Sanatan - The Eternal & Universal Truth

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10/12/2025

#सनातन
प्रत्येक समय का अपना धर्म होता है।

उदाहरण:
वर्षा ऋतु का धर्म → संग्रह, उपचार, स्थिरता
हेमंत ऋतु का धर्म → बल वृद्धि
शिशिर ऋतु → धैर्य, मौन
वसंत → सृजन, नवोदित ऊर्जा
ग्रीष्म → विचार, योजना

अर्थ:
हर समय में क्या करना उचित है → यही समय का धर्म है।
यदि व्यक्ति समय के धर्म को समझे →
वह समय की लहरों के विपरीत संघर्ष नहीं करेगा।
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13/11/2025

रामनाम्नः परं नास्ति मोक्ष लक्ष्मी प्रदायकम्।
तेजोरुपं यद् अवयक्तं रामनाम अभिधियते।
।तस्मात्तमाम जप्त्वा वै रामरूपो भवेन्नरः ।
एतदेव हि रामेण मारुतिं प्रति भाषितम् ॥

Shri Krishna says :- There is no such mantra that is even equal to Ram naam which can give both wealth and moksh. This is self illuminated (तेजोरुप) and avytakt. That’s the reason why The one who who recites the Name of Rama, Becomes Rama swaroop, as Told by Rama to Hanumana.

(Anand Ramayan Manohar khand sarg 7 shlok 16-17)

श्री कृष्ण कहते हैं - कि राम नाम के समान पावन और शक्तिशाली दूसरा कोई मंत्र नहीं जो धन तथा मोक्ष दोनों प्रदान करने में सक्षम हो। यह मंत्र स्वयं प्रकाशित तेजोरूप करने वाला है और अव्यक्त हैं। जिसका सार स्वयं श्री राम भी व्यक्त नहीं कर सकते। जो भी इस मंत्र का जाप करता हैं वो स्वयं राममय हो जाता हैं ऐसा स्वयं श्री राम ने हनुमान जी को बताया हैं।

(आनंद रामायण मनोहर कांड श्लोक 16- 17 का सर्ग 7)

13/11/2025
*🌺सुपात्र को ही दान करें🌺 शिक्षाप्रद पौराणिक कथा*यह महाभारत काल की पौराणिक कहानी है। युद्ध समाप्त हो गया था। महाराज युधि...
29/10/2025

*🌺सुपात्र को ही दान करें🌺 शिक्षाप्रद पौराणिक कथा*

यह महाभारत काल की पौराणिक कहानी है। युद्ध समाप्त हो गया था। महाराज युधिष्ठिर ने दो अश्वमेघ यज्ञ किये। उन यज्ञों के बाद उन्होने इतना दान किया कि उनकी ख्याती चारो दिशाओं मे फैल गयी। तीसरे यज्ञ के पूर्ण होने पर यज्ञशाला में एक अजीब सा नेवला आ गया जिसका कि आधा शरीर सुनहरा था।

यज्ञभूमि में पहुँच कर नेवला यहाँ-वहाँ लोट-पोट होने लगा। कुछ देर वहाँ इस प्रकार लोट-पोट होने के बाद वह बड़े कर्कश आवाज़ में बोल पड़ा- ‘पाण्डवों! तुम्हारे यज्ञ का पुण्यफल तो कुरुक्षेत्र के एक ब्राह्मण के थोड़े से सत्तू के दान के समान भी नहीं है।’

लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। सब एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। एक स्वर में पूछा गया कि तुम कौन हो, कहाँ से आये हो? यज्ञ के अतुलनीय दान की तुलना किसी सामान्य ब्राह्मण के थोड़े से सत्तु के साथ क्यों कर रहे हो ?’

