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पुस्तक : रंगीन काँच की खिड़कियाँ | कविता संग्रहरचनाकार : डॉ. रमेश चन्द मीणापृष्ठ 108  | मूल्य ₹185/-यह कविता-संग्रह सौंदर...
11/06/2026

पुस्तक : रंगीन काँच की खिड़कियाँ | कविता संग्रह
रचनाकार : डॉ. रमेश चन्द मीणा
पृष्ठ 108 | मूल्य ₹185/-

यह कविता-संग्रह सौंदर्य, कला, संस्कृति, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं की बहुरंगी यात्रा है। कविताएँ भारतीय तथा पाश्चात्य कला-परंपरा (नटराज, मोहनजोदड़ो की नर्तकी, भीमबेटका, बणी-ठणी, दीदारगंज यक्षिणी, वीनस का जन्म, लीडा व हंस आदि), राजस्थानी व अन्य शैलियों की चित्रकला, प्राचीन मूर्तिकला, राग-रंग, प्रकृति के सूक्ष्म सौंदर्य (अमलतास, पारिजात, शहतूत, बदली) और सौंदर्य-दर्शन (‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’, लावण्य, कला दर्पण आदि) को काव्यात्मक संवेदना से जोड़ती हैं।

कविताएँ दृश्य-बोध, श्रव्य संवेदना और गहन भावाभिव्यक्ति से ओत-प्रोत हैं, जो पाठक को कला और सौंदर्य के सूक्ष्म लोक में ले जाती हैं।

यह पुस्तक राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित है।

कितना सरल हो जाता है जीवनजब कोई विकल्प नहीं होते।◆ अज्ञेय
11/06/2026

कितना सरल हो जाता है जीवन
जब कोई विकल्प नहीं होते।
◆ अज्ञेय

09/06/2026

विविध विधाओं की चुनिंदा किताबें-

1. रंग बदरंग | उपन्यास | आरव मिश्रा
2. कबाड़ी का चश्मा | कथा-कथेतर | सत्यनारायण
3. किसी छूटे हुए दिन में | कविता | अमेय कान्त
4. गश्त गिरदावरी उर्फ़ जो तहसीलदारी में देखा | संस्मरण | सवाई सिंह शेखावत
5. प्रत्यक्ष से परे | मुक्त गद्य| डॉ. अजित

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पुस्तक : गुजराती युवा कविता | कविता संकलनचयन, संपादन एवं अनुवाद : मालिनी गौतमसंकलित कवि : ध्वनिल पारेख, पीयूष ठक्कर, जये...
09/06/2026

पुस्तक : गुजराती युवा कविता | कविता संकलन

चयन, संपादन एवं अनुवाद : मालिनी गौतम

संकलित कवि : ध्वनिल पारेख, पीयूष ठक्कर, जयेश जीवीबेन सोलंकी, जितेन्द्र वसावा, हार्दिक व्यास, एषा दादावाला, अनिल चावड़ा, कुलदीप कारिया, मेहुल देवकला

संस्करण : 2026 (पेपरबैक)
पृष्ठ : 144 | मूल्य : ₹250/-

हार्दिक व्यास की कविताएँ आशा से लबरेज कविताएँ हैं। इन कविताओं में पतझड़ का मातम नहीं है बल्कि वसंत के आगमन का उल्लास है। जीर्ण वृक्ष से झड़ता एक पीला पत्ता भी नयी फूटती कोंपल को यह संदेश देते हुए जाता है कि- “जाते वक़्त यदि घुटने लगे तुम्हारी साँस/तो आसपास देखकर/ज़मीन पर पनपते पौधे के /आगमन के साथ/अपनी आवाज़ बहने देना” (कविता-एक पत्ते की सिफारिश)।
उनकी कविताओं में एक्य का भाव है। कभी किसी पुराने शहर में घूमते हुए बीते दिनों को याद करते हुए अपने बचपन की सुरक्षित स्मृतियों की खोज है तो कभी मनुष्य-मनुष्य के बीच के संबंध को खोजने का प्रयास है। जीवन के विभिन्न प्रवाहों को, वास्तविकताओं को जानने, पहचानने और उनके अर्थ ढूँढने का प्रयास करता यह कवि बार-बार आशा के द्वार खोलता है और मनुष्य-मात्र की जीवन के प्रति आस्था को मजबूत करता है।

– मालिनी गौतम

पुस्तक : राग राजस्थान | लोकवाद्यों की ध्वनि परम्परारचनाकार : डॉ. अंशु वर्मा, डॉ. पूनम अटवालसंस्करण : 2026, पेपरबैक | पृष...
09/06/2026

पुस्तक : राग राजस्थान | लोकवाद्यों की ध्वनि परम्परा
रचनाकार : डॉ. अंशु वर्मा, डॉ. पूनम अटवाल
संस्करण : 2026, पेपरबैक | पृष्ठ : 192 | मूल्य : ₹275/-

