M/S Gupta Medical Hall

M/S Gupta Medical Hall Helth Is The Priceless Thing

प्रस्तुत है श्रीहनुमान चालीसा (अर्थ सहित), जो आपको सहज रूप से मिलेगा नहीं और इसे पढ़ने के बाद हनुमान चालीसा और रुचिकर लग...
30/06/2026

प्रस्तुत है श्रीहनुमान चालीसा (अर्थ सहित), जो आपको सहज रूप से मिलेगा नहीं और इसे पढ़ने के बाद हनुमान चालीसा और रुचिकर लगेगा।

दोहा ~
श्री गुरु चरण सरोज रज,
निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि॥

अर्थ : गुरु के चरणों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्रदान करता है।

बुद्धिहीन तनु जानिके,
सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेश विकार॥

अर्थ : हे पवनपुत्र हनुमान! मैं स्वयं को बुद्धिहीन और निर्बल जानकर आपका स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और ज्ञान प्रदान करें तथा मेरे सभी दुःख, दोष और विकारों का नाश करें।

चौपाइयाँ ~
1.
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

अर्थ : हे हनुमान जी! आपकी जय हो। आप ज्ञान और गुणों के अथाह सागर हैं। तीनों लोकों में आपकी कीर्ति प्रकाशित है।
2.
राम दूत अतुलित बलधामा।
अंजनी पुत्र पवनसुत नामा॥

अर्थ : आप श्रीराम के दूत, अतुलनीय बल के धाम, माता अंजनी के पुत्र और पवनदेव के सुपुत्र हैं।
3.
महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥

अर्थ : आप महान पराक्रमी हैं। आप बुरी बुद्धि का नाश करते हैं और सद्बुद्धि वालों के सहायक हैं।
4.
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुंचित केसा॥

अर्थ : आपका स्वर्ण के समान तेजस्वी वर्ण है। आप सुंदर वस्त्र, कानों में कुण्डल और घुँघराले केशों से सुशोभित हैं।
5.
हाथ वज्र और ध्वजा विराजे।
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥

अर्थ : आपके हाथ में वज्र और ध्वजा शोभायमान हैं तथा कंधे पर मूँज का यज्ञोपवीत सुशोभित है।
6.
शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन॥

अर्थ : आप भगवान शंकर के अंशावतार और केसरी के पुत्र हैं। आपका तेज और पराक्रम पूरे संसार में वंदनीय है।
7.
विद्यावान गुणी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥

अर्थ : आप विद्वान, गुणवान और अत्यंत बुद्धिमान हैं। आप सदैव श्रीराम के कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं।
8.
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥

अर्थ : आपको श्रीराम की कथा सुनने में अत्यंत आनंद मिलता है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण सदैव आपके हृदय में विराजमान हैं।
9.
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

अर्थ : आपने छोटा रूप धारण कर माता सीता को दर्शन दिए और विशाल रूप धारण कर लंका को जला दिया।
10.
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज संवारे॥

अर्थ : आपने विकराल रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया और श्रीराम के सभी कार्य सफल बनाए।
11.
लाय सजीवन लखन जियाए।
श्री रघुवीर हरषि उर लाए॥

अर्थ : आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। इससे प्रसन्न होकर श्रीराम ने आपको हृदय से लगा लिया।
12.
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥

अर्थ : श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम मुझे भरत के समान प्रिय हो।
13.
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

अर्थ : श्रीराम ने कहा कि तुम्हारे यश का वर्णन हजार मुख भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकते, और यह कहकर ह्रदय से लगा लिया।
14.
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥

अर्थ : सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, नारद, सरस्वती और शेषनाग आदि सभी आपकी महिमा का गुणगान करते हैं।
15.
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

अर्थ : यमराज, कुबेर, दिग्पाल, विद्वान और महान कवि भी आपके यश का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।
16.
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा।
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥

