04/11/2022
509 वर्ष पहले "दिव्य धर्म यज्ञ दिवस" की शुरुआत क्यों की परमेश्वर कबीर जी ने?
विक्रम संवत 1570 (सन 1513) में परमेश्वर कबीर जी ने काशी (उत्तरप्रदेश, भारत) में 3 दिन का विशाल भंडारा दिया था जिसमें 18 लाख साधु संत आये थे। दरअसल हुआ यह कि शेखतकी जो बादशाह सिकंदर लोदी का धर्मगुरु था वह कबीर परमेश्वर की बढ़ती ख्याति के कारण उनसे ईर्ष्या करने लगा था। काशी के ब्राह्मण तो पहले से ही उनसे खार खाए बैठे थे। कबीर परमेश्वर के सतज्ञान के कारण ब्राह्मणों की हिन्दुओं पर और काजी मौलवियों की मुसलमानों पर पकड़ कमजोर पड़ रही थी। कर्मकांडों से होने वाली उनकी आय लगभग खत्म होने के कगार पर थी। सभी ब्राह्मणों और मुल्ला-काजियों ने शेखतकी के साथ मिलकर षड़यंत्र के तहत एक योजना बनाई कि कबीर परमेश्वर को फँसाया जाए जिससे वे काशी छोड़कर भाग जाए। उन्होंने ये युक्ति बनाई कि कबीर एक निर्धन व्यक्ति है, इसके नाम से पत्र पूरे भारतवर्ष के साधु संतो को भेजा जाए कि कबीर जुलाहा काशी में तीन दिन का धर्म भोजन-भण्डारा करेंगे। सारे साधु संत आमंत्रित हैं। साथ में अपने सर्व शिष्यों को अवश्य लाएँ। तीनों दिन प्रत्येक भोजन के पश्चात् प्रत्येक साधु-संत, ब्राह्मण, काजी-मुल्ला, पीर-पैगम्बर, औलिया को एक दोहर, एक मोहर तथा जो कोई सुखा-सीधा (आटा, मिठाई, घी, दाल, चावल) भी लेना चाहे तो वह भी दिया जाएगा। निश्चित दिन से पहले वाली रात्रि को ही साधु-संत भक्त एकत्रित होने लगे। लगभग 18 लाख साधु-संत काशी शहर में एकत्रित हो गए।
‘‘सिमटि भेष इकठा हुवा, काजी पंडित मांहि।
गरीबदास चिठा फिर्या, जंबुदीप सब ठांहि।।793।।
मसलति करी मिलापसैं, जीवन जन्म कछु नांहि।
गरीबदास मेला सही, भेष समेटे तांहि।।794।।
सेतबंध रामेश्वरं, द्वारका गढ गिरनार।
गरीबदास मुलतान मग, आये भेष अपार।।795।।
हरिद्वार बदरी बिनोद, गंगा और किदार।
कबीर परमेश्वर केशव बंजारे के रूप में सतलोक से भोजन लाए
झूटे निमंत्रण से अठारह लाख तो साधु-संत व उनके शिष्य काशी में आए थे। इसके अतिरिक्त अनेकों अनाथ (बिना बुलाए) व्यक्ति भोजन खाने व दक्षिणा लेने आए थे। जब कबीर परमेश्वर ने दो रूप में अभिनय किया। एक रूप में तो अपनी कुटिया में बैठे रहे। दूसरे रूप में अपने सतलोक से 9 लाख बैलों पर थैले रखकर पका-पकाया सामान तथा सूखा सामान तथा दोहर-मोहर भरकर केशव बंजारे के रूप में साथ ले आए। (बोरे जो वर्तमान में गधों पर रखते हैं। उस समय बनजारे अर्थात् व्यापारी बैलों पर रखकर माल एक मण्डी से दूसरी मण्डी में ट्रान्सपोर्ट करते थे।)
