17/02/2025
जेम्स ज्वायस- द सिस्टर्स
अनुवाद- शिव किशोर तिवारी
बहनें
इस बार उनके बचने की उम्मीद नहीं थी : यह तीसरा स्ट्रोक पड़ा था। हर रात मैं उस घर के पास से गुजरता (स्कूल की छुट्टियाँ थीं) और रोशन,आयताकार खिड़की को ध्यान से देखता: हर रात रोशनी एक-सी होती - मद्धिम और बराबर। अगर उनकी मृत्यु हो चुकी होती तो मेरा ख्याल था मुझे अँधेरे पर्दे पर मोमबत्तियों की झलक दिखती क्योंकि मुझे पता था कि मृतक के सिरहाने दो मोमबत्तियाँ जलाते हैं। वे अक्सर मुझसे कहते थे कि ‘मैं कुछ ही दिनों का मेहमान हूँ’, पर मैंने सोचा था कि यूँ ही कह रहे हैं। अब पता चला कि बात सच थी। हर रात खिड़की की ओर देखते हुए मैं ‘फालिज’ शब्द को खुद से धीमे स्वर में कहता था। यह शब्द हमेशा मेरे कानों में अजीब-सा सुनाई देता, जैसे ज्यामिति में नोमाॅन या धार्मिक प्रश्नोत्तरी में साइमनी (पादरी द्वारा पैसे लेकर पापमुक्ति देना, जो मना था - अनु) परंतु इस समय यह किसी दुष्ट पापात्मा के नाम-जैसा लग रहा था। मेरे लिए यह शब्द डरावना था, फिर भी मैं इसके भयानक परिणाम पर दृष्टिपात करने के लिए इसके सान्निध्य की कामना कर रहा था।
जब मैं सांध्य भोजन के लिए नीचे उतरा तो बूढ़ा काॅटर आग के सामने बैठा पाइप पी रहा था। मेरी चाची मेरे लिए करछुल से दलिया परोसने लगीं, तभी काॅटर ने - मानो पहले से चल रही किसी बात को आगे बढ़ाते हुए - कहा:
— नहीं, मैं नहीं समझता कि वो बिलकुल …लेकिन कुछ तो था जो असामान्य था …कुछ अजीब आदमी था। मेरा अपना ख्याल है …
वह पाइप पीने लगा, निःसंदेह अपना ख्याल अपने दिमाग में व्यवस्थित करते हुए। बुड्ढा खूसट कहीं का ! जब हम लोगों का पहला परिचय हुआ था तब वह दिलचस्प आदमी लगा था - वह शराब फैक्टरी के अपने अनुभव सुनाता और शराब बनाने की बारीकियों के बारे में बातें करता। लेकिन जल्द ही शराब फैक्टरी से सम्बंधित उसकी असंख्य कहानियों से मैं ऊब गया था।
— इस विषय पर मेरा अपना मत है, वह बोला । मेरा मत है कि मामला कुछ उस तरह का है…जिस तरह के वो अजीब-से… लेकिन कहना कठिन है…
बिना बताये कि उसका मत था क्या, वह फिर पाइप खींचने लगा। चाचा ने मुझे उधर घूरते देखा तो मुझसे बोले:
— वो … तुम्हें जानकर अफसोस होगा कि तुम्हारा पुराना संगी चला गया।
— कौन? मैंने कहा।
— फादर फ्लिन।
— वे नहीं रहे?
— अभी मिस्टर काॅटर ने बताया। इधर से गुजर रहे थे।
मुझे पता था कि सब मुझे देख रहे हैं, तो मैं खाना खाता रहा - ऐसा भाव दिखाते हुए जैसे मुझे इस खबर में कोई रुचि नहीं थी। चाचा ने काॅटर को बताया:
— लड़के की उनसे बड़ी नजदीकी थी। सच कहूँ तो बुजुर्गवार ने इसे बहुत कुछ सिखाया। लोग बताते हैं कि वे चाहते थे यह कुछ बने।
— उनकी आत्मा पर परमेश्वर की दया रहे , चाची भक्तिभाव से बोलीं।
बूढ़ा कुछ देर तक मेरी तरफ देखता रहा। मैंने महसूस किया कि वह अपनी कौड़ी-सी आँखों से मेरा जायजा ले रहा था, लेकिन मैं अपनी प्लेट पर नजरें जमाये रहा और उसे निराश होना पड़ा। वह पाइप को एक बार और खींचने लगा; असभ्य ढंग से उसने फायर प्लेस में थूका।
— मैं अपने किसी बच्चे को ऐसे आदमी के साथ ज्यादा मेलजोल करते नहीं देखना चाहूँगा।
— मतलब, मिस्टर काॅटर? मेरी चाची ने पूछा।
— मेरा मतलब है, बच्चों के लिए यह ठीक नहीं है। मेरा विचार है : लड़के दूसरे हमउम्र लड़कों के साथ खेलें-कूदें, न कि…क्यों जैक?