अर्थ : आपने सुग्रीव को श्रीराम से मिलाकर उनका राज्य वापस दिलाया।
17.
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

अर्थ : विभीषण ने आपका परामर्श माना और लंका के राजा बने। यह बात समस्त संसार जानता है।
18.
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

अर्थ : बाल्यकाल में आपने दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझकर निगलने का प्रयास किया।
19.
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥

अर्थ : श्रीराम की मुद्रिका मुख में रखकर आपने समुद्र पार किया। आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।
20.
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

अर्थ : आपकी कृपा से संसार के कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं।
21.
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

अर्थ : आप श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं। आपकी अनुमति के बिना वहाँ प्रवेश नहीं मिल सकता।
22.
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना॥

अर्थ : जो आपकी शरण में आता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हों तो किसी भय का स्थान नहीं रहता।
23.
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक ते काँपै॥

अर्थ : अपने तेज को केवल आप ही नियंत्रित कर सकते हैं। आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप उठते हैं।
24.
भूत पिशाच निकट नहिं आवै।
महावीर जब नाम सुनावै॥

अर्थ : जहाँ आपका नाम लिया जाता है, वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ पास नहीं आतीं।
25.
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

अर्थ : आपके निरंतर स्मरण से रोग और पीड़ाएँ दूर होती हैं।
26.
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

अर्थ : जो मन, वचन और कर्म से आपका स्मरण करता है, उसे आप सभी संकटों से मुक्त करते हैं।
27.
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा॥

अर्थ : श्रीराम सर्वोच्च हैं और उनके सभी कार्य आपने सफलतापूर्वक पूर्ण किए।
28.
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥

अर्थ : जो भक्त सच्चे मन से अपनी इच्छा लेकर आपकी शरण में आता है, उसे उत्तम फल प्राप्त होता है।
29.
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥

अर्थ : आपका यश चारों युगों में प्रसिद्ध है और समस्त संसार को प्रकाशित करता है।
30.
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥

अर्थ : आप संतों की रक्षा करते हैं, दुष्टों का नाश करते हैं और श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं।
31.
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥

अर्थ : माता सीता के वरदान से आप अपने भक्तों को अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं।

अष्ट सिद्धियाँ ~

अणिमा – अति सूक्ष्म होना।
महिमा – अत्यंत विशाल होना।
गरिमा – अत्यधिक भारी होना।
लघिमा – अत्यंत हल्का होना।
प्राप्ति – इच्छित वस्तु प्राप्त करना।
प्राकाम्य – इच्छानुसार कार्य सिद्ध करना।
ईशित्व – शासन करने की शक्ति।
वशित्व – नियंत्रण एवं प्रभाव कीनिधियाँ।

नौ निधियाँ ~
महापद्म — अपार धन, वैभव और समृद्धि का प्रतीक।
पद्म — लक्ष्मी, ऐश्वर्य, सुख और सौभाग्य का प्रतीक।
शंख — यश, मंगल, प्रतिष्ठा और शुभता का प्रतीक।
मकर — शक्ति, साहस, सुरक्षा और प्रभाव का प्रतीक।
कच्छप — स्थिरता, धैर्य और सुरक्षित धन का प्रतीक।
मुकुन्द (या कुन्द) — आनंद, संतोष और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक।
नन्द — परिवार की वृद्धि, प्रसन्नता और समृद्धि का प्रतीक।
नील — दुर्लभ रत्न, ज्ञान, सौंदर्य और उच्च मूल्य का प्रतीक।
खर्व (या खरवा) — संचित धन, स्थायी संपत्ति और सुरक्षित संसाधनों का प्रतीक।

32.
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥

अर्थ : आपके पास श्रीराम-भक्ति रूपी अमृत है और आप सदैव श्रीराम के सेवक बने रहते हैं।
33.
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अर्थ : आपका भजन करने से श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है और अनेक जन्मों के दुःख दूर हो जाते हैं।
34.
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥

