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Animal KingdomPhylum Porifera➢ Porifera means pore bearers.➢ Members of this phylum are commonly known as sponges.➢ Body...
12/03/2021

Animal Kingdom
Phylum Porifera
➢ Porifera means pore bearers.
➢ Members of this phylum are commonly known as sponges.
➢ Body is perforated with many pores called ostia.
➢ Ostia are mouthlets and allow entry of water.
➢ A larger aperture called osculum allows exit of water.Phylum Porifera
Habit and Habitat
➢ These are generally marine and mostly asymmetrical animals.
➢ Some sponges are found in fresh water also like Spongilla.
➢ Adult sponges are sessile or sedentary but their larvae are motile.
➢ Study of sponges is Parazoology.Phylum Porifera
Habit and Habitat
➢ These are primitive multicellular animals and have cellular level of organisation.
➢ Sponges are on a blind branch of evolutionary tree.
➢ Sponges have evolved from colonial choanoflagellates.
➢ Connecting link between Protozoa and Porifera is Proterospongia.Phylum Porifera
Body Structure
➢ Body wall has two layers i.e.
○ Outer Pinacoderm
○ Inner Choanoderm
➢ In between these two layers, a non-cellular jelly-like layer called mesenchyme is
present.
➢ Body cavity is called spongocoel or paragastric cavity or atrium.Phylum Porifera
MesenchymePhylum Porifera
Body Structure
➢ Pinacoderm has pinacocytes.
➢ Choanoderm has choanocytes.
➢ Choanocytes are also called collared
flagellated cells.
➢ These line the spongocoel and the canals.Phylum Porifera
Gas Exchange
➢ All body systems are absent.
➢ Gas exchange occurs through general body surface.
➢ There are no specialised respiratory structures.Phylum Porifera
Excretory System
➢ Excretion occurs through general body surface.
➢ Specialised excretory structures are absent.
➢ Excretory product is ammonia(Ammonotelic).Phylum Porifera
Food and Feeding
➢ These are microphagous animals.
➢ These feed on microscopic food particles like bacteria, protozoans etc.
➢ Digestion is intracellular.
➢ Food is captured by flagella of choanocytes which digest it partially.
➢ Partially digested food is passed on to trophocytes which digest it completely and
distribute it.Phylum Porifera
Skeletal System
➢ The body is supported by a skeleton made up of spicules or spongin fibres.
➢ Spicules are small needle like structures which are of two types.
○ Calcareous Spicules (made up of CaCO3)
○ Siliceous Spicules (made up of silica)Phylum Porifera
Nervous System
➢ There are no neurons but these are sensitive to external environment.
➢ Pinacocytes are contractile cells.
➢ These can increase or decrease overall surface area of sponge body.Phylum Porifera
Canal System
➢ Sponges have a water transport or canal system.
➢ It is also called aquiferous system.
➢ It is lifeline of sponges.
➢ Water enters through minute pores (ostia) in the body wall into a central cavity,
spongocoel(Paragastric cavity) from where it goes out through the osculum.Phylum Porifera
Canal System
➢ It is a system of pores, chambers and canals through which water circulates.
➢ This pathway of water transport is helpful in
○ food gathering
○ respiratory exchange
○ removal of wastes
○ reproduction.Phylum Porifera
Reproductive System
➢ Sexes are not separate.
➢ These are hermaphrodite animals, i.e., eggs and s***ms are produced by the same
individual.Phylum Porifera
Reproductive System
➢ Reproduction is asexual as well as sexual.
➢ Asexual reproduction is by
○ Fragmentation,
○ Budding
○ Branching
○ Gemmule formation.
➢ Sexual reproduction is by formation of gametes.Phylum Porifera
Fertilisation and Development
➢ Fertilisation is internal.
➢ Scypha sponge is protogynous i.e. ova matures earlier than s***matozoa.
➢ Flagella of choanocytes captures s***m and passes it to ova developing in
mesenchyme.Phylum Porifera
Fertilisation and Development
➢ Development is indirect having a larval stage, which is morphologically distinct
from the adult.
➢ Larvae are ciliated and free swimming.
➢ Larval stages are
○ amphiblastula
○ parenchymula
○ rhagon.Phylum Porifera
Examples
➢ Spongilla (freshwater sponge)
➢ Euspongia (common bath sponge)
➢ Sycon (crown sponge or urn sponge)Phylum Porifera Examples
➢ Hyalonema (glass rope sponge)
➢ Euplectella - Venus’s flower basket (It is given as a wedding gift in Japan).