— मेरा भी यही सिद्धांत है, मेरे चाचा ने कहा, कुछ काम-धंधा सीखे और जिन्दगी बनाये। मैं इस सूफी-मिजाज से कहता रहता हूँ, एक्सरसाइज करो। मैं जब छोटा था तब जाड़ा-गरमी-बरसात रोज सुबह ठंडे पानी से नहाता था। उसकी वजह से मैं आज भी स्वस्थ हूँ। विद्या अच्छी चीज है, बड़ी चीज है, लेकिन …मिस्टर काॅटर को वह मटन शायद पसंद आये, एक टुकड़ा लाओ तो, मेरी चाची की ओर देखकर उन्होंने जोड़ा।
— नहीं, नहीं, मेरे लिए नहीं, काॅटर ने कहा।
चाची पकवान को खाने की आलमारी से निकालकर लाईं और टेबुल पर रख दिया।
— लेकिन बच्चों के लिए ऐसा मेलजोल ठीक नहीं यह क्यों समझते हैं आप? चाची ने पूछा।
— क्योंकि किसी भी चीज का असर बच्चों के दिमाग पर बहुत जल्दी पड़ता है, काॅटर ने कहा। जब बच्चे इस तरह की चीजें देखते हैं, माने…तो असर पड़ता है…
मैंने अपने मुँह में ढेर-सारा दलिया भर लिया कि गुस्से में कुछ कह न बैठूँ। थकाऊ, पियक्कड़ बुड्ढा, गधा!
उस रात नींद देर से आई। मैं बुड्ढे काॅटर द्वारा बच्चा पुकारे जाने पर नाराज था; फिर भी मैंने उसके असमाप्त वाक्यों में कोई अर्थ तलाशने के लिए दिमाग पर जोर दिया। कमरे के अँधेरे में मैंने कल्पना की कि लकवाग्रस्त व्यक्ति का भारी रक्तहीन मुख फिर मेरे सामने है। मैंने कम्बल सिर के ऊपर तक खींच लिया और क्रिसमस के बारे में सोचने की कोशिश की। परन्तु रक्तहीन मुख तब भी मेरे सामने था और कुछ बुदबुदा रहा था ; मैं समझ गया कि वह कोई स्वीकारोक्ति करने का इच्छुक था। मैंने अनुभव किया कि मेरी आत्मा किसी सुहावने परंतु क्रूर लोक में लौट गई है ; वहाँ भी मुझे वह मुख पहले से मौजूद मिला। वह अस्पष्ट स्वर में ‘कंफेशन’ (कैथलिक चर्च में पाप का स्वीकार करने की रीति -अनु) के शब्द मुझसे बोलने लगा। मुझे समझ में नहीं आया कि वह बार-बार मुस्करा क्यों रहा था और उसके ओठ थूक-सने क्यों थे। लेकिन फिर मुझे याद आ गया कि इसकी मृत्यु लकवे से हुई थी; मैंने अपने आप को भी फीकी मुस्कान मुसकाता महसूस किया, मानो ‘साइमनी’ के पाप से उसे मुक्ति दिला रहा हूँ।
अगले दिन नाश्ते के बाद मैं ग्रेट ब्रिटेन रोड पर स्थित उस छोटे से मकान तक गया। एक साधारण-सी दूकान थी जो ‘वस्त्रालय’ के अनिश्चित नाम से पंजीकृत थी। ‘वस्त्रालय’ में अधिकतर बच्चों के ऊनी जूते और छाते भरे रहते थे; साधारणता खिड़की पर एक तख्ती लटकी रहती थी जिस पर लिखा होता था : ‘छातों पर नया कपड़ा चढ़ाया जाता है’। इस समय वह तख्ती नहीं दिख रही थी क्योंकि शटर बंद थे। दरवाजा खटखटाने वाले कुंडे पर बँधे रिबन के सहारे क्रेप से बना एक गुलदस्ता लटका था। दो महिलाएँ और एक तार कर्मचारी क्रेप पर पिने से टँके एक कार्ड को पढ़ रहे थे। मैंने भी पास जाकर पढ़ा:
1 जुलाई, 1895
