16/09/2026
‘स्वर्ण-झनक’ को हाथ में लेते ही लगा कि यह केवल सत्रह आलेखों का संग्रह नहीं, बल्कि पढ़े गए साहित्य, उससे बने आत्मीय रिश्ते और लेखक के भीतर लगातार चलती आलोचनात्मक हलचल को एक पुस्तकाकार दे देने का सुंदर प्रयत्न है। अम्बुज कुमार पाण्डेय और प्रचण्ड प्रवीर की संयुक्त कृति पुस्तकों और रचनाकारों पर केन्द्रित होते हुए भी किसी पारंपरिक आलोचनात्मक चौखटे में स्वयं को सीमित नहीं करती। ‘स्वर्ण-झनक’ शीर्षक की तरह ही इसमें साहित्य के ‘स्वर्ण’ से अधिक उसकी वह ‘झनक’ महत्त्वपूर्ण है, जो किसी रचना को पढ़ लेने के बाद भी हमारी स्मृति और संवेदना में देर तक सुनाई देती रहती है। भक्ति आन्दोलन, सूरदास, हनुमानबाहुक, भारतेन्दु, कुँवर नारायण, विष्णु खरे, कुबेरनाथ राय से लेकर गगन गिल, अनिल यादव और तुलसीराम तक की रचनात्मक दुनिया से गुजरते हुए लेखकद्वय न केवल साहित्य को पढ़ते हैं, बल्कि उसके भीतर छिपी उपेक्षित आवाजों, विस्मृत रचनाकारों और अनदेखे अर्थों को भी सामने लाने का प्रयत्न करते हैं।
इस पुस्तक ने मुझे विशेष रूप से इसलिए आकर्षित किया कि मैं स्वयं भी अपने अब तक लिखे आलेखों को इसी तरह एक पुस्तक के रूप में संजोने की इच्छा रखती हूँ। ‘स्वर्ण-झनक’ को पढ़ते हुए इस संभावना का एक सुंदर और प्रेरक रूप सामने दिखाई देता है कि अलग-अलग समय और प्रसंगों में लिखे गए आलेख जब एक साझा संवेदना और दृष्टि के सूत्र में बँधते हैं, तो वे केवल आलेख नहीं रहते—वे लेखक की साहित्यिक यात्रा का दस्तावेज बन जाते हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी विषय-विविधता के साथ उसकी भाषा की जीवंतता है। कहीं आलोचना स्मृति का रूप लेती है, कहीं व्यंग्य का, कहीं गहरी आत्मीयता का और कहीं असहमति का। ‘स्त्री के भीतर स्त्री की तलाश’ में गगन गिल की काव्य-संवेदना हो या ‘मुर्दहिया’ के प्रसंग में तुलसीराम के जीवन-संघर्ष का मार्मिक संसार, ‘कीड़ाजड़ी’ में पिंडर घाटी का यथार्थ हो या ‘माया का मालकौंस’ में साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर उठाए गए प्रश्न—हर आलेख अपने विषय को केवल सूचना की तरह नहीं, अनुभूति की तरह सामने रखता है। हाँ, कुछ जगहों पर लेखक का आग्रह और कथन की तीक्ष्णता आलोचनात्मक संतुलन से आगे जाती हुई भी प्रतीत होती है, लेकिन यही निर्भीकता पुस्तक को उसकी विशिष्ट आवाज़ प्रदान करती है।
‘स्वर्ण-झनक’ मुझे ऐसी पुस्तक लगी, जो पाठक को केवल साहित्य पढ़ने के लिए नहीं, साहित्य को नए ढंग से देखने के लिए आमंत्रित करती है। यह पुस्तक बताती है कि आलोचना तब अधिक सार्थक होती है, जब उसके पीछे रचना के प्रति जिज्ञासा, लेखक के प्रति न्याय और अपने समय से संवाद करने की बेचैनी हो। मेरे लिए इसकी सबसे मूल्यवान उपलब्धि यही है कि इसने पढ़ते हुए एक निजी आकांक्षा को भी स्वर दिया—अपने बिखरे हुए आलेखों को एक ऐसी पोथी में संजोने की आकांक्षा, जिसमें मेरे पढ़े हुए साहित्य की स्मृतियाँ, मेरी अपनी दृष्टि और उन रचनाओं से उपजी ‘झनक’ एक साथ सुरक्षित रह सके। शायद अच्छी पुस्तक की पहचान यही है कि वह समाप्त होने के बाद भी अपने भीतर कोई अगली यात्रा शुरू कर दे।
— डॉ. उर्वशी