संघ पोरिफेरा (Phyllum Porifera): पोरिफेरा ग्रीक भाषा के दो शब्द Poros = Pore, Ferre = to bear से मिलकर बना है। इसका अर्थ...
11/08/2020

संघ पोरिफेरा (Phyllum Porifera): पोरिफेरा ग्रीक भाषा के दो शब्द Poros = Pore, Ferre = to bear से मिलकर बना है।
इसका अर्थ छिद्र धारक होता है।
पोरीफेरा शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रॉबर्ट ग्राण्ट (Robert Grant) ने 1825 ई. में किया था। इस संघ में आने वाले जन्तुओं को साधारणतः स्पंज (sponge) कहा जाता है। इस संघ के जन्तुओं के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-

ये बहुकोशिकीय जलीय (Multicellular aquatic) जन्तु होते हैं जो साधारणतः चट्टान या किसी ठोस पदार्थ पर रहते हैं।
इनकी आकृति अनियमित, बेलनाकार, अंडाकार या शाखीय होती है।
इनके शरीर में ऊतक नहीं बनते।इस संघ के जन्तुओं की शरीर भित्ति (Body wan) में अनेक छिद्र पाये जाते हैं जिन्हें ऑस्टिया (Ostia) कहते हैं। शरीर के अग्र सिरे पर एक बड़ा छिद्र पाया जाता है जिसे ओस्कुलम (Osculum) कहते हैं।
ये अत्यंत साधारण बहुकोशिकीय जीव हैं जिनमें नाल तंत्र (Canal system) पाया जाता है जिसकी सहायता से सम्पूर्ण शरीर में जल प्रवाहित होता है। ये द्विलिंगी (Bisexual) होते हैं।इनमें पुनरुद्भवन (Regeneration) of क्षमता होती है।
शरीर कठोर बाह्य ककाल से ढंका होता है। कंकाल में काँटे के समान कुछ रचनाएँ होती हैं जिन्हें स्पिकूल्स (spicules) कहते हैं।
ये स्पिकूल्स कैल्सियम कार्बोनेट या सिलिका के बने होते हैं।इनका शरीर द्विस्तरीय अन्तःचर्म एवं बाह्यचर्म से बना होता है।इनमें प्रजनन अलैंगिक (Asexual) तथा लैंगिक (sexual) दोनों ही प्रकार का होता है तथा निषेचन (Fertilization) आतंरिक (Internal) होता है।इनका लार्वा (Larva) कशाभिकीय (Ciliated) तथा स्वतंत्र तैरने वाला (Free swimming) होता है। इसे एम्फीब्लास्तुला (Amphiblastula) कहते हैं।इनके शरीर में संवेदी तथा तंत्रिका कोशिकाएँ नहीं होती हैं।इनमें भोजन का पाचन अन्तःकोशिकीय (Intracellular) होता है।

उदाहरण– साइकन (Sycon), हायलोनेमा (Hyalonemma) यूस्पंजिया (Euspongia), युप्लेक्टेला (Euplectella), स्पंजिला (spongilla) आदि।

महत्वपूर्ण तथ्य:(important thoughts)

यूप्लेक्टेला को वीनस की पुष्प मंजूषा या वीनस के फूलों की डलिया (venus flower basket) कहा जाता है। ये जापान आदि देशों में लोगों को उपहार के रूप में दिए जाते हैं।स्पंजिला मीठे जल में पाया जाने वाला स्पंज है।यूस्पंजिया एक साधारण स्नान स्पंज (Bath sponge) है। इसे स्नान के समय मैल (गंदगी) साफ करने के काम में इस्तेमाल किया जाता है। यह भूमध्य सागर एवं मैक्सिको की खाड़ी में काफी संख्या में पाया जाता है।

संघ प्रोटोजोआ Phylum Protozoaप्रोटिस्टा जगतसंघ प्रोटोजोआ (Phylum Protozoa):प्रोटोजोआ दो शब्दों Protos = First, Zoon = An...
11/08/2020