काशी के बाजार में टैंट लगाकर सारा सामान टैंटों में रख दिया और कुछ सेवादार भी सतलोक से साथ आए थे जो सर्व व्यवस्था संभाल रहे थे। भण्डारा शुरू कर दिया, तीन दिन तक चिट्ठी में लिखे अनुसार सर्व दक्षिणा दी गई। उस समय भोजन-भण्डारे में दिल्ली का राजा सिकन्दर लोदी भी आया था तथा उसका निजी पीर शेखतकी भी आया था। शेखतकी उपरोक्त षड़यंत्र का मुख्य सदस्य था। उसने सिकंदर लोदी को भी पत्र भिजवाया। वह चाहता था कि किसी तरह सिकंदर लोदी के दिल से कबीर जी उतरें और मेरी पूर्ण महिमा बने। उस शेख का अनुमान था कि अबकी बार कबीर काशी से भाग जाएगा और भण्डारे में पहुँचे साधु कबीर को गालियाँ दे रहे होंगे। राजा भी कबीर परमेश्वर जी का प्रसंशक नहीं रहेगा। परंतु जब भण्डारे के स्थान पर पहुँचे तो देखा, लंगर चल रहा है, सर्व दक्षिणा दी जा रही है। सब साधु तथा अन्य व्यक्ति भोजन खाकर दक्षिणा लेकर कबीर सेठ की जय-जयकार कर रहे हैं।
केशोआया है बनजारा, काशील्याया मालअपारा।।टेक।।
नौलख बोडी भरी विश्म्भर, दिया कबीर भण्डारा।
धरती उपर तम्बू ताने, चैपड़ के बैजारा।।1।।
कौन देश तैं बालद आई, ना कहीं बंध्या निवारा।
अपरम्पार पार गति तेरी, कित उतरी जल धारा।।2।। शाहुकार नहीं कोई जाकै, काशी नगर मंझारा।
दास गरीब कल्प से उतरे, आप अलख करतारा।।3।।
सारी लीला कबीर परमेश्वर ने की.....
बादशाह सिकंदर लोदी ने पता किया कि भण्डारा करने वाला कहाँ है? बताया गया कि उस सामने वाले बड़े टैंट (तम्बू) में है। राजा तथा शेखतकी उस तम्बू में गए और पहले अपना परिचय दिया, फिर उसका परिचय पूछा। तम्बू में बैठे सेठ ने परिचय बताया कि मेरा नाम केशव है, मैं बनजारा हूँ। कबीर जी मेरे मित्र हैं। उनका मेरे पास संदेश गया था कि एक छोटा-सा भण्डारा करना है, कुछ सामान लेकर आना। मेरा भी निमंत्रण भेजा था। राजा सिकंदर लोदी ने पूछा कि कबीर जी क्यों नहीं आए? केशव रूपधारी परमेश्वर ने कहा मैं जो बैठा हूँ उनका नौकर, वे मालिक हैं, इच्छा होगी, तब चले आएंगे। उनकी कृपा तथा आदेश से सब ठीक चल रहा है। आप जी भी भोजन करें। राजा ने कहा पहले उस शुभान अल्लाह के दर्शन करूँगा, बाद में भोजन करूँगा। यह कहकर हाथी पर बैठकर राजा सिकंदर कबीर जी की कुटिया पर पहुँचे। साथ में कई अंगरक्षक भी थे।
कबीर परमेश्वर जी को संत रविदास जी ने सुबह ही बता दिया था कि हे कबीर जी! आज तो विरोधियों ने बनारस छोड़कर भगाने का कार्य कर दिया। आपके नाम से पत्र भेज रखे हैं और ऐसा-ऐसा लिखा है। लगभग 18 लाख व्यक्ति साधु-संत लंगर खाने पहुँच चुके हैं। कबीर परमेश्वर जी ने कहा कि मित्र आजा बैठ जा! दरवाजा बंद करके सांगल लगा ले। आज-आज का दिन बिताकर रात्रि में अपने परिवार को लेकर भाग जाऊँगा। कहीं अन्य शहर-गाँव में निर्वाह कर लूंगा। जब उनको कुछ खाने को मिलेगा ही नहीं तो झल्लाकर गाली-गलौच करके चले जाएंगे। हम सांकल खोलेंगे ही नहीं, यदि किवाड़ तोड़ेंगे तो हाथ जोड़ लूंगा कि मेरा सामर्थ्य आप जी को भण्डारा कराने का नहीं है। गलती से पत्र डाले गए, मारो