नेवले ने कहा-‘यदि आपको विश्वास न हो तो मैं उस महादानी ब्राह्मण की कथा सुनाता हूँ। आप खुद ही फैसला कर लीजिए।

कुरुक्षेत्र के एक गाँव में धर्मात्मा ब्राह्मण रहते थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधु थी। वे पूजा-पाठ और कथा करते थे और उसी से अपनी तथा परिवार की जीविका चलाते थे।

एक बार उस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड गया। ब्राह्मण के पास जमा किया हुआ अन्न तो था नहीं और उन्हें कहीं से कुछ प्राप्त भी नहीं हो रहा था। कई दिनों भूखे रहने के बाद उन्होंने बड़े परिश्रम से खेतों में गिरे जौ के दानों को एकत्रित किया और उसका सत्तू बना लिया।

बनाये गए सत्तू के चार भाग करके परिवार के सभी सदस्यों में बराबर बाँट दिया गया। पूरा परिवार भोजन करने के लिए बैठा ही था कि कहीं से एक भूखा व्यक्ति उनके द्वार पर भोजन की याचना करते हुए आ गया।

ब्राह्मण भोजन छोड़ कर उठ खड़े हुए। उन्होंने बड़े आदर के साथ आतिथि को प्रणाम किया और अपनी कुटी में ले आये। आदर-सत्कार के बाद ब्राह्मण ने अपने भाग का सत्तू नम्रतापूर्वक उन्हें परोसा।

अतिथि ने सत्तू खा लिया, किन्तु उस थोड़े से सत्तू से उसका पेट नहीं भरा। ब्राह्मण चिन्तित हो गये कि अतिथि तो भूखे रह जायेंगे। ब्राह्मण की पत्नी ने पति के भाव जानकर अपने भाग का सत्तू अतिथि को प्रदान कर दिया। लेकिन उस सत्तू को खाकर भी अतिथि तृप्त नहीं हुए। बाद में ब्राह्मण के पुत्र- पुत्रवधू ने भी अपने भाग का सत्तू आग्रह करके अतिथि को प्रदान किया।

उन ब्राह्मण परिवार द्वारा आदर-सत्कार देख कर अतिथि बहुत प्रसन्न हुए। वे उनकी उदारता तथा अतिथ्य की प्रशंसा करते हुए बोले-‘ब्राह्मण! आप धन्य हैं। राधा सखी आपका सदैव कल्याण हो।’

नेवले ने आगे कहा-‘अतिथि के जाने के बाद मैं बिल से निकला और ब्राह्मण के बर्तन धोने के स्थान पर लोटने लगा। सत्तू के कुछ कण भी वहीं पड़े थे। उन कणों के लगने से मेरा आधा शरीर सुनहरा हो गया। उसी समय से शेष आधा शरीर भी एक समान बनाने के लिए मैं तपोवनों, यज्ञस्थलों में घूमता रहता हूँ, किंतु कहीं भी मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई। आपकी यज्ञभूमि से भी कोई परिणाम हासिल नही हुआ।’

उसने आगे कहा-युधिष्ठिर तुम्हारे यज्ञ असंख्य लोगों ने भोजन किया और उस गरीब ब्राह्मण परिवार ने केवल एक ही भूखे को भोजन दिया था लेकिन उसमे त्याग था। भूखे को भोजन की आवश्यकता थी। परिवार ने खुद भूखे रहकर अपने से अधिक जरूरतमंद समझ कर उस गरीब को भोजन दिया था। अतः युधष्ठिर! दान की महत्ता तो एक सुपात्र को देने से है।

इतना कहकर वह नेवला वहाँ से किसी सच्चे दानी की खोज में आगे बढ़ गया।

अब हम इस शिक्षाप्रद पौराणिक कथा को वर्तमान सन्दर्भ में लेते हैं। लोग दान का सार्वजनिक प्रर्दशन करते हैं। धार्मिक पूजा स्थलों में दान का अम्बार लग जाता है। आजकल विभिन्न उत्सवों और कार्यक्रमों में बड़े-बड़े भंडारें करने का चलन है जिसमें आडम्बर कीअधिक मात्रा होती है, मूल उद्देश्य कहीं खो सा जाता है। कभी एक भी सुपात्र तक वह दान पहुंच पता होगा इसमें सन्देह है। इस तरह के भाण्डारों के स्थान पर यदि उस धन को सरकारी अस्पतालों के बाहर रात्री गुजारते रोगी के शुभचिन्तकों को सहायतार्थ दिया जाए अथवा रात के अंधेरे में फुटपाथों के किनारे रात गुजर करने वाले तथा ठण्ड से सिकुड़ते लोगों को कुछ कपड़े-लत्ते तथा भोजन प्रदान किया जाए तो इस महादान से ईश्वर अति कृपा बनेगी तथा दानी के मन को भी असीम आनन्द प्राप्त होगा क्योंकि सुपात्र को दिया गया दान ही वास्तविक दान है......

