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स्वप्निल जोशी और उनकी पत्नी लीना के  साथ में एक और साल जुड़ गया हैं !  उनकी शादी की वर्षगांठ हर साल उन दोनों के लिए एक खू...
26/09/2024

स्वप्निल जोशी और उनकी पत्नी लीना के साथ में एक और साल जुड़ गया हैं ! उनकी शादी की वर्षगांठ हर साल उन दोनों के लिए एक खूबसूरत और यादगार पल होता है,

स्वप्निल जोशी एक बहुमुखी अभिनेता हैं, जिन्होंने भारतीय टेलीविजन और सिनेमा में गहरी छाप छोड़ी है। उनका करियर टीवी धारावाहिक श्रीकृष्णा से शुरू हुआ, जहां उन्होंने बाल श्रीकृष्ण की भूमिका निभाई। इस किरदार ने उन्हें एक बाल कलाकार के रूप में प्रसिद्धि दिलाई और उनकी मासूमियत और अभिनय क्षमता ने दर्शकों के दिलों में गहरी जगह बनाई।साथ ही इनके द्वारा उतर रामायण में कुश का किरदार भी दर्शकों के दिलों में आज भी विशेष स्थान रखता हैं ! इसके बाद उन्होंने कोर्ट रूम और हद कर दी जैसे लोकप्रिय टीवी शोज़ में काम किया, लेकिन उनका नाम खासकर कृष्णा के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।

स्वप्निल की पहचान सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने मराठी सिनेमा में भी अद्भुत काम किया है। मुंबई-पुणे-मुंबई और दुनियादारी जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने उन्हें मराठी फिल्म इंडस्ट्री का प्रमुख चेहरा बना दिया। उनकी फ़िल्में समाज की गहरी भावनाओं को छूती हैं, और उनके किरदार लोगों के दिलों में जगह बना लेते हैं।

स्वप्निल जोशी को उनकी बेहतरीन अदाकारी के लिए कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया है। उन्हें मराठी सिनेमा के प्रतिष्ठित पुरस्कारों के साथ-साथ टेलीविज़न इंडस्ट्री में भी सम्मानित किया गया है। उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है, और उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं।

उनकी व्यक्तित्व की बात करें तो स्वप्निल का व्यवहार सरल, सहज और परिवार के प्रति समर्पित है। वे अपने परिवार के बेहद करीब हैं और एक अच्छे पिता और पति के रूप में जाने जाते हैं।

लोग कहते हैं जीवन में कुछ करने के लिए बहुत समय है पर क्या सच में कुछ करने के लिए बहुत समय है? नहीं, कुछ करने के लिए मुश्...
17/09/2024

लोग कहते हैं जीवन में कुछ करने के लिए बहुत समय है पर क्या सच में कुछ करने के लिए बहुत समय है? नहीं, कुछ करने के लिए मुश्किल से 15 वर्ष होते है आपके पास।

औसत जीवन अगर 70 वर्ष माना जाए तो 30% समय तो सिर्फ सोने ने चला जाता है यानी पूरे जीवन में 21 वर्ष सिर्फ सोने में। 6 वर्ष तो बाल्यकाल और कम से कम 18 से 20 वर्ष पढ़ाई और सेटल होने में तथा अंतिम के 10वर्ष आप सिर्फ टाइम काटते है, यानी कुल लगभग 55 वर्ष तो आपके ऐसे ही जाने है।

आपको कुछ बेहतर कर गुजरने के लिए कुल 15 वर्ष ही मिलते है जीवन में।

समय सीमित है निर्धारित भी है, तय आपको करना की आप इन 15 वर्ष को कैसे बिताएंगे, दूसरों की बुराई खोजने में, दूसरो की टांग खींचने में,किसी से नफरत करने में या देश और समाज के लिए कुछ बेहतर करने में।