भावें छोड़ो। दोनों संत माला लेकर भक्ति करने लगे। मुँह बोले माता-पिता तथा मृतक जीवित किए हुए लड़का तथा लड़की सुबह सैर को गए थे। इतने में दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी ने दरवाजा खटखटाया और अपना परिचय देकर बताया कि आपका दास सिकंदर आया है, आपके दर्शन करना चाहता है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा राजन! आज दरवाजा नहीं खोलूंगा। मेरे नाम से झूठी चिट्ठियाँ भेज रखी हैं, लाखों संत-भक्त पहुँच चुके हैं। रात्रि होते ही मैं अपने परिवार को लेकर कहीं दूर चला जाऊँगा। सिकंदर लोदी ने कहा परवरदिगार! आप मुझे नहीं बहका सकते, मैं आपको निकट से जान चुका हूँ। आप एक बार दरवाजा खोलो, मैं आपके दर्शन करके ही जलपान करूँगा।
काशी में सब तरफ परमात्मा की जय जयकार हो रही थी!
परमेश्वर की आज्ञा से रविदास जी ने दरवाजा खोला तो सिकंदर लोदी मुकट पहने-पहने ही चरणों में लोट गया और बताया कि आप अपने आपको छिपाकर बैठे हो, आपने कितना सुंदर भण्डारा लगा रखा है। आपका मित्र केशव आपके संदेश को पाकर सर्व सामान लेकर आया है। आपके नाम का अखण्ड भण्डारा चल रहा है। सर्व अतिथि आपके दर्शनाभिलाषी हैं। कह रहे हैं कि देखें तो कौन है कबीर सेठ जिसने ऐसे खुले हाथ से लंगर कराया है। मेरी भी प्रार्थना है कि आप एक बार भण्डारे में घूमकर सबको दर्शन देकर कृतार्थ करें।
तब परमेश्वर कबीर जी उठे और कुटिया से बाहर आए तो आकाश से कबीर जी पर फूलों की वर्षा होने लगी तथा आकाश से आकर सिर पर सुन्दर मुकुट अपने आप पहना गया। तब हाथी पर बैठकर कबीर जी तथा रविदास जी व राजा चले तो सिकंदर लोदी परमेश्वर कबीर जी पर चंवर करने लगे और पीलवान से कहा कि हाथी को भण्डारे के साथ से लेकर चल। जो भी देखे और पूछे काशी वालों से कि कबीर सेठ कौन-सा है, उत्तर मिले कि जिसके सिर पर मोरपंख वाला मुकुट है, वह है कबीर सेठ जिस पर सिकंदर लोदी दिल्ली के बादशाह चंवर कर रहे हैं। सब एक स्वर में जय बोल रहे थे। जय हो कबीर सेठ की, जैसा लिखा था, वैसा ही भण्डारा कराया है। ऐसी व्यवस्था कहीं देखी न सुनी। भोजन खाने का स्थान बहुत लम्बा-चौड़ा था। उसमें घूमकर फिर वहाँ पर आए जहाँ पर केशव टैंट में बैठा था। हाथी से उतरकर कबीर जी तम्बू में पहुँचे तो अपने आप एक सुंदर पलंग आ गया, उसके ऊपर एक गद्दा बिछ गया, ऊपर गलीचे बिछ गए जिनकी झालरों में हीरे, पन्ने, लाल लगे थे। टैंट को ऊपर कर दिया गया जो दो तरफ से बंद था।
कबीर परमेश्वर जी ने आठ पहर तत्त्वज्ञान सुनाया - दस लाख ने ली नामदीक्षा