संघ प्रोटोजोआ Phylum Protozoa

प्रोटिस्टा जगत

संघ प्रोटोजोआ (Phylum Protozoa):

प्रोटोजोआ दो शब्दों Protos = First, Zoon = Animal से मिलकर बना है। प्रोटोजोआ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम गोल्डफस (Goldfus) ने 1820 ई. में किया। प्रोटोजोआ सबसे आदिकालीन एवं सबसे साधारण जन्तु हैं। ये एककोशिकीय (Unicellular) तथा सूक्ष्मदर्शीय (Microscopic) जंतु होते हैं। इस संघ में लगभग 30,000 जातियाँ (species) हैं। इस संघ के जन्तुओं के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-

ये जन्तु अत्यन्तं सूक्ष्म (001 mm से 5.0 mm) और एककोशिकीय (Unicellular) होते हैं।ये स्वतंत्रजीवी, सहजीवी (Symbiotic) या सहभोजी (Commensal) या परजीवी (Parasites) होते हैं।इनके शरीर का जीवद्रव्य (Protoplasm) बाह्यद्रव्य और अन्तः द्रव्य में विभेदित रहता है।इस संघ के जन्तुओं में पोषण (Nutrition) मुख्यतः प्राणी समभोजी (Holozoic), मृतोपजीवी (Saprophytic or saprozoic), पादपसमभोजी (Holophytic) या परजीविता (Parasitic) विधि द्वारा होता है।इस संघ के जन्तुओं के शरीर में कोई ऊतक (Tissue) या अंग (Organ) नहीं होता है। इसमें पायी जाने वाली आकृतियों को अंगक (Organelles) कहते हैं, क्योंकि वे शरीर के हिस्से होते हैं। इसलिए प्रोटोजोआ को ‘जीवद्रव्य के स्तर पर गठित (Protoplasmic level of body organisation) जंतु कहते हैं।
इस संघ के जंतुओं में प्रचलन (Locomotion) कूटपाद (Pseudopodia), कशाभिका (Flagella) या यक्ष्माभिका (Cilia) द्वारा होता है।इस संघ के जन्तुओं के एककोशिकीय शरीर में रसधानियाँ (vacuoles) एवं संकुचनशील रसधानियाँ (Contractile vacuoles) पाई जाती हैं।
इस संघ के जन्तु एक केन्द्रकीय या बहुकेन्द्रकीय होते हैं। इस संघ के जन्तुओं में श्वसन तथा उत्सर्जन की क्रियाएँ शरीर की बाहरी सतह के रास्ते विसरण (Diffusion) क्रिया द्वारा होती है।इस संघ के जन्तुओं में प्रजनन अलिंगी (Asexual) तथा लिंगी (sexual) दोनों विधियों द्वारा सम्पन्न होता है। अलिंगी प्रजनन (Asexual reproduction) द्विविभाजन (Binary fission), बहुविभाजन (Multiple fission) या मुकुलन (Budding) द्वारा तथा लिंगी प्रजनन (Sexual reproduction) नर तथा मादा युग्मकों के समागम (Conjugation) से होता है।
प्रतिकूल वातावरण (Unfavourable condition) से सुरक्षा के लिए इनमें परिकोष्ठन (Encystment) की व्यापक क्षमता होती है।इनका शरीर नग्न या पोलिकिल (Pollicle) द्वारा ढंका रहता है। कुछ जन्तु कठोर खोल में बन्द रहते हैं।

उदाहरण– अमीबा (Amoeba), एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba Histolytica), एण्टअमीबा कोलाई (Entamoeba coli), एण्टअमीबा जिंजीवैलिस (Entamoeba gingivalis), ट्रिपैनोसोमा गैम्बिएन्स (Trypanosoma gambiense), लीशमैनिया डोनोवानी (Leishmania donovani), प्लैजमोडियम (Plasmodium), पैरामीशियम कॉडेटम (Paramecium caudatum), यूग्लीना (Euglena) आदि।

महत्वपूर्ण तथ्य:

