब तक इनका राज रहेगा ये हिन्दू विरोधी एजेंडे परोसेंगे समाज में। अब वक़्त आ गया है कि जेहादियों का वर्चस्व यहां भी ख़तम किया जाए।

Address

M-25, Dilshadgarden, New Delhi
Ghaziabad
110095

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Vedic net posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Vedic net:

Share