खाना खाने के पश्चात् सब दर्शनार्थ वहाँ आने लगे, तब परमेश्वर कबीर जी ने उन परमात्मा के लिए घर त्यागकर आश्रमों में रहने वालों तथा अन्य गृहस्थी व्यक्ति व ब्राह्मणों को आपस में (केशव तथा कबीर जी ने) आध्यात्मिक प्रश्न-उत्तर करके सत्यज्ञान समझाया। 8 पहर (24 घण्टे) तक सत्संग करके उनका अज्ञान दूर किया। कई लाख साधुओं ने दीक्षा ली और अपना कल्याण कराया। विरोधियों ने तो परमेश्वर का बुरा करना चाहा था, परंतु परमात्मा को इकट्ठे करे-कराए भक्त मिल गए अपना ज्ञान सुनाने के लिए। उन भक्तों को सतलोक से आया हुआ उत्तम भोजन कराया जिसके खाने से अच्छे विचार उत्पन्न हुए। उन्होंने परमेश्वर का तत्त्वज्ञान समझा, दीक्षा ली तथा कबीर जी ने उनको वर्षों का खर्चा भी दक्षिणा रूप में दे दिया।
शाह सिकंदरकूं सुनी, धन कबीर बलिजांव।
गरीबदास मेलै चलौ, मम हिरदे धरि पांव।।
केशव और कबीर का, तंबू मांहि मिलाप।
गरीबदास आठ पहर लग, गोष्टी निज गरगाप।।
कबीर परमेश्वर जी ने दी सतलोक से आए बैलों तथा सेवादारों को स्वधाम जाने की आज्ञा
सब भण्डारा पूरा करके सर्व सामान समेटकर बैलों पर रखकर जो सेवादार आए थे, वे चल पड़े। तब सिकंदर लोदी, शेखतकी, कबीर जी, केशव जी तथा राजा के कई अंगरक्षक भी खड़े थे। अंगरक्षक ने आवाज लगाई कि बैल धरती से छः इन्च ऊपर चल रहे हैं। पृथ्वी पर पैर नहीं रख रहे। यह लीला देखकर सब हैरान थे। फिर कुछ देर बाद देखा तो आसपास तथा दूर तक न बैल दिखाई दिए और न बनजारे सेवक। सिकंदर लोदी ने पूछा हे कबीर जी! बनजारे और बैल कहाँ गए? परमेश्वर कबीर जी ने उत्तर दिया कि जिस परमात्मा के लोक से आए थे, उसी में चले गए। उसी समय केशव वाला स्वरूप देखते-देखते कबीर जी के शरीर में समा गया। सिकंदर राजा ने कहा हे अल्लाहु अकबर! मैं तो पहले ही कह रहा था कि यह सब आप कर रहे हो, अपने आपको छिपाए हुए हो।
केशव चले स्व धाम को, नौलख बोडी लीन।
गरीबदास बंधन किया, बाजत हैं सुर बीन।।
केशव और कबीर जित, मिलत भये तहां एक।
दासगरीब कबीर हरी, धरते नाना भेख।।
बनजारे और बैल सब, लाए थे भर माल।
गरीबदास सत्यलोक कूं, चले गये ततकाल।।
जेता शहर कबीर का, हमरै बौहत अनेक।
गरीबदास शाहतकीकै, लगी जुबांनं मेख।।
शेखतकी तो जल-भुन रहा था। कहने लगा कि ऐसे भण्डारे तो हम अनेकों कर दें। यह तो महौछा-सा किया है। हम तो जग जौनार कर देते। महौछा कहते हैं वह धर्म अनुष्ठान जो किसी पुरोहित द्वारा पित्तर दोष मिटाने के लिए थोपा गया हो। उसमें व्यक्ति बताए गए नग (प्जमउे) मन मारकर सस्ती कीमत के लाकर पूरे करता है, हाथ सिकोड़कर लंगर लगाता है।
जग जौनार कहते हैं जिसके घर कई वर्षों उपरांत संतान उत्पन्न होती है तो दिल खोलकर खर्च करता है, भण्डारा करता है तो खुले हाथों से।
संत गरीबदास जी ने उस भण्डारे के विषय में जिसकी जैसी विचारधारा थी, वह बताई:-
गरीब, कोई कहे जग जौनार करी है, कोई कहे महौछा।
बड़े बड़ाई कर्या करें, गाली काढ़ै औछा।।
