Vera Prakashan

Vera Prakashan साहित्यिक पुस्तकों का नया घर

‘स्वर्ण-झनक’ को हाथ में लेते ही लगा कि यह केवल सत्रह आलेखों का संग्रह नहीं, बल्कि पढ़े गए साहित्य, उससे बने आत्मीय रिश्त...
16/09/2026

‘स्वर्ण-झनक’ को हाथ में लेते ही लगा कि यह केवल सत्रह आलेखों का संग्रह नहीं, बल्कि पढ़े गए साहित्य, उससे बने आत्मीय रिश्ते और लेखक के भीतर लगातार चलती आलोचनात्मक हलचल को एक पुस्तकाकार दे देने का सुंदर प्रयत्न है। अम्बुज कुमार पाण्डेय और प्रचण्ड प्रवीर की संयुक्त कृति पुस्तकों और रचनाकारों पर केन्द्रित होते हुए भी किसी पारंपरिक आलोचनात्मक चौखटे में स्वयं को सीमित नहीं करती। ‘स्वर्ण-झनक’ शीर्षक की तरह ही इसमें साहित्य के ‘स्वर्ण’ से अधिक उसकी वह ‘झनक’ महत्त्वपूर्ण है, जो किसी रचना को पढ़ लेने के बाद भी हमारी स्मृति और संवेदना में देर तक सुनाई देती रहती है। भक्ति आन्दोलन, सूरदास, हनुमानबाहुक, भारतेन्दु, कुँवर नारायण, विष्णु खरे, कुबेरनाथ राय से लेकर गगन गिल, अनिल यादव और तुलसीराम तक की रचनात्मक दुनिया से गुजरते हुए लेखकद्वय न केवल साहित्य को पढ़ते हैं, बल्कि उसके भीतर छिपी उपेक्षित आवाजों, विस्मृत रचनाकारों और अनदेखे अर्थों को भी सामने लाने का प्रयत्न करते हैं।
इस पुस्तक ने मुझे विशेष रूप से इसलिए आकर्षित किया कि मैं स्वयं भी अपने अब तक लिखे आलेखों को इसी तरह एक पुस्तक के रूप में संजोने की इच्छा रखती हूँ। ‘स्वर्ण-झनक’ को पढ़ते हुए इस संभावना का एक सुंदर और प्रेरक रूप सामने दिखाई देता है कि अलग-अलग समय और प्रसंगों में लिखे गए आलेख जब एक साझा संवेदना और दृष्टि के सूत्र में बँधते हैं, तो वे केवल आलेख नहीं रहते—वे लेखक की साहित्यिक यात्रा का दस्तावेज बन जाते हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी विषय-विविधता के साथ उसकी भाषा की जीवंतता है। कहीं आलोचना स्मृति का रूप लेती है, कहीं व्यंग्य का, कहीं गहरी आत्मीयता का और कहीं असहमति का। ‘स्त्री के भीतर स्त्री की तलाश’ में गगन गिल की काव्य-संवेदना हो या ‘मुर्दहिया’ के प्रसंग में तुलसीराम के जीवन-संघर्ष का मार्मिक संसार, ‘कीड़ाजड़ी’ में पिंडर घाटी का यथार्थ हो या ‘माया का मालकौंस’ में साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर उठाए गए प्रश्न—हर आलेख अपने विषय को केवल सूचना की तरह नहीं, अनुभूति की तरह सामने रखता है। हाँ, कुछ जगहों पर लेखक का आग्रह और कथन की तीक्ष्णता आलोचनात्मक संतुलन से आगे जाती हुई भी प्रतीत होती है, लेकिन यही निर्भीकता पुस्तक को उसकी विशिष्ट आवाज़ प्रदान करती है।
‘स्वर्ण-झनक’ मुझे ऐसी पुस्तक लगी, जो पाठक को केवल साहित्य पढ़ने के लिए नहीं, साहित्य को नए ढंग से देखने के लिए आमंत्रित करती है। यह पुस्तक बताती है कि आलोचना तब अधिक सार्थक होती है, जब उसके पीछे रचना के प्रति जिज्ञासा, लेखक के प्रति न्याय और अपने समय से संवाद करने की बेचैनी हो। मेरे लिए इसकी सबसे मूल्यवान उपलब्धि यही है कि इसने पढ़ते हुए एक निजी आकांक्षा को भी स्वर दिया—अपने बिखरे हुए आलेखों को एक ऐसी पोथी में संजोने की आकांक्षा, जिसमें मेरे पढ़े हुए साहित्य की स्मृतियाँ, मेरी अपनी दृष्टि और उन रचनाओं से उपजी ‘झनक’ एक साथ सुरक्षित रह सके। शायद अच्छी पुस्तक की पहचान यही है कि वह समाप्त होने के बाद भी अपने भीतर कोई अगली यात्रा शुरू कर दे।