अर्थ : अंत समय श्रीराम के धाम की प्राप्ति होती है और पुनर्जन्म होने पर भी भगवान के भक्त बनते हैं।
35.
और देवता चित न धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥

अर्थ : जो आपकी भक्ति करता है, उसे सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
36.
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

अर्थ : जो आपका स्मरण करता है, उसके सभी संकट और पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं।
37.
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥

अर्थ : हे प्रभु हनुमान! आप पर बार-बार जय हो। कृपया गुरु के समान मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।
38.
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥

अर्थ : जो श्रद्धापूर्वक बार-बार हनुमान चालीसा का पाठ करता है, वह सभी बंधनों से मुक्त होकर महान सुख प्राप्त करता है।
39.
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

अर्थ : भगवान शिव साक्षी हैं कि जो श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करेगा, उसे सफलता और सिद्धि प्राप्त होगी।
40.
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥

अर्थ : तुलसीदास स्वयं को श्रीराम का सेवक मानते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हे हनुमानजी! आप उनके हृदय में सदैव निवास करें।।

🚩🏹धर्मो रक्षति रक्षितः 🏹🚩

26/02/2026

हर हर गंगे ; नमामि गंगे ?

26/02/2026
*आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सजीव और सूक्ष्म विज्ञान है।*❤️आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद...
02/02/2026

*आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सजीव और सूक्ष्म विज्ञान है।*
❤️
आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सजीव और सूक्ष्म विज्ञान है। यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन को समझता है और उसके आधार पर स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करता है। आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है — स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं, अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी का रोग दूर करना। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आयुर्वेद शरीर की प्रकृति और तासीर (constitution) को समझने पर विशेष बल देता है।

तासीर, जिसे आयुर्वेद में प्रकृति कहा जाता है, व्यक्ति के जन्म से ही उसमें विद्यमान होती है। यह उसकी शारीरिक बनावट, मानसिक प्रवृत्ति, पाचन क्षमता, रोग प्रतिरोधक शक्ति और जीवनशैली को प्रभावित करती है। किसी भी व्यक्ति की तासीर को समझे बिना यदि औषधि या आहार दिया जाए, तो वह लाभ के बजाय हानि भी पहुँचा सकता है। इसीलिए आयुर्वेद में रोग की नहीं, रोगी की चिकित्सा की जाती है।

तासीर क्या होती है,,,?

तासीर का अर्थ होता है — शरीर का वह स्वाभाविक ताप, स्वभाव और प्रवृत्ति, जो उसे विशेष बनाती है। आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर में तीन प्रकार के दोष होते हैं — वात, पित्त और कफ। इन्हीं तीनों के विभिन्न अनुपात के आधार पर शरीर की तासीर तय होती है। जब कोई एक दोष अधिक प्रबल होता है, तो व्यक्ति की प्रकृति उसी दोष के अनुसार होती है।

उदाहरण के लिए....

वात प्रकृति वालों की तासीर शुष्क, हल्की और ठंडी होती है।

पित्त प्रकृति वालों की तासीर गर्म, तीव्र और उष्ण होती है।

कफ प्रकृति वालों की तासीर भारी, ठंडी और स्थिर होती है।

कुछ व्यक्तियों में दो दोष प्रधान होते हैं (उदाहरण: वात-पित्त), और कुछ में तीनों संतुलित होते हैं, जिसे सम प्रकृति कहते हैं।

तासीर जानने के संकेत

अब प्रश्न उठता है कि हम अपनी या किसी और की तासीर कैसे पहचानें? इसके लिए आयुर्वेद शरीर, मन और व्यवहार के अनेक लक्षणों का अवलोकन करता है। यहाँ पर उन संकेतों का विस्तृत वर्णन किया गया है जो किसी व्यक्ति की तासीर को प्रकट करते हैं।