रेवरेंड जेम्स फ्लिन ( सेंट कैथरीन चर्च, मीथ स्ट्रीट) , आयु- 65 वर्ष
दिवंगत
पढ़कर पक्का हो गया कि उनका देहांत हो चुका है; मैं विचलित हुआ कि इस बात ने मेरे कदम रोक दिये। वे मरे न होते तो मैं सीधा दूकान के पीछे उनके छोटे अँधेरे-से कमरे में पहुँच जाता और वहाँ वे मुझे आग के पास, भारी ओवरकोट से लगभग दमघोंट तरीके से ढके, अपनी कुर्सी में बैठे मिलते। शायद मेरे हाथ में चाची का भेजा नसवार का पैकेट होता और यह उपहार उनकी उनींदी शिथिलता को भंग कर देता। हर बार मैं ही उनकी काली नसदानी में इस नसवार को भरता था; खुद उनके हाथ इस तरह काँपते थे कि आधी नसवार नसदानी के बजाय फर्श पर जा पड़ती। जब वे अपने काँपते भारी हाथ से नसवार नाक तक ले जाते थे तब भी उनकी उँगलियों से खिसक कर नसवार के छोटे बादल उनके कोट के सामने वाले हिस्से पर फैल जाते। सम्भव है इन्हीं बादलों की वजह से उनके पादरी के चोगे पर एक काई-सी जमी रहती, क्योंकि हफ्ते भर नसवार के दाग पोछकर पहले से ही काला पड़ा लाल रूमाल, जिसे वे चोगे से नसवार के महीन टुकड़ों को झाड़ने के लिए इस्तेमाल करते थे, इस काम के लिए अक्षम हो चुका होता था।
मैं अंदर जाकर उनको एक नजर देखना चाहता था लेकिन दरवाजा खटखटाने की हिम्मत न हुई। सड़क पर जिधर धूप थी उधर चलते हुए, दूकानों की खिड़कियों पर लटकते थियेटरों के विज्ञापनों को देखता, मैं लौट चला। मुझे यह अजीब लग रहा था कि न मेरा न उस दिन का मिजाज ऐसा था जिसे मातमी कहा जाय; दरअसल इस मौत ने मुझमें आजादी का एहसास पैदा किया था, मानो किसी चीज से मुझे मुक्ति मिल गई हो, और यह एहसास मुझमें एक खीझ-सी पैदा कर रहा था। मुझे इस बात से अचरज हो रहा था क्योंकि, जैसा मेरे चाचा ने पिछली शाम को कहा था, फादर फ्लिन ने मुझे बहुत कुछ सिखाया था। उनकी पढ़ाई रोम के आयरिश कालेज में हुई थी, सो उन्होंने मुझे लैटिन शब्दों के सही उच्चारण बताये थे। उन्होंने मुझे कब्रों वाली सुरंगों (सम्भवतः रोम की मानव-निर्मित प्राचीन सुरंगें जिनमें कभी मुर्दे दफनाये जाते थे - अनु) और नेपोलियन ( नेपोलियन ने रोम को अपनी दूसरी राजधानी बनाया था और उसके स्मारक सुरक्षित किये थे,पर साथ ही बहुत सी कलाकृतियाँ पेरिस उठा लाया था - अनु) के किस्से सुनाये थे; साथ ही उन्होंने कैथलिक प्रार्थना-सभाओं तथा उसके पादरियों द्वारा विभिन्न अवसरों पर पहनी जाने वाली पोशाकों की बारीकियाँ समझाई थीं। कभी -कभी वह अपने मनोविनोद के लिए मुझसे कठिन प्रश्न पूछते, कि किन परिस्थितियों में क्या करना सम्मत है, या अमुक काम गम्भीर पाप की श्रेणी में आयेगा या मामूली पाप की या उसे केवल चारित्रिक खामी के रूप में देखा जायेगा। उनके सवालों से मुझे पता चला कि कैथलिक चर्च की