अमीबा का अर्थ है-‘बदलना’। प्रोटियस (Proteus) ग्रीस का एक समुद्र देवता (sea God) है जिनको शरीर का आकार बदलने की विशेष क्षमता है, इसलिए अमीबा का वैज्ञानिक अमीबा प्रोटियस (Amoeba proteus) रखा गया है।एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका परजीवी के कारण मनुष्य में पेचिश (Amoebic dysentery) होती है।
एण्टअमीबा कोलाई मनुष्य के बृहदंत्र (Colon) में रहता है तथा जीवाणुओं को खाता है। यह कभी भी रक्त कोशिकाओं या अन्य ऊतकों को नहीं खाता है। अत: यह हानिकारक नहीं होता है।
एण्टअमीबा जिंजीवैलिस परजीवी द्वारा मनुष्य में पायरिया (Pyarrhoea) रोग होता है।
ट्रिपैनोसोमा गैम्बियेन्स मनुष्य के रुधिर में पाया जाता है। इस परजीवी से मनुष्य में सुषप्ति रोग (sleeping sickness) होता है। जब ये रुधिर प्रवाह में रहते हैं तब मनुष्य को गैम्बियन ज्वर (Gambian fever) हो जाता है। इस ज्वर से मनुष्य में कमजोरी हो जाती है, चेतना गायब हो जाती है तथा रक्त कम हो जाता है।लीशमैनिया डीनोवानी का पता 1903 ई. में इंग्लैंड में लीशमैन (Leishman) एवं मद्रास (चेन्नई) में डीनोवान (Donovan) द्वारा लगाया गया था। इसलिए इसका नाम लीशमैनिया डोनोवानी (Leishmania donovani) रखा गया। इसके कारण मनुष्य में कालाजार (Kalazar) नामक रोग होता है। यह रोग भारत, पूर्वी एशिया तथा भूमध्यसागरीय (Mediterranean) देशों में होता है।मनुष्य एवं अन्य स्तनधारियों में मलेरिया ज्वर प्लैजमोडियम के द्वारा ही उत्पन्न होता है।
पैरामीशियम कॉडेटम का आकार बहुत कुछ चप्पल से मिलता-जुलता है। अतः इसे चप्पल जंतु (Slipper animalcule) भी कहते हैं।यूग्लीना को हरा प्रोटोजोआ (Green protozoa) कहा जाता है।

Classification
10/08/2020

Classification

10/08/2020

Good morning
Everyone

03/08/2020

खाना जो हमें स्फूर्तिवान बनाता है, खाना जो हमें बड़ा करता है, खाना जो हमें चमकाता है, वह खाना अच्छा है जो शरीर को ताक़तवर बनाता है!कुपोषण तब होता है जब हम बहुत कम खाते हैं या बेकार खाना (जंक फ़ूड) बहुत ज़्यादा खाते हैं। खाते समय बैठकर अच्छा भोजन सही मात्रा में साझा करके कुपोषण से बचें।यह जाँचने के लिए कि वे अच्छी तरह बड़े हो रहे हैं, 2 साल से कम उम्र के बच्चों को हर महीने अंडर-5 क्लिनिक में तौला जाना चाहिए।यदि बच्चे दुबले हो जाएँ, या उनका चेहरा या पैर सूज जाएँ, या वे बहुत चुप हो जाएँ तो स्वास्थ्यकर्मी का उन्हें देखना ज़रूरी है।बीमार होने पर बच्चों की भूख मर सकती है। बीमारी से उबरते समय उन्हें सामान्य से ज़्यादा भोजन, ढेर सारा पेय और सूप दें।जन्म से लेकर 6 महीने की उम्र तक बच्चे को खाने-पीने के लिए केवल माँ के दूध की ज़रूरत होती है। इसमें स्फूर्ति, बढ़त और चमक है!6 महीने बाद बच्चों को माँ के दूध के अलावा दिन में 3 या 4 बार मसला या पिसा हुआ पारिवारिक भोजन और बीच में नाश्ते की ज़रूरत होती है।हर सप्ताह विभिन्न रंगों के प्राकृतिक खाद्य पदार्थ खाना स्वस्थ संतुलित आहार पाने का सबसे अच्छा तरीका है।लाल, पीले और हरे फल और सब्ज़ियाँ सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरे हुए हैं। ये देखने में बहुत छोटे होते हैं, लेकिन हमारा शरीर ताक़तवर बनाते हैं।पकाए-खाए जाने वाले पदार्थों को धोकर बीमारी और दुःख से बचें। पके हुए भोजन का उपयोग जल्दी करें या इसे सँभाल कर रखें।