शरीर की बनावट और तापमान

तासीर का सबसे पहला प्रभाव शरीर के ताप और त्वचा पर दिखाई देता है। पित्त तासीर वाले व्यक्ति को अक्सर अधिक गर्मी लगती है, जबकि कफ तासीर वाला ठंडी जलवायु में भी सहज रहता है। वात प्रकृति के लोग ठंडी हवा या मौसम में जल्दी ठिठुरते हैं और उनकी त्वचा शुष्क होती है।

पाचन और भूख की स्थिति

व्यक्ति का पाचन तंत्र उसकी तासीर का सबसे बड़ा दर्पण है। पित्त प्रकृति वालों की जठराग्नि तेज होती है; उन्हें जल्दी भूख लगती है और वे भोजन न मिलने पर चिड़चिड़े हो जाते हैं। कफ तासीर वाले धीरे-धीरे और कम मात्रा में भोजन करते हैं और देर तक भूख न लगना आम बात है। वात तासीर वाले का पाचन अक्सर अस्थिर होता है; कभी तेज, कभी मंद।

मानसिक प्रवृत्ति

मन भी तासीर से प्रभावित होता है। वात प्रकृति के लोग अत्यधिक सोचने वाले, कल्पनाशील और चंचल होते हैं। पित्त वाले तेज बुद्धि और स्पष्ट वक्ता होते हैं, परंतु जल्दी क्रोधित भी हो सकते हैं। कफ तासीर के लोग शांत, सहनशील और स्थिर होते हैं, परंतु आलस्य की प्रवृत्ति उनमें अधिक होती है।

नींद और ऊर्जा स्तर

वात तासीर वालों की नींद कम और बाधित होती है। वे जल्दी जागते हैं और अक्सर अनिद्रा से पीड़ित रहते हैं। पित्त तासीर वालों की नींद मध्यम होती है, परंतु गर्मी के कारण बेचैनी हो सकती है। कफ तासीर वाले गहरी नींद लेते हैं और अधिक देर तक सोते हैं।

भावनात्मक प्रतिक्रिया

वात प्रकृति वाले भावुक होते हैं और जल्दी घबरा जाते हैं। पित्त वाले शीघ्र क्रोध करते हैं और निर्णय लेने में तेज होते हैं। कफ वाले भावनात्मक रूप से स्थिर होते हैं, परंतु परिवर्तन से बचते हैं और चीज़ों को पकड़कर रखने की प्रवृत्ति रखते हैं।

रोगों की प्रवृत्ति

प्रकृति यह भी निर्धारित करती है कि व्यक्ति किस प्रकार के रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील है। पित्त तासीर वालों को त्वचा रोग, जलन, एसिडिटी, लीवर संबंधी विकार होते हैं। वात प्रकृति वाले गठिया, जोड़ों के दर्द, गैस और अनिद्रा से पीड़ित होते हैं। कफ तासीर वालों को मोटापा, श्वास रोग, मधुमेह और कफ जन्य रोग होते हैं।

तासीर को कैसे संतुलित रखें?

हालाँकि तासीर जन्मजात होती है, लेकिन आयुर्वेद यह भी कहता है कि यदि जीवनशैली, आहार और दिनचर्या को संतुलित रखा जाए, तो प्रकृति के दुष्प्रभावों को नियंत्रित किया जा सकता है। यदि किसी की तासीर पित्त है, तो उसे उष्ण पदार्थों से परहेज़ करना चाहिए, ठंडी चीज़ें अधिक लेनी चाहिए, जैसे – खीरा, नारियल पानी, गुलकंद। वात तासीर वालों को गर्माहट देने वाले आहार और तेल मालिश की आवश्यकता होती है। कफ तासीर वालों को हल्का और गरम भोजन लेना चाहिए, साथ ही व्यायाम अनिवार्य है।

क्या तासीर समय के साथ बदलती है. ?