परम्पराएँ जिन्हें मैं आम और मामूली समझता था उनके भीतर कितनी जटिलताएं और रहस्य समाहित थे। ‘यूकरिस्ट’ ( ईसा के अंतिम आहार का स्मरण- अनु) में पादरी का उत्तरदायित्व और कंफेशन में सुनी बातों को गुप्त रखने का कर्तव्य इतने गम्भीर प्रतीत होते थे कि मुझे आश्चर्य होता, कोई भी कभी भी इन कर्तव्यों का भार ग्रहण करने का साहस कहाँ से लाता होगा; फिर इस बात से मुझे कोई अचरज नहीं हुआ जब उन्होंने बताया कि चर्च के बड़ों ने इन गूढ़ प्रश्नों का समाधान करने के लिए ऐसे ग्रंथ लिख रखे थे जो पोस्ट ऑफिस की डाइरेक्टरी जितने मोटे और अखबारों में छपने वाली अदालती नोटिसों जैसे महीन अक्षरों वाले थे। अक्सर ऐसा होता कि मैं बहुत सोचने के बाद भी उनके प्रश्नों का बेवकूफी-भरा या हिचकिचाहट-भरा उत्तर देता और वे मुसकराते हुए अपना सिर दो-तीन बार ऊपर-नीचे हिलाते। कभी वे मुझसे प्रार्थना-सभा में बोले जाने वाले शब्दों और श्रोताओं द्वारा दिये जाने वाले जवाबों की बाबत पूछते जिन्हें उन्होंने मुझे रटा रखा था; मैं बोलता जाता और वे विचारमग्न मुद्रा में मुसकराते रहते, और बीच-बीच में ढेर सारी नसवार बारी-बारी दोनों नथुनों से खींचते। जब वे मुसकराते तब उनके बदरंग दाँत दिखाई पड़ते और उनकी जीभ उनके निचले होठ पर लगी होती। यह मुद्रादोष पहले मुझे असहज करता था, जब हम नये मिले थे और अभी घनिष्ठता का भाव नहीं आया था।
धूप में चलते-चलते मुझे बूढ़े काॅटर के शब्द याद आये, फिर मैंने याद करने की कोशिश की कि अंत में स्वप्न में क्या हुआ था। मुझे याद आया कि मैंने लम्बे मखमली पर्दे देखे थे और प्राचीन शैली का एक झूलता हुआ लैम्प। मुझे लगा जैसे मैं किसी दूर देस में पहुँच गया था जहाँ के रीति-रिवाज दीगर थे - शायद फारस में … पर स्वप्न का अंत मुझे याद नहीं आया।
शाम को मेरी चाची मुझे साथ लेकर मृतक के परिवार से पुछार करने के लिए गईं। सूरज डूब चुका था, परंतु जिन घरों की खिड़कियाँ पश्चिम की ओर थीं उनके शीशों में एक दल बादलों की भूरी-सुनहरी परछाईं दिख रही थी। नैनी ने दालान में हमारा स्वागत किया। चूँकि चिल्लाकर बात करना मुनासिब नहीं था (नैनी को कम सुनाई देता होगा - अनु), इसलिए चाची ने उनसे बिना कुछ कहे हाथ मिलाया। वृद्ध महिला ने ऊपर उँगली उठाकर प्रश्नसूचक इशारा किया और मेरी चाची ने गर्दन जरा-सा झुकाकर ‘हाँ’ की। वे सँकरी सीढ़ियों पर कठिनाई के साथ आगे- आगे चढ़ने लगीं; उनका झुका सिर सीढ़ी की रेलिंग से बस मामूली-सा ऊपर रहा होगा। पहली लैंडिंग पर वे रुक गई और इशारे से हमें मृतक के कमरे के खुले दरवाजे की ओर बुलाया। चाची अंदर चली गईं । वृद्धा ने मुझे हिचकता देखकर बार-बार हाथ हिलाकर पुन: आमंत्रित किया।