03/08/2020

7. पोषण (Hindi, Nutrition)

‘बच्चों के सीखने और साझा करने के लिए 100 स्वास्थ्य संदेश’ 8-14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए सरल, विश्वसनीय स्वास्थ्य शिक्षा संदेश हैं । इसलिए इसमें 10-14 साल के युवा किशोर शामिल हैं। हमें लगता है कि 10-14 वर्ष के युवा किशोरों को निश्चित रूप से सूचित किया जाना विशेषत: उपयोगी और महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आयु समूह अक्सर अपने परिवार में छोटे बच्चों की देखभाल करता है। साथ ही अपने परिवार की इस तरह सहायता करने के लिए वे जो काम कर रहे हैं उसे मान्यता देना और उसकी प्रशंसा करना महत्वपूर्ण है।

इन 100 संदेशों में 10 प्रमुख स्वास्थ्य विषयों में से प्रत्येक पर 10 संदेश हैं: मलेरिया, अतिसार (डायरिया, दस्त), पोषण, खाँसी-ज़ुकाम और बीमारी, आँत के कीड़े, जल और स्वच्छता, टीकाकरण, एचआईवी और एड्स, दुर्घटनाएँ और चोट, तथा प्रारंभिक शैशव विकास। ये सरल स्वास्थ्य संदेश माता-पिता और स्वास्थ्य शिक्षकों के लिए घर, स्कूलों, क्लबों और क्लिनिकों में बच्चों के साथ उपयोग करने के लिए हैं।

पोषण (nutrition) वह विशिष्ट रचनात्मक उपापचयी क्रिया जिसके अन्तर्गत पादपों में खाद्य्य संश्लेषण तथा स्वांगीकरण(गुण लगना) ...
03/08/2020

पोषण (nutrition) वह विशिष्ट रचनात्मक उपापचयी क्रिया जिसके अन्तर्गत पादपों में खाद्य्य संश्लेषण तथा स्वांगीकरण(गुण लगना) और विषमपोषी जन्तुओं में भोज्य अवयव के अन्तःग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण द्वारा प्राप्त उर्जा से शारीरिक वृद्धि, मरम्मत, ऊतकों का नवीनीकरण और जैविक क्रियाओं का संचालन होता है, सामूहिक रूप में पोषण कहलाती है। पोषण के अन्तर्गत निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार किया जाता है-

पोषक तत्वों का सेवन,पोषक तत्वों का प्रत्येक दिन के आहार में उचित में रहना,पोषक तत्वों की कमी से शरीर में विकृतिचिह्नों का दिखाई पड़ना। पौधों में श्वसन पत्तियों द्वारा होता है

Happy Rakshabandhan
03/08/2020

Happy Rakshabandhan

02/08/2020

अनुवांशिकी के पिता ग्रेगर जॅान मेंडल को कहा जाता है।
हरगोविंद खुराना को नोबेल पुरस्कार जीनDNA से संबंधित खोज के लिए मिला था।
मानव शरीर में गुणसूत्रो की संख्या 46 ( 23 जोड़ा ) होती है।
चेचक का टीका की खोज एडवर्ड जैनर ने की थी।
स्वस्थ मनुष्य के शरीर के रक्त का पी. एच. मान 7.4 होता है।
एलीसा प्रणाली ( ELISA Test ) से एड्स बीमारी के HIV वायरस का पता लगाया जाता है।

02/08/2020

रक्त समूह ( Blood Group ) एवं आर एच तत्व( RH Factor ) की खोज कार्ल लैंडस्टीनर ने की थी।
स्वस्थ मनुष्य रक्त दाब 120/80 mmhg ( Systolic / diastolic ) होता है।
यूरोक्रोम की उपस्थिति के कारण मूत्र का रंग हल्का पीला होता हैं।

01/08/2020

वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की जीवनी – Charles Darwin Biography In Hindi

चार्ल्स रोबर्ट डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शोर्पशायर के श्रेव्स्बुरी में हुआ था। उनका जन्म उनके पारिवारिक घर दी माउंट में हुआ था। चार्ल्स अपने समृद्ध डॉक्टर रोबर्ट डार्विन की छः संतानों में पांचवे थे। रोबर्ट डार्विन एक मुक्त विचारक थे। चार्ल्स को बचपन से ही प्रकृति में रूचि थी।