तासीर मूलतः स्थायी होती है, लेकिन विकृति यानी असंतुलन समय, ऋतु, आयु और आचरण के अनुसार उत्पन्न हो सकती है। जैसे बचपन में कफ अधिक होता है, युवावस्था में पित्त और वृद्धावस्था में वात का प्रभाव बढ़ जाता है। ऋतु परिवर्तन से भी शरीर की प्रकृति पर असर पड़ता है। अतः ऋतुचर्या, दिनचर्या और आहार संयम से अपने मूल स्वभाव को संतुलन में रखा जा सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार तासीर को जानना, स्वयं को जानने के बराबर है। जब हम अपनी तासीर को समझते हैं, तो हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि हमें क्या खाना चाहिए, कैसी जीवनशैली अपनानी चाहिए, किस प्रकार की औषधि या चिकित्सा हमारे लिए अनुकूल है। इससे हम अनेक रोगों से पहले ही बच सकते हैं। तासीर को जानना आत्म-ज्ञान की दिशा में पहला कदम है, जो हमें आयुर्वेद और प्राकृतिक जीवन की ओर ले जाता है।

तासीर को समझकर हम अपनी जीवनशैली को प्रकृति के अनुरूप ढाल सकते हैं और दीर्घकालीन स्वास्थ्य, मानसिक शांति तथा आत्मिक संतुलन प्राप्त कर सकते हैं। यही आयुर्वेद का उद्देश्य है — स्वस्थ और संतुलित जीवन की प्राप्ति, जो केवल रोगों से मुक्त रहने का नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में ‘स्वस्थ’ होने का अनुभव कराता है।

*मर कर भी अमर हो जाते है,**जो महादेव को अपना जीवन समर्पित कऱ जाते है ||**💙🍃M A H A D E V🍃💙*
02/02/2026

*मर कर भी अमर हो जाते है,*

*जो महादेव को अपना जीवन समर्पित कऱ जाते है ||*

*💙🍃M A H A D E V🍃💙*

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध l तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध llइस दोहे में तुलसीदास जी साधु-संगति या अच्छे लोग...
02/02/2026

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध l
तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध ll

इस दोहे में तुलसीदास जी साधु-संगति या अच्छे लोगों की संगति के महत्व को समझा रहे हैं। एक घड़ी का अर्थ है थोड़ा समय, आधी घड़ी उससे भी कम, और "आधी में पुनि आध" का अर्थ है उससे भी कम समय। तुलसीदास जी यह कहना चाहते हैं कि भले ही आप बहुत थोड़े समय के लिए संत या सज्जन व्यक्ति (साधु) की संगति करें, वह समय भी अमूल्य और बहुत फलदायक होता है।

इस पंक्ति में वह बताते हैं कि साधु-संगति या अच्छे और धार्मिक लोगों की संगति इतने कम समय में भी लाखों अपराधों को नष्ट कर सकती है। यहां "कोटि" का मतलब करोड़ों या बहुत अधिक है। तुलसीदास जी का तात्पर्य है कि अगर आप अच्छे लोगों के साथ थोड़ा भी समय बिताते हैं, तो आपके जीवन में जो भी गलतियाँ या पाप किए गए हैं, वे साधु-संगति के प्रभाव से मिट सकते हैं।

साधु-संगति का महत्व इतना अधिक है कि थोड़े से समय में भी इसका सकारात्मक प्रभाव आपके जीवन पर पड़ सकता है। यह आपके पुराने बुरे कर्मों को मिटा सकता है और आपके जीवन को नई दिशा दे सकता है। इसलिए जीवन में अच्छे लोगों, धर्मात्माओं और संतों के साथ समय बिताना बहुत आवश्यक है।
जय सिया राम

01/02/2026

February ka mahina ajeeb hai
Kitne dilo toh todti hai kambakht february
Yuhi nahi kisi ne iske din ghataye hai 🥺💔

*हनुमान जी महाराज की जय*    👣💦🪷🌹🚩🙏🙏*नमो हनुमते तुभ्यं नमो मारुतसूनवे।*  *नमः श्रीरामभक्ताय श्यामास्याय च ते नमः।।*  *नमो...
31/01/2026