भावार्थ है कि जो भले पुरूष थे, वे तो बड़ाई कर रहे थे कि जग जौनार करी है। जो विरोधी थे, ईर्ष्यावश कह रहे थे कि क्या खाक भण्डारा किया है, यह तो महौछा-सा किया है। जब शेखतकी ने ये वचन कहे तो वह गूंगा तथा बहरा हो गया, शेष जीवन पशु की तरह जीया। अन्य के लिए उदाहरण बना कि अपनी ताकत का दुरूपयोग करना अपराध होता है, उसका भयंकर फल भोगना पड़ता है।
केशव आन भया बनजारा षट्दल किन्ही हाँस है।
परमेश्वर कबीर जी स्वयं आकर (आन) केशव बनजारा बने। षट्दल कहते हैं गिरी-पुरी, नागा-नाथ, वैष्णों, सन्यासी, शैव आदि छः पंथों के व्यक्तियों को जिन्होंने हँसी-मजाक करके चिट्ठी डाली थी। परमात्मा ने यह सिद्ध किया है कि भक्त सच्चे दिल से मेरे पर विश्वास करके चलता है तो मैं उसकी ऐसे सहायता करता हूँ।
‘‘एक अन्य करिश्मा जो काशी भण्डारे में हुआ’’
वह जीमनवार (लंगर) तीन दिन तक चला था। दिन में प्रत्येक व्यक्ति कम से कम दो बार भोजन खाता था। कुछ तो तीन-चार बार भी खाते थे क्योंकि प्रत्येक भोजन के पश्चात् दक्षिणा में एक मौहर (10 ग्राम सोना) और एक दौहर (कीमती सूती शाॅल) दिया जा रहा था। इस लालच में बार-बार भोजन खाते थे। तीन दिन तक 18 लाख व्यक्ति शौच तथा पेशाब करके काशी के चारों ओर ढे़र लगा देते। काशी को सड़ा देते। काशी निवासियों तथा उन 18 लाख अतिथियों सहित एक लाख सेवादार सतलोक से आए थे। वहां गंद का ढ़ेर लग जाता, श्वांस लेना दूभर हो जाता, परंतु ऐसा महसूस ही नहीं हुआ। सब दिन में दो-तीन बार भोजन खा रहे थे, परंतु शौच एक बार भी नहीं जा रहे थे, न पेशाब कर रहे थे। इतना स्वादिष्ट भोजन था कि पेट भर-भरकर खा रहे थे। पहले से दुगना भोजन खा रहे थे। उन सबको मध्य के दिन टैंशन (चिंता) हुई कि न तो पेट भारी है, भूख भी ठीक लग रही है, कहीं रोगी न हो जाएँ। सतलोक से आए सेवकों को समस्या बताई तो उन्होंने कहा कि यह भोजन ऐसी जड़ी-बूटियां डालकर बनाया है जिनसे यह शरीर में ही समा जाएगा। हम तो प्रतिदिन यही भोजन अपने लंगर में बनाते हैं, यही खाते हैं। हम कभी शौच नहीं जाते तथा न पेशाब करते हैं। आप निश्चिंत रहो।
फिर भी विचार कर रहे थे कि खाना खाया है, कुछ तो मल निकलना चाहिए। उनको शौच (लैट्रिन) जाने का दबाव हुआ। सब शहर से बाहर चल पड़े। टट्टी के लिए एकान्त स्थान खोजकर बैठे तो गुदा से वायु निकली। पेट हल्का हो गया तथा वायु से सुगंध निकली जैसे केवड़े का पानी छिड़का हो। यह सब देखकर सबको सेवादारों की बात पर विश्वास हुआ। तब उनका भय समाप्त हुआ, परंतु फिर भी सबकी आँखों पर अज्ञान की पट्टी बँधी थी। कबीर परमेश्वर जी की वास्तविकता को नहीं स्वीकारा।
पुराणों में भी प्रकरण आता है कि अयोध्या के राजा ऋषभ देव जी राज त्यागकर जंगलों में साधना करते थे। उनका भोजन स्वर्ग से आता था। उनके मल (पाखाने) से सुगंध निकलती थी। आसपास के क्षेत्र के व्यक्ति इसको देखकर आश्चर्यचकित होते थे। इसी तरह सतलोक का भोजन आहार करने से केवल सुगंध निकलती है, मल नहीं। स्वर्ग तो सतलोक की नकल है जो नकली है