आप चाहें तो मनोरंजन में अपना समय व्यतीत कर ले तो भी उचित रहेगा कम से कम आप खुश तो हो लेंगे, किंतु अगर दूसरो की कमी खोजने में बिताया तो जीवन व्यर्थ हो जायेगा।

कुछ करने के 15 वर्ष अलग से एक साथ नहीं मिलते उसी 70 वर्ष में बीच बीच में होते हैं पहचानना हमे हैं जो जितनी जल्दी पहचान लेगा उतनी जल्दी बेहतर कर लेगा।
जय माता दी🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

हम अक्सर इस घास को मामूली समझ कर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इसके बीज बाजार में महंगे बिकते हैं और व्रत में इस्तेमाल किए...
05/09/2024

हम अक्सर इस घास को मामूली समझ कर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इसके बीज बाजार में महंगे बिकते हैं और व्रत में इस्तेमाल किए जाते हैं।

इस घास को सामक, समा, सांवा या झींगोरा के नाम से जाना जाता है। समा के चावल इसी घास से प्राप्त होते हैं। मेरे आसपास इसे ढेरों में देखा जा सकता है। इस घास को खरपतवार समझना गलत होगा, क्योंकि प्रकृति ने हमें हर चीज़ उपहार के रूप में दी है, बस हमें उसका ज्ञान नहीं होता।

यह लंबी घास की किस्म होती है, जिसकी बालें चारे के काम आती हैं और सांवा नाम से भी जानी जाती है। इसके बीज स्लेटी रंग के चमकदार होते हैं और चावल, हलुआ आदि में उपयोग किए जाते हैं। यह अनाज विशेषकर वर्षा ऋतु में उगता है और लगभग दो से ढाई महीने में तैयार हो जाता है। फसल तैयार होने पर बीज को पीटकर अलग कर लिया जाता है, जबकि हरे पौधों को काटकर पशुओं को चारे के रूप में दिया जाता है।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में स्तनपान कराने वाली माताओं को यह विशेष रूप से खिलाया जाता है, क्योंकि यह डिलीवरी के बाद कमजोरी को दूर करने में सहायक है। आदिवासी समाज में भी यह प्रचलित है।

उत्तराखंड में इसे झंगोरा (Jhangora) कहा जाता है और इसका वैज्ञानिक नाम Echinochloa frumentacea है। झंगोरा चावल की तुलना में अधिक खनिज, वसा, और आयरन से भरपूर होता है। इसमें कैल्शियम की अधिकता हड्डियों को मजबूत बनाती है। झंगोरा की खीर भी बनाई जाती है, जो स्वादिष्ट होती है और इसमें उच्च फाइबर की वजह से यह शुगर पेशेंट्स के लिए आदर्श है। झंगोरा के सेवन से शुगर कंट्रोल में रहती है।

व्रत के दौरान समा के चावल खाने का मुख्य कारण इसके पोषक तत्व हैं। इन चावलों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन ए, सी, और ई की अच्छी खासी मात्रा होती है। कैलोरी में कम और शर्करा में कम होने के साथ ही समा के चावलों में फाइबर, कैल्शियम, पोटैशियम, फास्फोरस, आयरन, और मैग्नीशियम भी होता है।

डायबिटीज रोगी भी समा के चावल खा सकते हैं। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 50 होता है, जो लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स कैटेगरी में आता है। इसमें उच्च फाइबर ब्लड ग्लूकोज लेवल को कंट्रोल में रखता है।

ग्लूटन-फ्री आहार की सलाह पर, समा के चावल आदर्श हैं क्योंकि इनमें ग्लूटन की मात्रा बहुत कम होती है, जो ग्लूटन से संबंधित समस्याओं में राहत पहुंचाता है।

हड्डियों के लिए भी समा के चावल लाभकारी हैं क्योंकि इसमें भरपूर कैल्शियम होता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाता है और हड्डियों से जुड़ी समस्याओं को दूर रखता है।

वजन कम करने के लिए भी समा के चावल बेहतरीन हैं क्योंकि इसमें कैलोरी की मात्रा कम और फाइबर अधिक होता है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है और वजन घटाने में सहायता मिलती है।