1817 में 8 साल की उम्र में ही धर्मोपदेशक द्वारा चलायी जा रही स्कूल में पढ़ते थे और प्रकृति के इतिहास के बारे में जानना चाहते थे। उसी साल जुलाई में उनकी माता का देहांत हो गया था। इसके बाद सितंबर 1818 से चार्ल्स अपने बड़े भाई इरेस्मस के साथ रहने लगे थे और एंग्लिकन श्रेव्स्बुर्री स्कूल में पढ़ते लगे।

चार्ल्स डार्विन से 1825 की गर्मिया प्रशिक्षाण ग्रहण करने वाले डॉक्टर की तरह बितायी थी और अपने पिता के कामो में भी वे सहायता करते थे। अपने भाई के साथ अक्टूबर 1825 तक एडिनबर्घ मेडिकल स्कूल में जाने से पहले तक चार्ल्स यही काम करते थे। लेकिन मेडिकल स्कूल में उन्हें ज्यादा रूचि नही थी इसीलिये वे मेडिकल को अनदेखा करते रहते। बाद में 40 घंटो के लंबे सेशन में उन्होंने जॉन एड्मोंस्टोन से चर्म प्रसाधन सिखा।

डार्विन ने यूनिवर्सिटी के दुसरे साल प्लिनियन सोसाइटी जाना शुरू किया जहाँ प्रकृति-इतिहास से संबंधित विद्यार्थियों का समूह प्रकृति के इतिहास परब चर्चा करते रहते।

बाद में 27 मार्च 1827 तक उन्होंने शरीर रचना विज्ञान पर खोज कर रहे रोबर्ट एडमंड ग्रांट की सहायता भी की थी। यूनिवर्सिटी में वे हमेशा ही प्रकृति का इतिहास जानने की कोशिश करते रहते। विविध पौधों के नाम जानने की कोशिश करते रहते और पौधों के टुकडो को भी जमा करते। ऐसा करते-करते प्रकृतिविज्ञान में उनकी रूचि बढती गयी और धीरे-धीरे उन्होंने प्रकृति की जानकारी इकट्टा करना शुरू किया। बाद में उन्होंने पौधों के विभाजन की जानकारी प्राप्त करना भी शुरू किया।

जब उनके पिता ने उन्हें कैम्ब्रिज के च्रिस्ट कॉलेज में मेडिकल की पढाई के लिये भेजा तब उन्होंने मेडिकल में अपना ध्यान देने की बजाये वे लेक्चर छोड़कर पौधों की जानकारी हासिल करने लगते। इसके बाद वे बॉटनी के प्रोफेसर जॉन स्टीवन के अच्छे दोस्त बन गये और उनके साथ उन्होंने प्रकृतिविज्ञान के वैज्ञानिको से भी मुलाकात की।

उन्हें प्रोफेसर जॉन स्टीवन हेंसलो के साथ रहने वाला इंसान भी कहा जाता था। प्रकृति विज्ञान की साधारण अंतिम परीक्षा में जनवरी 1831 में वे 178 विद्यार्थियों में से दसवे नंबर पर आये थे।

जून 1831 तक डार्विन कैम्ब्रिज में ही रहे थे। वहा उन्होंने पाले की नेचुरल टेक्नोलॉजी का अभ्यास किया और अपने लेखो को भी प्रकाशित किया। उन्होंने प्रकृति के कृत्रिम विभाजन और विविधिकरण का भी वर्णन किया था। प्रकृति से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिये उन्होंने कई साल वैज्ञानिक यात्रा भी की थी।

प्रकृति के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने के लिये उन्होंने एडम सेडविक का प्रकृति कोर्स भी किया था। इसके बाद उन्होंने उन्ही के साथ लगातार चार रातो तक यात्रा भी की थी।

1859 में डार्विन ने अपनी किताब “ऑन दी ओरिजिन ऑफ़ स्पिसेस” में मानवी विकास की प्रजातियों का विस्तृत वर्णन भी किया था। 1870 से वैज्ञानिक समाज और साथ ही साधारण मनुष्यों ने भी उनकी इस व्याख्या को मानना शुरू किया।