मैं पैर दबाकर आहिस्ता दाखिल हुआ। खिड़की जहाँ जालीदार पर्दे से ढकी थी उधर से छनकर आती भूरी-सुनहरी रोशनी कमरे में छाई हुई थी, उस रोशनी में मोमबत्तियाँ पतली हल्के रंग की लौ-सी दिख रही थीं। मृतक को ताबूत में रखा जा चुका था। नैनी की अगुवाई में हम लोग बिस्तर की पैतानी तरफ घुटनों के बल बैठ गये। मैंने प्रार्थना करने का दिखावा किया परंतु मन उस पर केंद्रित न कर सका क्योंकि बूढ़ी महिला की बुदबुदाहट मेरा ध्यान भंग कर रही थी। मैंने लक्ष्य किया कि उनकी स्कर्ट पीछे की ओर बेतरतीब ढंग से हुक की हुई थी और उनके कपड़े के बूटों की एड़ियाँ सिर्फ एक तरफ को घिसी हुई थीं। मुझे अजीब ख्याल आया कि मृत पादरी काॅफिन में लेटे हुए मुसकरा रहे थे।
लेकिन नहीं। जब हम लोग उठकर सिरहाने की ओर गये तो मैंने देखा कि मृतक के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। वे ताबूत में पड़े थे - गम्भीर और बृहत; उनके शरीर पर पूजा-वेदी वाली पोशाक थी और उनके बड़े-बड़े हाथों में एक पवित्र पात्र किसी तरह टिकाया हुआ था। उनका सफेद, विशाल मुख बड़ा उग्र दिख रहा था और उस पर हल्की सफेद दाढ़ी थी। नथुने नसवार से काले पड़े और गुफा-तुल्य गभीर लग रहे थे। कमरे में तेज गंध समाई हुई थी - फूलों की गंध।
हमने अपने ऊपर सलीब का निशान बनाया और बाहर आ गये। नीचे के छोटे कमरे में पादरी जिसमें बैठा करते थे उसी कुर्सी में एलाइजा औपचारिक सांत्वना ग्रहण करने बैठी थीं। मैंने अपनी हमेशा वाली कोने में रखी कुर्सी का रास्ता टटोला। नैनी साइडबोर्ड से शेरी का पात्र और गिलास लाईं। उन्होंने यह सब टेबुल पर रखकर हमसे छोटा शेरी का गिलास लेने का आग्रह किया। फिर अपनी बहन के कहने पर गिलासों में शेरी डालकर सबके हाथ में पकड़ा दिया। मुझसे उन्होंने क्रीम क्रैकर बिस्कुट भी लेने का आग्रह किया, परंतु मैंने मना कर दिया क्योंकि मुझे लगा उसे खाने में बहुत आवाज होगी। मेरे मना करने से उन्हें कुछ निराशा हुई, ऐसा प्रतीत हुआ। वे चुपके से अपनी बहन के पीछे रखे सोफे पर जाकर बैठ गईं। किसी ने कुछ नहीं कहा: हम खाली फायरप्लेस की ओर देखते रहे।
चाची ने इंतजार किया और जब एलाइजा ने एक उसाँस भरी तब वे बोलीं :
— जो भी हो, वे एक बेहतर दुनिया में गये।
एलाइजा ने फिर उसाँस भरी और सम्मति में सिर झुकाया। चाची वाइन के गिलास की डंडी पर उँगलियाँ फिराती बैठी रहीं, उन्होंने वाइन की एक चुस्की ली।
— उनकी … शांति से…? उन्होंने पूछा।
— हाँ, अत्यंत शांतिपूर्वक, मैडम, एलाइजा ने कहा। प्राण कब निकले पता भी न चला। भगवान का शुक्र है, उनकी मृत्यु अच्छे ढंग की हुई।
— और सब …?
— फादर ओरोर्क मंगलवार को आये थे मृत्यु के पहले के कर्मकांड कर गये थे।
— तो उनको अपनी आसन्न मृत्यु का ज्ञान था?