*🙏🏻🌺जय श्री कृष्णा🌺🙏🏻*
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*एक बार अवश्य पढे शायद????*एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था। एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लि...
29/10/2025

*एक बार अवश्य पढे शायद????*

एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था। एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लिया,उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगे।

काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है. सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इस लिए मैं मजबूर हूं. पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा ही. मुझ से क्या आशा रखते हो साफ-साफ कहो।

व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं।

काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा. चिंता मत करो. चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो।

मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे।

दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची. काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र अब समय पूरा हुआ. मेरे साथ चलिए. मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा।

मनुष्य के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर. मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती?

तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूंगा. मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए. मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया।

काल हंसा और बोला- मित्र इतना झूठ तो न बोलो. मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो. मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे. आपने एक भी उत्तर नहीं दिया।

मनुष्य ने चौंककर पूछा – कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ।

काल ने कहा – मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं।

मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बालों को पकड़ कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो।

नाम, बड़ाई और धन-संग्रह के झंझटो को छोड़कर भजन में लग जाओ पर मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ।

बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए. आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं।

कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा. नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी।

फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे. दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया।

इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा।

इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया।

आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे।

मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बात एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है।

अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया।

जब मनुष्य ने काल के भेजे हुए पत्रों को समझा तो फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा. उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा।

मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा. अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल नहीं आया।

काल ने कहा – आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए किया. जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर जो काम करता है, वह अक्षम्य है।

मनुष्य को जब अपनी बातों से काम बनता नज़र नहीं आया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया।

काल ने हंसकर कहा- मित्र यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है. धन-दौलत, शोहरत, सत्ता, ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है, मुझे नहीं।

मनुष्य ने पूछा- क्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हें भी प्रिय हो, जिससे तुम्हें लुभाया जा सके. ऐसा कैसे हो सकता है!

काल ने उत्तर दिया- यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते. यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था. अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था. पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है।

तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद, तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा. मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निवस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है।

काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा।

सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर।

काल ने कितनी बड़ी बात कही. एक ही सत्य है जो अटल है वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर. हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है, समय के गर्भ में छुपा होता है।

परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है. ध्रुव सत्य है मृ्त्यु. काल कभी भी दस्तक दे सकता है. प्रतिदिन उसकी तैयारी करनी होगी।

समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए और अभी तो कलयुग का अन्तिम समय है इस में तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु की याद में रहकर ही कर्म करने हैं।

29/10/2025

आरती की महिमा
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आरती को आरात्रिक , आरार्तिक अथवा नीराजन भी कहते हैं। पूजा के अंत में आरती की जाती है। जो त्रुटि पूजन में रह जाती है वह आरती में पूरी हो जाती है।

स्कन्द पुराण में कहा गया है-
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् कृतं पूजनं हरे:।
सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते निराजने शिवे ।।

अर्थात - पूजन मंत्रहीन तथा क्रियाहीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमे सारी पूर्णता आ जाती है।

आरती करने का ही नहीं, देखने का भी बड़ा पूण्य फल प्राप्त होता है। हरि भक्ति विलास में एक श्लोक है-

नीराजनं च यः पश्येद् देवदेवस्य चक्रिण:।सप्तजन्मनि विप्र: स्यादन्ते च परमं पदम।।

अर्थात - जो भी देवदेव चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान की आरती देखता है, वह सातों जन्म में ब्राह्मण होकर अंत में परम् पद को प्राप्त होता है।

श्री विष्णु धर्मोत्तर में कहा गया है-

धूपं चरात्रिकं पश्येत काराभ्यां च प्रवन्देत।
कुलकोटीं समुद्धृत्य याति विष्णो: परं पदम्।।