समा के चावल पाचन समस्याओं को भी कम करते हैं। इन्हें खाने से अपच, कब्ज, गैस, और ब्लॉटिंग की समस्याएं नहीं होतीं, जिससे पाचन तंत्र में सुधार होता है।

27/04/2024
गांव के बियाहपहले गाँव मे न टेंट हाऊस थे और न कैटरिंग, थी तो बस सामाजिकता। गांव में जब कोई शादी ब्याह होते तो घर घर से च...
17/03/2024

गांव के बियाह
पहले गाँव मे न टेंट हाऊस थे और न कैटरिंग, थी तो बस सामाजिकता। गांव में जब कोई शादी ब्याह होते तो घर घर से चारपाई आ जाती थी, हर घर से थरिया, लोटा, कलछुल, कराही इकट्ठा हो जाता था और गाँव की ही महिलाएं एकत्र हो कर खाना बना देती थीं। औरते ही मिलकर दुलहिन तैयार कर देती थीं और हर रसम का गीत गारी वगैरह भी खुद ही गा लिया करती थी।
तब DJ अनिल-DJ सुनील जैसी चीज नही होती थी और न ही कोई आरकेस्ट्रा वाले फूहड़ गाने। गांव के सभी चौधरी टाइप के लोग पूरे दिन काम करने के लिए इकट्ठे रहते थे। हंसी ठिठोली चलती रहती और समारोह का कामकाज भी। शादी ब्याह मे गांव के लोग बारातियों के खाने से पहले खाना नहीं खाते थे क्योंकि यह घरातियों की इज्ज़त का सवाल होता था। गांव की महिलाएं गीत गाती जाती और अपना काम करती रहती। सच कहु तो उस समय गांव मे सामाजिकता के साथ समरसता होती थी।
खाना परसने के लिए गाँव के लौंडों का गैंग समय पर इज्जत सम्हाल लेते थे। कोई बड़े घर की शादी होती तो टेप बजा देते जिसमे एक कॉमन गाना बजता था-मैं सेहरा बांधके आऊंगा मेरा वादा है और दूल्हे राजा भी उस दिन खुद को किसी युवराज से कम न समझते। दूल्हे के आसपास नाऊ हमेशा रहता, समय समय पर बाल झारते रहता था और समय समय पर काजर-पाउडर भी पोत देता था ताकि दुलहा सुन्नर लगे। फिर द्वारा चार होता फिर शुरू होती पण्डित जी लोगों की महाभारत जो रातभर चलती। फिर कोहबर होता, ये वो रसम है जिसमे दुलहा दुलहिन को अकेले में दो मिनट बतियाने के लिए दिया जाता था लेकिन इत्ते कम समय में कोई क्या खाक बात कर पाता। सबेरे कलेवा में जमके गारी गाई जाती और यही वो रसम है जिसमे दूल्हे राजा जेम्स बांड बन जाते कि ना, हम नही खाएंगे कलेवा। फिर उनको मनाने कन्यापक्ष के सब जगलर टाइप के लोग आते।
अक्सर दुलहा की सेटिंग अपने चाचा या दादा से पहले ही सेट रहती थी और उसी अनुसार आधा घंटा या पौन घंटा रिसियाने का क्रम चलता और उसी से दूल्हे के छोटे भाई सहबाला की भी भौकाल टाइट रहती लगे हाथ वो भी कुछ न कुछ और लहा लेता...फिर एक जय घोष के साथ रसगुल्ले का कण दूल्हे के होठों तक पहुंच जाता और एक विजयी मुस्कान के साथ वर और वधू पक्ष इसका आनंद लेते।
उसके बाद दूल्हे का साक्षात्कार वधू पक्ष की महिलाओं से करवाया जाता और उस दौरान उसे विभिन्न उपहार प्राप्त होते जो नगद और श्रृंगार की वस्तुओं के रूप में होते.. इस प्रकिया में कुछ अनुभवी महिलाओं द्वारा काजल और पाउडर लगे दूल्हे का कौशल परिक्षण भी किया जाता और उसकी समीक्षा परिचर्चा विवाह बाद आहूत होती थी और लड़कियां दूल्हा के जूता चुराती और 21 से 51 में मान जाती। इसे दूल्हा दिखाई कहा जाता था.
फिर गिने चुने बुजुर्गों द्वारा माड़ौ (विवाह के कर्मकांड हेतु निर्मित अस्थायी छप्पर) हिलाने की प्रक्रिया होती वहां हम लोगों के बचपने का सबसे महत्वपूर्ण आनंद उसमें लगे लकड़ी के शुग्गों ( तोता) को उखाड़ कर प्राप्त होता था और विदाई के समय नगद नारायण कड़ी कड़ी 10/20 रूपये की नोट जो कहीं 50 रूपये तक होती थी।
वो स्वार्गिक अनुभूति होती कि कह नहीं सकते हालांकि विवाह में प्राप्त नगद नारायण माता जी द्वारा 2/5 रूपये से बदल दिया जाता था।
आज की पीढ़ी उस वास्तविक आनंद से वंचित हो चुकी है जो आनंद विवाह का हम लोगों ने प्राप्त किया है.
लोग बदलते जा रहे हैं, परंपरा भी बदलते चली जा रही है, आगे चलकर यह सब देखन को मिलेगा की नही अब इ त विधाता जाने लेकिन जो मजा उस समय मे था, वह अब धीरे धीरे बिलुप्त हो रहा है।