— हाँ, वे स्वीकार के भाव में आ चुके थे।
— स्वीकार का भाव उनके चेहरे पर दिख रहा है, चाची बोलीं।
— शव को धोने वाली स्त्री ने भी यही कहा। बोली, वे मानो सो रहे हों, वे इतने शांत और ईश्वरेच्छा को स्वीकार करने की मुद्रा में दिख रहे हैं! कोई नहीं सोचता होगा कि वे मृत्यु में इतने आकर्षक दिखेंगे।
— हाँ, सचमुच, चाची ने कहा।
उन्होंने गिलास से एक और चुस्की ली और बोलीं:
—जो भी हो, मिस फ्लिन, आपको इस बात का संतोष होगा कि उनके लिए जो भी हो सकता था आपने किया। मानना होगा कि आप दोनों ने उनका खूब ख्याल रखा।
एलिजाबेथ ने अपनी स्कर्ट को घुटनों के ऊपर सीधा किया।
— बेचारा जेम्स! भगवान जानता है कि हमने गरीबी के बावजूद उसको कोई कमी न होने दी।
नैनी ने सोफे की पीठ पर सिर टिका लिया था, ऐसा लग रहा था कि सोने ही वाली है।
— बेचारी नैनी को देखो, एलाइजा ने कहा, एकदम थक चुकी है। कितना कुछ करना था हम दोनों को - शव को धोने वाली स्त्री को बुलाना, फिर शव को तैयार करना, ताबूत और चर्च में प्रार्थना की व्यवस्था । फादर ओरोर्क न होते तो न जाने हम कैसे यह सब कर पाते। वही ये सारे फूल लाये, और चर्च से वो दो मोमबत्तियाँ; उन्होंने ही ‘फ्रीमन्स जनरल’ (फ्रीमन्स जर्नल- अनु) में छापने के लिए सूचना तैयार की, और कब्रगाह की और जेम्स के बीमे की लिखा-पढ़ी पूरी की।
— कितनी भलमनसाहत है उनकी! मेरी चाची ने कहा।
एलाइजा ने भावावेग में अपना सिर धीरे-धीरे हिलाया।
— पुराने दोस्तों जैसा कोई दोस्त नहीं होता, वे बोलीं, कुल मिलाकर, उनके अलावा और कोई काम नहीं आता।
— सच बात है, चाची ने कहा। और मुझे विश्वास है कि अब जब कि फादर फ्लिन अपने पुण्यों का पुरस्कार पाने परलोक जा चुके हैं, वे आप दोनों को और आपकी सेवा को नहीं भूलेंगे।
— बेचारा जेम्स! एलाइजा ने कहा, उसके लिए हमें ज्यादा तकलीफ नहीं उठानी पड़ती थी। घर में उसकी आवाज पहले भी लगभग उतनी ही सुनाई देती जितनी आज। फिर भी यह तो पता लग रहा है कि अब वह नहीं है…
— जब सब कुछ हो जायेगा ( जब अन्त्येष्टि हो जायेगी - अनु) तब उनकी कमी का एहसास होगा, चाची ने कहा।
— पता है, एलाइजा ने कहा, मैं भविष्य में उसके लिए बीफ टी (बीमारों के लिए मुफीद समझा जाने वाला सूप - अनु) लेकर नहीं जाऊँगी, न आप, मैडम, उसको नसवार का तोहफा भेजेंगी। आह, बेचारा जेम्स!
वे रुक गईं, माने भूतकाल से मौन सम्वाद कर रही हों। उसके बाद वे बोलीं तो उनके लहजे में एक सयानापन था:
— आप समझो मुझे पता पड़ गया था, हाल के दिनों में जेम्स की चाल-ढाल अजीब-सी हो गई थी। जब मैं उसका सूप देने जाती तो देखती कि उसकी ‘ब्रीवियरी’ (रोज के कर्मकांड की पुस्तक -अनु) नीचे फर्श पर पड़ी है, वह कुर्सी में पसरा हुआ है और उसका मुँह खुला है।
उन्होंने अपनी उँगली नाक की बगल में लगाई ( एक इशारा कि जो कहा जा रहा है वह गोपनीय है - अनु) , फिर कहना जारी रखा :
— इस सबके बावजूद वह बार-बार कहता कि गर्मियाँ बीतने के पहले वह आयरिशटाउन के उस घर को देखने जायेगा जहाँ हमारा जन्म हुआ था और हम दोनों को भी साथ ले जायेगा ; बस वो नई चाल की भाड़ागाड़ी दिन भर के लिए सस्ते में मिल जाय जिसके बारे में फादर ओरोर्क ने उसे बताया था - कि उसके पहिये रूमैटिक (न्यूमैटिक-अनु) होते हैं, इसलिए चलते हुए आवाज नहीं करती। उसे आशा थी कि ऐसी गाड़ी जाॅनी रश की दूकान से मिल जायेगी और एक रविवार की शाम हम तीनों आयरिशटाउन जायेंगे। वहाँ जाने का बड़ा मन था उसका … बेचारा जेम्स!