अर्थात - जो धुप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है और भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।

आरती में पहले मूल मंत्र (जिस देवता का, जिस मंत्र से पूजन किया गया हो, उस मंत्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगाड़े, शख्ङ, घड़ियाल आदि महावाद्यो के तथा जय-जयकार के शब्दों के साथ शुभ पात्र में घृत से या कर्पूर से विषम संख्या में अनेक बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिए-

ततश्च मुलमन्त्रेण दत्त्वा पुष्पाञ्जलित्रयम्।
महानिराजनं कुर्यान्महावाद्यजयस्वनैः।।
प्रज्वलेत् तदर्थं च कर्पूरेण घृतेन वा।
आरार्तिकं शुभे पात्रे विषमानेकवर्दिकम्।।

अर्थात - साधारणतः पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे 'पञ्चप्रदीप' भी कहते है। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कर्पूर से भी आरती होती है।

पद्मपुराण में कहा है-

कुङ्कुमागुरुकर्पुरघृतचंदननिर्मिता:।
वर्तिका: सप्त वा पञ्च कृत्वा वा दीपवर्तिकाम्।।
कुर्यात् सप्तप्रदीपेन शङ्खघण्टादिवाद्यकै:।

अर्थात - कुङ्कुम, अगर, कर्पूर, घृत और चंदन की पाँच या सात बत्तियां बनाकर शङ्ख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुवे आरती करनी चाहिए।

आरती के पाँच अंग होते है:

पञ्च नीराजनं कुर्यात प्रथमं दीपमालया।
द्वितीयं सोदकाब्जेन तृतीयं धौतवाससा।।
चूताश्वत्थादिपत्रैश्च चतुर्थं परिकीर्तितम्।
पञ्चमं प्रणिपातेन साष्टाङ्गेन यथाविधि।।

अर्थात - प्रथम दीपमाला के द्वारा, दूसरे जलयुक्त शङ्ख से, तीसरे धुले हुए वस्त्र से, आम व् पीपल अदि के पत्तों से और पाँचवे साष्टांग दण्डवत से आरती करें।

आदौ चतुः पादतले च विष्णो द्वौं नाभिदेशे मुखबिम्ब एकम्।
सर्वेषु चाङ्गेषु च सप्तवारा नारात्रिकं भक्तजनस्तु कुर्यात्।।

अर्थात - आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाए, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंङ्गो पर घुमाए।

यथार्थ में आरती पूजन के अंत में इष्टदेवता की प्रसन्नता के हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। आरती के दो भाव है जो क्रमशः 'नीराजन' और 'आरती' शब्द से व्यक्त हुए है। नीराजन (निःशेषण राजनम् प्रकाशनम्) का अर्थ है- विशेषरूप से, निःशेषरूप से प्रकाशित करना। अनेक दिप-बत्तियां जलाकर विग्रह के चारों ओर घुमाने का यही अभिप्राय है कि पूरा-का-पूरा विग्रह एड़ी से चोटी तक प्रकाशित हो उठे- चमक उठे, अंङ्ग-प्रत्यङ्ग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाये, जिसमें दर्शक या उपासक भलिभांति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंगम कर सके। दूसरा 'आरती' शब्द (जो संस्कृत के आर्ति का प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है अरिष्ट) विशेषतः माधुर्य-उपासना से सम्बंधित है।

आरती-वारना का अर्थ है आर्ति-निवारण, अनिष्ट से अपने प्रियतम प्रभु को बचाना। इस रूप में यह एक तांत्रिक क्रिया है, जिसमे प्रज्वलित दीपक अपने इष्टदेव के चारों ओर घुमाकर उनकी सारी विघ्न बधाये टाली जाती है। आरती लेने से भी यही तात्पर्य है कि उनकी आर्ति (कष्ट) को अपने ऊपर लेना। बलैया लेना, बलिहारी जाना, बली जाना, वारी जाना न्यौछावर होना आदि प्रयोग इसी भाव के द्योतक है। इसी रूप में छोटे बच्चों की माताए तथा बहिने लोक में भी आरती उतारती है। यह आरती मूल रूप में कुछ मंत्रोच्चारण के साथ केवल कष्ट-निवारण के लिए उसी भाव से उतारी जाती रही है।
आज कल वैदिक उपासना में उसके साथ-साथ वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी होता है तथा पौराणिक एवं तांत्रिक उपासना में उसके साथ सुंदर-सुंदर भावपूर्ण पद्य रचनाएँ भी गायी जाती है। ऋतू, पर्व पूजा के समय आदि भेदों से भी आरती गायी जाती है।
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29/10/2025