— डॉ. उर्वशी

किताब : खिड़की वाली सीट से देखते हुए | कविता-संग्रहलेखक : हर्षिल पाटीदार
15/09/2026

किताब : खिड़की वाली सीट से देखते हुए | कविता-संग्रह
लेखक : हर्षिल पाटीदार

हिन्दी दिवस के इस ख़ास दिन हमारी आधिकारिक वेबसाइट आपके समक्ष प्रस्तुत है। पहले ऑनलाइन स्टोर्स के अधिक कमीशन के कारण किता...
14/09/2026

हिन्दी दिवस के इस ख़ास दिन हमारी आधिकारिक वेबसाइट आपके समक्ष प्रस्तुत है। पहले ऑनलाइन स्टोर्स के अधिक कमीशन के कारण किताबें आप तक महँगी पहुँचती थीं, अब हम सीधे कम मूल्य पर पुस्तकें पहुँचाने का संकल्प लेकर आए हैं। वेबसाइट पर पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास भी जारी है, हालाँकि अभी कुछ बदलाव शेष हैं जिन्हें हम शीघ्र पूरा करेंगे। चूँकि आज के दिन इसे आप सबके सामने लाने का प्रयास था, इसलिए थोड़ी-बहुत कमियों के साथ ही हम हाज़िर हैं।

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आप सभी को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ....
14/09/2026

आप सभी को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ....

आजकल सोशल मीडिया पर 80 के दशक का नॉस्टेल्जिया ट्रेंड जोरों पर है। उस ज़माने के ऑफ़लाइन बचपन के किस्सों को याद करते हुए व...
12/09/2026

आजकल सोशल मीडिया पर 80 के दशक का नॉस्टेल्जिया ट्रेंड जोरों पर है। उस ज़माने के ऑफ़लाइन बचपन के किस्सों को याद करते हुए वेरा प्रकाशन से डॉ. अमित भारद्वाज की किताब “ऑफ़लाइन बचपन के क़िस्से” हाल ही में आई है।

वो दिन जब स्क्रीन नहीं, दोस्त और खुला आसमान ही दुनिया थी।

अगर आपको भी वो पुराने दिन याद आते हैं तो ये किताब जरूर पढ़िए।

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प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'कृति बहुमत' के सितम्बर-2026 अंक में प्रचण्ड प्रवीर के कहानी संग्रह 'उत्तरायण' की समीक्षा प...
10/09/2026

प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'कृति बहुमत' के सितम्बर-2026 अंक में प्रचण्ड प्रवीर के कहानी संग्रह 'उत्तरायण' की समीक्षा प्रकाशित हुई है। समीक्षक धीरेन्द्र प्रताप सिंह और कृति बहुमत संपादक के प्रति हार्दिक धन्यवाद।

जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं 🎂💐 अजित सिंह तोमर
09/09/2026

जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं 🎂💐 अजित सिंह तोमर

प्रत्यक्ष से परे | डॉ. अजितविस्तार विचार के लिए आवश्यक प्रक्रिया है, मगर जब कोई कथन बिना आग्रह के संक्षेप में पिरो दिया ...
05/09/2026

प्रत्यक्ष से परे | डॉ. अजित

विस्तार विचार के लिए आवश्यक प्रक्रिया है, मगर जब कोई कथन बिना आग्रह के संक्षेप में पिरो दिया जाए, तो उसकी चमक इस कदर उभर आती है कि वह अँधेरे में भी रास्ता दिखा दे और मनुष्य अपने अनुमान पर भरोसा कर सके। मन और बुद्धि की सीमाओं से आगे, आग्रह और उपदेश से दूर, कुछ अनुभव इसलिए साझा करने योग्य लगते हैं कि उनके सहारे लोग अपने वे प्रस्थान-बिंदु पहचान लेते हैं, जो मन के अदृश्य मानचित्र में पहले से दर्ज़ होते हैं।
ज़रूरी-गैरज़रूरी से आगे बढ़ते ये नोट्स महज़ उद्धरण नहीं; ये वह कहना चाहते हैं जिसे शोर में न कहना संभव है, न सुन पाना। इनके बीच से गुज़रते हुए वे स्वर भी सुने जा सकते हैं, जो मन के निर्वासित कोनों में अनुभव का आकार लेने से लगातार इंकार करते रहे हैं।
इन शब्दों की ध्वनियाँ भले सुगम संगीत न बनें, पर उनकी संरचना उन अधूरे रागों जैसी है, जिन्हें किसी लोक-वाद्य के सुरों में अचानक पहचानकर श्रोता अपने भीतर की कोई भूली हुई धुन अनायास गुनगुनाने लगता है।

जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएँ 🎂
02/09/2026

जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएँ 🎂

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