— यीशु उनकी आत्मा पर रहम करें, मेरी चाची ने कहा।
एलाइजा ने रूमाल निकालकर अपनी आँखें पोछीं, फिर उसे वापस जेब में रख लिया। कुछ देर तक वह बिना कुछ बोले खाली फायरप्लेस की ओर देखती रही।
— वो सदा से ही बड़ा ईमानदार रहा था, वह बोली। पादरी के पद के कार्य उसके सामर्थ्य की तुलना में बहुत अधिक थे। फिर उसका जीवन भी - कह सकते हैं - अभिशप्त था।
— हाँ, वे निराश व्यक्ति थे, मेरी चाची ने कहा। दिखाई पड़ता था।
उस छोटे कमरे में नीरवता का अधिकार हो गया, उसकी छाया में मैंने मेज तक जाकर अपनी शेरी को चखा और उसके बाद आहिस्ता से अपनी कोने वाली कुर्सी पर लौट आया। एलाइजा अपने विचारों में बिलकुल खोई लग रही थी। हम लोगों ने ससंभ्रम उसके मुँह खोलने की प्रतीक्षा की: बहुत देर बाद वह धीरे-धीरे बोली:
— पवित्र पात्र उसके हाथ से गिरकर टूट गया … शुरूआत वहीं से हुई। हालाँकि सबने कहा कि कुछ नहीं हुआ, माने पात्र खाली था। फिर भी… सबने कहा गलती आल्टर ब्वाय ( पादरी का सहायक - अनु) की थी। लेकिन जेम्स बेचारा इतना घबराया था, भगवान उस पर दया करे!
— ओ, यह बात थी, चाची ने कहा। मैंने कुछ सुना था…
एलाइजा ने स्वीकार में सिर नवाया।
— इस घटना का उसके दिमाग पर बड़ा असर पड़ा , वह बोली। इसके बाद वह अकेला और उदास रहने लगा - किसी से बात न करना और अपने आप इधर-उधर डोलते रहना! एक रात किसी के यहाँ से उसका बुलावा आया, पर वह किसी को ढूँढ़कर न मिला। सब जगह उसकी तलाश हुई पर उसकी परछाईं भी न दिखी। तब क्लर्क ने सुझाया कि गिरजे में देखा जाय। तो चाबी महँगाई गई और गिरजाघर खोला गया। क्लर्क, फादर ओरोर्क और एक और पादरी जो उपस्थित था उसे रोशनी लेकर ढूंढ़ने लगे…कोई सोच सकता है?…वह गिरजे के अंदर ही था, अकेले कंफेशन बाक्स के अँधेरे में बैठा, पूरे होशो-हवास में, अपने आप ही धीमे स्वर में हँसता हुआ-सा!
सहसा वह रुक गई, जैसे कोई आवाज सुनने को। मैंने भी सुनने की कोशिश की, पर घर में कोई आवाज नहीं थी; मुझे पता था कि बूढ़े पादरी अपने ताबूत में उसी तरह निश्चल पड़े हैं जैसा हमने देखा था, मृत्यु की गोद में गम्भीर और उग्र, और छाती पर एक व्यर्थ पवित्र-पात्र टिकाये हुए।
एलाइजा ने फिर बात का सिरा पकड़ा:
— पूरे होशो-हवास में, अपने आप हँसता हुआ-सा…तो क्या होना था, जब उन लोगों ने यह सब देखा तब उनको लग गया कि जेम्स को कुछ हो गया है…
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