*होनी बहुत बलवान है*

अभिमन्यु के पुत्र ,राजा परीक्षित थे |

राजा परीक्षित के बाद उन के लड़के जनमेजय राजा बने |

एक दिन जनमेजय वेदव्यास जी के पास बैठे थे | बातों ही बातों में जन्मेजय ने कुछ नाराजगी से वेदव्यास जी से कहा.. कि, *"जहां आप समर्थ थे, भगवान श्रीकृष्ण थे, भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य कुलगुरू कृपाचार्य जी, धर्मराज युधिष्ठिर, जैसे महान लोग उपस्थित थे.. फिर भी आप महाभारत के युद्ध को होने से नहीं रोक पाए और देखते-देखते अपार जन-धन की हानि हो गई | यदि मैं उस समय रहा होता तो, अपने पुरुषार्थ से इस विनाश को होने से बचा लेता" |*

अहंकार से भरे जन्मेजय के शब्द सुन कर भी, व्यास जी शांत रहे |

उन्होंने कहा, *"पुत्र अपने पूर्वजों की क्षमता पर शंका न करो | यह विधि द्वारा निश्चित था, जो बदला नहीं जा सकता था, यदि ऐसा हो सकता तो श्रीकृष्ण में ही इतनी सामर्थ्य थी कि वे युद्ध को रोक सकते थे |*

जन्मेजय अपनी बात पर अड़ा रहा और बोला, *"मैं इस सिद्धांत को नहीं मानता | आप तो भविष्यवक्ता है, मेरे जीवन की होने वाली किसी होनी को बताइए.. मैं उसे रोककर प्रमाणित कर दूंगा कि विधि का विधान निश्चित नहीं होता" |*

व्यास जी ने कहा, *"पुत्र यदि तू यही चाहता है तो सुन...." |*

*कुछ वर्ष बाद तू काले घोड़े पर बैठकर शिकार करने जाएगा दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर पहुंचेगा...वहां तुम्हें एक सुंदर स्त्री मिलेगी.. जिसे तू महलों में लाएगा, और उससे विवाह करेगा | मैं तुम को मना करूँगा कि ये सब मत करना लेकिन फिर भी तुम यह सब करोगे | इस के बाद उस लड़की के कहने पर तू एक यज्ञ करेगा | मैं तुम को आज ही चेता कर रहा हूं कि उस यज्ञ को तुम वृद्ध ब्राह्मणो से कराना.. लेकिन, वह यज्ञ तुम युवा ब्राह्मणो से कराओगे.... और..*

जनमेजय ने हंसते हुए व्यासजी की बात काटते हुए कहा कि, *"मै आज के बाद काले घोड़े पर ही नही बैठूंगा..तो ये सब घटनाऐ घटित ही नही होगी |*

व्यासजी ने कहा कि, "ये सब होगा..और अभी आगे की सुन...,"उस यज्ञ मे एक ऐसी घटना घटित होगी....कि तुम ,उस रानी के कहने पर उन युवा ब्राह्मणों को प्राण दंड दोगे, जिससे तुझे ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा...और..तुझे कुष्ठ रोग होगा.. और वही तेरी मृत्यु का कारण बनेगा | इस घटनाक्रम को रोक सको तो रोक लो" |

वेदव्यास जी की बात सुनकर जन्मेजय ने एहतियात वश शिकार पर जाना ही छोड़ दिया | परंतु जब होनी का समय आया तो उसे शिकार पर जाने की बलवती इच्छा हुई | उस ने सोचा कि काला घोड़ा नहीं लूंगा.. पर उस दिन उसे अस्तबल में काला घोड़ा ही मिला | तब उस ने सोचा कि..मैं दक्षिण दिशा में नहीं जाऊंगा परंतु घोड़ा अनियंत्रित होकर दक्षिण दिशा की ओर गया और समुद्र तट पर पहुंचा वहां पर उसने एक सुंदर स्त्री को देखा, और उस पर मोहित हुआ | जन्मेजय ने सोचा कि इसे लेकर महल मे तो जाउंगा....लेकिन शादी नहीं करूंगा |