*हनुमान जी महाराज की जय*
👣💦🪷🌹🚩🙏🙏

*नमो हनुमते तुभ्यं नमो मारुतसूनवे।*
*नमः श्रीरामभक्ताय श्यामास्याय च ते नमः।।*
*नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे।*
*लङ्काविदाहनार्थाय हेलासागरतारिणे।।*

हे हनुमान जी! आपको नमस्कार है। मारुतनन्दन! आपको प्रणाम है। श्री राम भक्त! आपको अभिवादन है। आपके मुख का वर्ण श्याम है, आपको नमस्कार है ।
आप सुग्रीव के साथ (भगवान श्री राम की) मैत्री कराने वाले और लंका को भस्म कर देने के अभिप्राय से खेल-खेल में ही महासागर को लांघ जाने वाले हैं, आप वानर-वीर को नमस्कार है।

*जय पवनपुत्र*

*हनुमान:जी:की उड़ने की गति .....*

बचपन में जब हमारे बड़े हमें रामायण की कहानियां सुनाया करते थे तब हमें लक्ष्मण जी के बेहोश होने पर हनुमान जी का संजीवनी बूटी लेने जाना व जाने का किस्सा सुनाया जाता था जिसमे संजीवनी बूटी ना मिलने पर पूरा का पूरा पर्वत उठाकर लाने वाला किस्सा रोचक लगता था। क्या कभी आपने यह सोचा कि उनके उड़ने की गति क्या होगी ? जिस तरह से हनुमान जी एक ही रात में श्रीलंका से हिमालय के पर्वतों पर पहुंचे ? और पहाड़ उठाकर वापस भी आ गए तो निश्चित ही उनके उड़ने की क्षमता बेहद तेज रही होगी। लेकिन कितनी तेज ? इस बात का सही सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन फिर भी आपके मन में उठ रहे सवालों के जवाब खोजने के लिए हमने कुछ तथ्यों का सहारा लिया और गुणा भाग करके हनुमान जी की रफ्तार जानने की कोशिश की है।

अगर इसमे कोई गलती या चुक होने कि संभावना भी हो सकती है। जहां तक हमारी जानकारी है जिस वक्त लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध होने वाला था उससे ठीक पहले मेघनाथ ने अपनी कुलदेवी की तपस्या शुरू की थी और वह तपस्या मेघनाथ ने पूरा दिन की थी। इस पूजा की खबर जब श्रीराम व उनकी सेना को लगी तो विभीषण ने बताया कि अगर मेघनाथ की तपस्या पूर्ण हो गई तो मेघनाथ अमर हो जाएगा उसके बाद तीनों लोकों में मेघनाथ को कोई नहीं मार सकेगा। इसीलिए मेघनाथ की तपस्या किसी तरीके से भंग कर के उसे अभी युद्ध के लिए ललकारना होगा। इसके बाद हनुमान जी सहित कई वानर मेघनाथ की तपस्या भंग करने गए। उन्होंने अपनी गदा के प्रहार से मेघनाथ की तपस्या भंग करने में सफलता प्राप्त की लेकिन तब तक रात हो चुकी थी।

लक्ष्मण जी ने रात को ही मेघनाथ को युद्ध के लिए ललकारा, रामायण के अनुसार उस समय रात्रि का दूसरा पहर शुरु हो चुका था। दोस्तों रात्रि का पहला पहर सूर्य अस्त होते ही शुरू हो जाता है और सूर्य उदय होने के साथ ही रात्रि का अंतिम यानी चौथा पहर खत्म हो जाता है। यह भी कहा जाता है कि लक्ष्मण जी और मेघनाथ के बीच बेहद घनघोर युद्ध हुआ था। उसके बाद मेघनाथ ने अपने शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग किया जिससे लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए।