राजस्थान को भले ही शुष्क प्रदेश कहा जाता हो, लेकिन संगीत, कला, भाषा और साहित्य के क्षेत्र में यह अत्यंत समृद्ध प्रदेश है। जुझार के इस प्रदेश में बाहर से जहाँ जीवन अत्यंत कठिन है, वहीं लुप्त सरस्वती की धारा की तरह संगीत की राग-रागिनियों और लोक संगीत ने इसे भीतर से सरस बनाए रखा है। मनुष्य के भीतर का राग कभी भी कुन्द नहीं होना चाहिए और न ही सूखना चाहिए। जीवन बाहर से जितना कठिन और कठोर हो, उतना ही भीतर का अनहद नाद राग-भरा होना चाहिए- यही मंत्र ‘राग राजस्थान’ का लक्ष्य है।
डॉ. अंशु वर्मा जी और डॉ. पूनम अटवाल जी ने अत्यंत परिश्रम से यह पुस्तक तैयार की है, ताकि विद्यार्थी एवं शोधार्थी लाभान्वित हो सकें।
राजस्थान जिसमें संतों-सूरमाओं के शौर्य और शान है, राजस्थान जहाँ त्याग-तप-बलिदान का राग है, राजस्थान जिसमें एक तरफ मरण भी त्योहार है तो दूसरी तरफ जीवन-रस और भक्ति-शृंगार की भी त्रिवेणी बहती है। यहाँ जीवन का सप्तस्वर और हर रंग है। यही नहीं, यहाँ बाह्य धरातल पर लोक संगीत, संस्कृति, उत्सव और पर्व हैं तो मनुष्य के भीतर के नाद भी लय और ताल के साथ नृत्य करते हैं। इसी तथ्य को इस पुस्तक के रूप में पकड़ने और समझाने का यह एक सुंदर प्रयास है। जीवन के संगीत के रूप में हमें इसे देखना चाहिए।

— गीता सामौर

किताब : *रेत का झरना* | कहानी-संग्रहलेखक : *रिड़मल दान चारण 'राज'*पृष्ठ : 162 | मूल्य : ₹ 250/-मरुस्थल केवल भौगोलिक क्षे...
08/06/2026

किताब : *रेत का झरना* | कहानी-संग्रह
लेखक : *रिड़मल दान चारण 'राज'*
पृष्ठ : 162 | मूल्य : ₹ 250/-

मरुस्थल केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सहयोग, संघर्ष, स्नेह, और अभाव के जीवंत समुच्चय का नाम है। उसी मरुस्थल के गर्भ से ‘रेत का झरना' की कहानियाँ जन्म लेती हैं। इन कहानियों में एक ओर ‘उकेरी’ कहानी की तरह अटूट जिजीविषा है, तो दूसरी तरफ ‘अधूरा डेरा’ जैसा उदात्त व पवित्र प्रेम है, जो प्रतिदान की अपेक्षा किये बिना वीतरागी होकर उस संसार में विलीन हो जाता है, जिसको अतीत से कोई शिकवा नहीं है। ये कहानियाँ आधुनिक डिजिटल और भौगौलिक सुख-सुविधाओं वाले मेटावर्स युग के पाठकों का ‘पखाल युग' की स्मृतियों व ‘रोहिड़े की छाँव' के सुकून से परिचय करवाती हैं।

दीपक सोने का हो या मिट्टी का, मूल्य उसका नहीं, उसकी लौ का है।-महादेवी वर्मा
07/06/2026

दीपक सोने का हो या मिट्टी का, मूल्य उसका नहीं, उसकी लौ का है।

-महादेवी वर्मा

किताब : खिड़की वाली सीट से देखते हुए | कविता-संग्रहलेखक : हर्षिल पाटीदारमूल्य : ₹200/-हर्षिल पाटीदार का यह कविता-संग्रह ज...
07/06/2026

किताब : खिड़की वाली सीट से देखते हुए | कविता-संग्रह
लेखक : हर्षिल पाटीदार
मूल्य : ₹200/-

हर्षिल पाटीदार का यह कविता-संग्रह जीवन की अनवरत यात्रा का एक सौम्य, गहन और अन्तर्मुखी दस्तावेज़ है। कवि ब्रह्मांड, मृत्यु, प्रेम, स्मृति और पिता की अनुपस्थिति जैसे विषयों को अत्यंत संवेदनशीलता और दार्शनिक गहराई के साथ उकेरता है। प्रकृति, ग्रामीण जीवन, शहरी प्यास और मानवीय अस्तित्व की क्षणभंगुरता के बीच कवि का स्वर न तो ऊँचा है, न नाटकीय, वह बस सधी हुई, आत्मीय और सत्य की तलाश में डूबा हुआ है।

पुस्तक : वो काग़ज़ की कश्ती | लघुकथा संग्रहलेखक : अशोक अजनबीसंस्करण : 2026 | मूल्य :  ₹200/-कहानी-संग्रह ‘वो काग़ज़ की क...
06/06/2026

पुस्तक : वो काग़ज़ की कश्ती | लघुकथा संग्रह
लेखक : अशोक अजनबी
संस्करण : 2026 | मूल्य : ₹200/-

कहानी-संग्रह ‘वो काग़ज़ की कश्ती’ में जहाँ अनेक मार्मिक कहानियाँ संकलित हैं, वहीं कुछ संस्मरण, ‘दादी का फ़ाटक’ एवं ‘बत्तो जीजी’ जैसे जीवंत रेखाचित्र तथा कुछ प्रभावशाली लघुकथाएँ भी शामिल हैं। कहानी-लेखन के क्षेत्र में अशोक अजनबी का यह द्वितीय कहानी संग्रह है। उन्होंने विविध विधाओं को संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ प्रभावशाली ढंग से पिरोया है।

इन रचनाओं की भाषा अत्यंत सहज, भावप्रधान और बोलचाल की आत्मीयता से भरी हुई है। स्थानीय शब्दों, क्षेत्रीय लहजों और संवादों ने कथाओं को जीवंत बना दिया है। रूपकों और प्रतीकों– जैसे ‘प्यार का पेड़’, ‘नीली चादर’, ‘दादी का फ़ाटक’, ‘पत्थर के लोग’ अथवा ‘काग़ज़ की कश्ती’ के माध्यम से लेखक ने स्मृति, विरह, मानवीय ऊष्मा और समय के प्रवाह को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।

-कविता मुखर
कथाकार एवं व्यंग्यकार

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