08/12/2024
जरूरी नहीं हर सवाल का जवाब दिया जाए,
पर जब दिया जाए, सामने वाले के दिमाग का दिया भुझ जाए।।
पिछले साल ज़ैग़म मुर्तज़ा ने लिखा था - अशोक वर्मा जी ने सवाल किया है कि लोग हर 6 दिसंबर को कहते हैं हम बाबरी नहीं भूलेंगे। भूलेंगे नहीं तो क्या हिंसा करेंगे?
इस मुद्दे पर मैं लिखना नहीं चाहता, मगर फिर भी सवाल किया है तो जवाब ज़रूरी है। वर्मा जी बाबरी को भुलाना या याद रखना हिंसा का मसला नहीं है। हम 1400 साल से यह भी कह रहे हैं कर्बला न भूलेंगे और हर साल ख़ुद को काट पीट कर बिस्तर में लेट जाते हैं। अगला मुहर्रम आने पर फिर यही नारा लगाते हैं मगर आज तक कुछ किया?
ख़ैर, पूछा है तो समझ लीजिए। बाबरी इसलिए नहीं भूलेंगे क्योंकि उस संविधान में भरोसे का क़त्ल है जिसको दिखाकर हमें बताया गया था कि किसी के भी मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं होने दिया जाएगा। बाबरी इसलिए याद रखने की चीज़ है क्योंकि यह उस भरोसे का क़त्ल है जो आप जैसे प्रगतिशील, पढ़े लिखे लोगों ने दिलाया था और कहा था कि चंद ग़ुंडे, या "फ्रिंज एलिमेंट" देश की एकता से खिलवाड़ नहीं कर पाएंगे। यह उस भरोसे का क़त्ल है जो बाबरी विध्वंस तक लोगों का न्यायपालिका में था। बाबरी हमें याद दिलाती है कि अल्पसंख्यक अल्पसंख्यक है और बहुसंख्यक बहुसंख्यक। जब भी समय पड़ेगा कोई न बचाने आएगा और न साथ देने, इसलिए इस झांसे में अब कभी न आना कि तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बाबरी को इसलिए भी याद रखना पड़ता है क्योंकि आपके फ्रिंज एलिमेंट काशी से मक्का तक की 3700 मस्जिदों की लिस्ट लहराते घूम रहे हैं। और अंत में हमें यह यूं भी याद रखना पड़ता है कि अगली घटना के बाद हमें पिछली घटना को भुलाने की टाइमलाइन भी तो बनानी है। बाक़ी याद रखने का अधिकार सिर्फ सबल को है। आप औरंगज़ेब, बाबर, ख़लजी, और हमारी औक़ात याद दिलाते रहिए, हम बाबरी, हाशिमपुरा, गुजरात, मुंबई, नेल्ली, जम्मू, हैदराबाद, काशी, मथुरा सब भूलते चले जाएंगे। :)