लक्ष्मण जी के मूर्छित होने से समस्त वानर सेना में हड़कंप मच गया मेघनाथ ने मूर्छित लक्ष्मण को उठाने की जी तोड़ कोशिश की लेकिन जो शेषनाग समस्त पृथ्वी को अपने फन पर उठा सकता था उसी शेषनाग के अवतार को भला मेघनाथ कैसे व क्या उठा पाता। लक्ष्मण जी को ना उठा पाने पर मेघनाथ वापस चला गया। श्री राम अपने प्राणों से भी प्यारे भाई को मूर्छित देखकर शोक में डूब गए, उसके बाद विभीषण के कहने पर हनुमान जी लंका में से लंका के राज्य वैद्य को जबरदस्ती उठा लाए। श्री राम के शोक और विभीषण द्वारा सुषेण वैद्य लाने के लिया कहना और हनुमान जी द्वारा सुषेण वैद्य को उठा लाना इसके बाद वैद्य द्वारा लक्ष्मण की जांच करने और उनके प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने की सलाह देने और हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रस्थान किया।

जहां तक सवाल उनके वापस आने का है तो निश्चित ही वह सूर्य उदय होने से पहले वापस आ गए होंगे। लंका से निकलकर पवन पुत्र भारत आए तो रास्ते में उन्हें कालनेमि नामक राक्षस अपना रूप बदले मिला।

कालनेमि निरंतर श्री राम नाम का जप कर रहा था लेकिन वास्तव में उसकी मंशा हनुमान जी का समय खराब करने की थी। हनुमान जी ने जब जंगल से रामनाम का जाप सुना तो जिज्ञासावश नीचे उतर आए कालनेमि ने खुद को बहुत बड़ा ज्ञानी बताया और हनुमान जी से कहा कि पहले आप स्नान करके आओ उसके बाद मैं आपको रावण के साथ चल रहे युद्ध का नतीजा बताऊंगा। भोले हनुमान जी उसकी बातों में आ गए और स्नान करने चले गए | स्नान करते समय उनका सामना एक मगरमच्छ से हुआ जिसे हनुमान जी ने मार डाला।

उस मगर की आत्मा ने हनुमान को उस कपटी कालनेमि की वास्तविकता बताई तो बजरंगबली ने उसे भी अपनी पूंछ में लपेटकर परलोक भेज दिया। लेकिन इन सब में भी हनुमान जी का कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। उसके बाद बजरंगबली ने उड़ान भरी होगी और द्रोणागिरी पर्वत जा पहुंचे लेकिन हनुमान जी कोई वैद्य तो नहीं थे इसीलिए संजीवनी बूटी को पहचान नहीं सके और संजीवनी को खोजने के लिए वह काफी देर तक भटकते रहे होंगे। इसमें भी उनका कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। बूटी को ना पहचान पाने की वजह से हनुमान जी ने पूरा पर्वत ही उठा लिया और वापस लंका की ओर जाने लगे। लेकिन हनुमान जी के लिए एक और मुसीबत आ गई।
हुआ यह की जब पवन पुत्र पर्वत लिए अयोध्या के ऊपर से उड़ रहे थे तो श्री राम के भाई भरत ने सोचा कि यह कोई राक्षस अयोध्या के ऊपर से जा रहा है और उन्होंने बिना सोचे समझे महावीर बजरंगबली पर बाण चला दिया। बाण लगते ही वीर हनुमान श्री राम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमान जी के मुंह से श्री राम का नाम सुनते ही भरत दंग रह गए और उन्होंने हनुमानजी से उनका परिचय पूछा तो उन्होंने (हनुमान जी) ने उन्हें राम रावण युद्ध के बारे में बताया। लक्ष्मण के मूर्छित होने का पूरा किस्सा सुनाया तब सुनकर वह भी रोने लग गए और उनसे माफी मांगी| फिर हनुमानजी का उपचार किया गया और हनुमान जी वापस लंका की ओर ओर चलें और सूर्य उदय पहले वहां थे।

*जय सनातन धर्म* 🚩🙏🙏

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