साभार

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खुशखबरी ही खुशखबरी💐💐💐💐💐💐💐💐💐न्यू  एग्जीक्यूटिव अचीवर्सबुंदेलखंड की पावन धरती भगवान श्री राम की तपोस्थली बांदा  से श्री प्...
24/11/2023

खुशखबरी ही खुशखबरी
💐💐💐💐💐💐💐💐💐

न्यू एग्जीक्यूटिव अचीवर्स

बुंदेलखंड की पावन धरती भगवान श्री राम की तपोस्थली बांदा से
श्री प्रेम चंद प्रजापति जी
बबेरू बांदा (उत्तर प्रदेश)
🚀🚀🚀🚀🚀🚀🚀🚀🚀🚀

अपने सीनियर के मार्गदर्शन में और टीम के सहयोग से श्री प्रेम चंद प्रजापति जी रूट प्योर से एग्जीक्यूटिव बन गए है।

JJJ परिवार आपको बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं दे रहा है

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जल्द आप सिल्वर लेवल प्राप्त कीजिए।

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मैचिंग इनकम 5000/-
बोनस रिवॉर्ड 5000/-
टोटल 10000/-

👉अन्य विशेष उपलब्धियाँ
🌷माइंड मिरेकल अटेंड करने का मौका

💐💐बधाई ही बधाई💐 💐
श्री प्रेम चंद प्रजापति जी को पूरी टीम को बधाई,,,
🌷🌷🌷💐💐💐💐🌹🌹❤️🚩🚩🚩🍀☘🌿🌸🌸💐💐🌿
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जबरदस्त और सम्मानित सीनियर्स
🚀श्री अमित मिश्रा जी
🚀श्री विशेष कुमार जी
🚀श्री मनोज शर्मा जी
🚀श्री श्याम धर मौर्या जी
🚀डा.विजय मौर्या सर जी
🚀श्री विनोद कुमार मौर्या जी
🚀श्री ओम प्रकाश मौर्या जी
🚀श्री जीत बहादुर जी
🍬 श्री अमित कुमार जी
🍬 श्री अमर सिंह जी

All the best for next level
👍👍👍👍👍👍👍👍
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संदेश- जिसको विश्वास है,
उसको सब कुछ मिलेगा,
जिसको विश्वास नही है,
उसको कुछ नही मिलेगा

20/03/2023

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