1930 से 1950 तक कयी वैज्ञानिको ने जीवन चक्र को बताने की कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नही मिल पायी। लेकिन डार्विन ने सुचारू रूप से वैज्ञानिक तरीके से जीवन विज्ञान में जीवन में समय के साथ-साथ होने वाले बदलाव को बताया था।

शुरू से ही डार्विन को प्रकृति में रूचि थी और इसी वजह से उन्होंने एडिनबर्घ यूनिवर्सिटी में चल से अपने मेडिकल अभ्यास को अनदेखा किया और समुद्री रीढ़विहीन खोज में सहायता भी करने लगे थे। बाद में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रकृति का अभ्यास करने के बाद उनका मनोबल और भी बढ़ गया।

बाद में पाँच साल तक HMS बीगलआ में जलयात्रा करने के बाद उन्होंने स्वयं को भूवैज्ञानिक के रूप में स्थापित किया और साथ ही चलेस ल्येल की एकसमानता की योजना पर उन्होंने अपना लेख भी प्रस्तुत किया था और उनके इसी लेख की वजह से वे एक प्रसिद्ध लेखक भी बन गये थे।

वन्य जीवो के भौगोलिक विभाजन से वे चकित थे और इसी वजह से डार्विन से विस्तृत खोज करना शुरू किया और 1838 में प्रकृति से संबंधित अपनी व्याख्या प्रकाशित की। इसके साथ ही उन्होंने विचारो को दुसरे बहुत से प्रकृतिविज्ञानीयो के साथ भी बाटा।

लेकिन जीव विज्ञान पर पुरी तरह से खोज करने के लिये उन्हें थोड़े समय की जरुरत थी। जब अल्फ्रेड रुस्सेल वल्लास ने उन्हें समान विचारो पर अपना निबंध भेजा तभी 1858 में उन्होंने अपनी व्याख्या लिखी, जिसमे दोनों के सह-प्रकाशन से उन्होंने दोनों व्याख्याओ को प्रस्तुत किया था। डार्विन की प्रकृति से संबंधित व्याख्या के बाद प्रकृति में होने वाले विविधिकरण को लोग आसानी से जान पाये थे।

1871 में उन्होंने मानवी प्रजातियों और उनके लैंगिक चुनाव की भी जाँच की। पौधों पर की गयी उनकी खोज को बहुत सी किताबो में प्रकाशित भी किया गया था। और उनकी अंतिम किताब में सब्जियों में फफूंद के निर्माण की क्रिया का वर्णन था, उन्होंने केचुए की जाँच की थी और तेल पर होने वाले उनके प्रभाव को जाना था।

चार्ल्स डार्विन ने मानवी इतिहास के सबसे प्रभावशाली भाग की व्याख्या दी थी और इसी वजह से उन्हें कयी पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया था।

मृत्यु –

1882 में एनजाइना पेक्टोरिस की बीमारी की वजह से दिल में सक्रमण फैलने के बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी। सूत्रों के अनुसार एनजाइना अटैक और ह्रदय का बंद पड़ना ही उनकी मृत्यु का कारण बना।

19 अप्रैल 1882 को उनकी मृत्यु हुई थी। अपने परिवार के लिये उनके अंतिम शब्द थे:

“मुझे मृत्यु से जरा भी डर नही है – तुम्हारे रूप में मेरे पास एक सुंदर पत्नी है – और मेरे बच्चो को भी बताओ की वे मेरे लिये कितने अच्छे है।”

उन्होंने अपनी इच्छा व्यतीत की थी उनकी मृत्यु के बाद उन्हें मैरी चर्चयार्ड में दफनाया जाये लेकिन डार्विन बंधुओ की प्रार्थना के बाद प्रेसिडेंट ऑफ़ रॉयल सोसाइटी ने उन्हें वेस्टमिनिस्टर ऐबी से सम्मानित भी किया। इसके बाद उन्होंने अपनी सेवा कर रही नर्सो का भी शुक्रियादा किया। और अपने अंतिम समय में साथ रहने के लिये परिवारजनों का भी शुक्रियादा किया।

उनकी अंतिम यात्रा 26 अप्रैल को हुई थी जिसमे लाखो लोग, उनके सहकर्मी और उनके सह वैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री और शिक्षक भी मौजूद थे।

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Ambedkar Nagar
Lucknow

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+9616014547

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