परंतु, उसे महलों में लाने के बाद, उसके प्यार में पड़कर उस से विवाह भी कर लिया | फिर रानी के कहने से जन्मेजय द्वारा यज्ञ भी किया गया | उस यज्ञ में युवा ब्राह्मण ही, रक्खे गए |

किसी बात पर युवा ब्राह्मण...रानी पर हंसने लगे | रानी क्रोधित हो गई ,और रानी के कहने पर राजा जन्मेजय ने उन्हें प्राण दंड की सजा दे दी.., फलस्वरुप उसे कोढ हो गया |

*अब जन्मेजय घबरा गया.और तुरंत व्यास जी के पास पहुंचा...और उनसे जीवन बचाने के लिए प्रार्थना करने लगा |*

वेदव्यास जी ने कहा कि, "एक अंतिम अवसर तेरे प्राण बचाने का और देता हूं......., मैं तुझे महाभारत में हुई घटना का श्रवण कराऊंगा जिसे तुझे श्रद्धा एवं विश्वास के साथ सुनना है..., इससे तेरा कोढ् मिटता जाएगा |

परंतु यदि किसी भी प्रसंग पर तूने अविश्वास किया.., तो मैं महाभारत का प्रसंग रोक दूंगा..,और फिर मैं भी तेरा जीवन नहीं बचा पाऊंगा...,याद रखना अब तेरे पास यह अंतिम अवसर है |

अब तक जन्मेजय को व्यासजी की बातों पर पूरा विश्वास हो चुका था, इसलिए वह पूरी श्रद्धा और विश्वास से कथा श्रवण करने लगा |

व्यासजी ने कथा आरम्भ करी और जब भीम के बल के वे प्रसंग सुनाऐ ....,जिसमें भीम ने हाथियों को सूंडों से पकड़कर उन्हें अंतरिक्ष में उछाला...,वे हाथी आज भी अंतरिक्ष में घूम रहे हैं....,तब जन्मेजय अपने आप को रोक नहीं पाया,और बोल उठा कि ये कैसे संभव हो सकता है | मैं नहीं मानता |

व्यास जी ने महाभारत का प्रसंग रोक दिया....और कहा..कि,"पुत्र मैंने तुझे कितना समझाया...कि अविश्वास मत करना...परंतु तुम अपने स्वभाव को नियंत्रित नहीं कर पाए | क्योंकि यह होनी द्वारा निश्चित था" |

फिर व्यास जी ने अपनी मंत्र शक्ति से आवाहन किया..और वे हाथी पृथ्वी की आकर्षण शक्ति में आकर नीचे गिरने लगे.....तब व्यास जी ने कहा, यह मेरी बात का प्रमाण है" |

जितनी मात्रा में जन्मेजय ने श्रद्धा विश्वास से कथा श्रवण की,

उतनी मात्रा में वह उस कुष्ठ रोग से मुक्त हुआ परंतु एक बिंदु रह गया और वही उसकी मृत्यु का कारण बना |

*सार :-*

पहले बनती है तकदीरे फिर बनते हैं शरीर | कर्म हमारे हाथ मे है...लेकिन उस का फल हमारे हाथों में नहीं है |

गीता के 11 वें अध्याय के 33 वे श्लोक मैं श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "उठ खड़ा हो और अपने कार्य द्वारा यश प्राप्त कर | यह सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं तू तो केवल निमित्त बना है |

होनी को टाला नहीं जा सकता लेकिन नेक कर्म व ईश्वर नाम जाप से होनी के प्रभाव को कम किया जा सकता है अर्थार्थ रोग आएंगे परंतु पीड़ा नहीं होगी |

*अगर आपको भागवत गीता का यह प्रसंग अच्छा लगा हो तो आप दो और लोगों को जरूर शेयर करें।*

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