"दिव्य धर्म यज्ञ दिवस" के उपलक्ष्य में विशाल समागम
कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष चौदस चतुर्दशी को विक्रमी सम्वत् 1570 में कबीर परमेश्वर जी स्वयं अन्य रूप में केशव बनजारा बनकर नौ लाख बैलों पर पका पकाया भोजन (प्रसाद) तथा कच्ची सामग्री लाद कर सतलोक से काशी नगर में लाए थे। तीन दिन दिव्य धर्म यज्ञ का आयोजन किया था। उसी "दिव्य धर्म यज्ञ दिवस" के उपलक्ष्य में कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष चौदस से मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष एकम (प्रथम) तदनुसार 7-8-9 नवंबर 2022 को जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के सानिध्य में सभी सतलोक आश्रमों में 3 दिवसीय समागम आयोजित किया जा रहा है। संत गरीब दास की अमर वाणी के अखंड पाठ व विशाल भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। सतगुरु रामपाल जी महाराज के आदेशानुसार सभी आश्रमों में होने वाले समागमों में लड्डू जलेबी का प्रसाद बनेगा।
इस विशाल भंडारे में परमार्थ के कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। हजारों सामूहिक वैवाहिक जोड़ों का पूर्ण रूप से दहेज मुक्त आदर्श विवाह गुरुवाणी के पाठ रमैनी के माध्यम से मात्र 17 मिनट में संपन्न होगा। साथ-साथ रक्तदान शिविर और देहदान पंजीकरण शिविर का भी आयोजन किया जाएगा। भारत ही नहीं अपितु विदेशों से परमात्मा प्राप्ति के मुमुक्षु और लाखों की संख्या में संत रामपाल जी महाराज के अनुयायी अपने निकटतम सतलोक आश्रमों में पहुंचकर दिव्य धर्म यज्ञ के पुण्यो का लाभ उठाएँगे ।
इस विशेष “दिव्य धर्म यज्ञ दिवस” के अवसर पर 9 नवंबर को सतलोक आश्रम शामली, उत्तरप्रदेश से सीधा प्रसारण साधना और पॉपकॉर्न TV पर सुबह 09:15 (AM) से किया जाएगा। यह विशेष प्रसारण सतलोक आश्रम यूट्यूब चैनल, संत रामपाल जी महाराज यूट्यूब चैनल और संत रामपाल जी महाराज फेसबुक पेज से भी प्रसारित होगा।
स्वर्ण युग में दिव्यधर्म यज्ञ का लाभ उठाएँ
स्वर्ण युग प्रारम्भ हो चुका है। लाखों पुण्य आत्माएं संत रामपाल जी तत्वदर्शी संत को पहचान कर सत्य भक्ति कर रहे हैं। सांसारिक सुखों और आध्यात्मिकता का भरपूर आनंद उठा रहे हैं। आप भी परिवार मित्रों सहित 7-8-9 नवंबर 2022 को जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के सानिध्य में सभी सतलोक आश्रमों में होने वाले 3 दिवसीय समागम में सादर आमंत्रित हैं। आप सभी प्रकार के यज्ञ कर और नाम दीक्षा लेकर अमर प्रसाद को ग्रहण कर पुण्य के भागीदार बनें। इस मनुष्य जीवन में सभी सुख पाकर पूर्ण मोक्ष पाकर अपने जीवन को कृतार्थ करें।