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14/08/2026

देहावसान
प्रो. डॉ. लोपा मेहता, मुंबई के जी.एस. मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर थीं, और उन्होंने वहाँ एनाटॉमी विभाग की प्रमुख के रूप में कार्य किया।
७८ वर्ष की उम्र में उन्होंने लिविंग विल (Living Will) बनाई। उसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा —
जब शरीर साथ देना बंद कर देगा, और सुधार की कोई संभावना नहीं रहेगी, तब मुझ पर इलाज न किया जाए।
ना वेंटिलेटर, ना ट्यूब, ना अस्पताल की व्यर्थ भागदौड़।
मेरे अंतिम समय में शांति हो — जहाँ इलाज के ज़ोर से ज़्यादा समझदारी को प्राथमिकता दी जाए।

डॉ. लोपा ने सिर्फ यह दस्तावेज़ ही नहीं लिखा, बल्कि मृत्यु पर एक शोध-पत्र भी प्रकाशित किया। उसमें उन्होंने मृत्यु को एक प्राकृतिक, निश्चित और जैविक प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट किया।
उनका तर्क था कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मृत्यु को कभी एक स्वतंत्र अवधारणा के रूप में देखा ही नहीं। चिकित्सा का आग्रह यह रहा कि मृत्यु हमेशा किसी रोग के कारण ही होती है, और यदि रोग का इलाज हो जाए, तो मृत्यु को टाला जा सकता है।
लेकिन शरीर का विज्ञान इससे कहीं गहरा है।

उनका तर्क है — शरीर कोई हमेशा चलने वाली मशीन नहीं है। यह एक सीमित प्रणाली है, जिसमें एक निश्चित जीवन-ऊर्जा होती है। यह ऊर्जा किसी टंकी से नहीं आती, बल्कि सूक्ष्म शरीर के माध्यम से आती है।
वही सूक्ष्म शरीर, जिसे हर कोई महसूस करता है, पर देख नहीं सकता। मन, बुद्धि, स्मृति और चेतना — इन सबका सम्मिलन ही यह प्रणाली बनाता है।

यह सूक्ष्म शरीर जीवन-ऊर्जा का प्रवेशद्वार है। यह ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है और शरीर को जीवित रखती है। हृदय की धड़कन, पाचन क्रिया, सोचने की क्षमता — ये सब उसी के आधार पर चलते हैं।
पर यह ऊर्जा असीमित नहीं है। हर शरीर में इसका एक निश्चित स्तर होता है। जैसे किसी यंत्र में लगी हुई फिक्स्ड बैटरी — न बढ़ाई जा सकती है, न घटाई जा सकती है।
"जितनी चाबी भरी राम ने, उतना चले खिलौना" — कुछ वैसा ही।

डॉ. लोपा लिखती हैं, कि जब शरीर की यह ऊर्जा समाप्त हो जाती है, तब सूक्ष्म शरीर देह से अलग हो जाता है। वही क्षण होता है जब शरीर स्थिर हो जाता है, और हम कहते हैं, "प्राण चले गए"।
यह प्रक्रिया न किसी रोग से जुड़ी होती है, न किसी गलती से। यह शरीर की आंतरिक लय है — जो गर्भ में शुरू होती है, और पूरी होकर मृत्यु तक पहुँचती है।
इस ऊर्जा का खर्च हर पल होता है — हर कोशिका, हर अंग अपना जीवनकाल पूरा करता है। और जब पूरे शरीर का "कोटा" समाप्त हो जाता है, तब शरीर शांत हो जाता है।

मृत्यु का क्षण घड़ी से नहीं मापा जा सकता। वह एक जैविक समय होता है — जो हर किसी के लिए अलग होता है।
किसी का जीवन ३५ साल में पूरा होता है, तो किसी का ९० साल में। पर दोनों ही अपनी संपूर्ण यात्रा करते हैं।
अगर हम उसे पराजय या ज़बरदस्ती न मानें, तो कोई भी अधूरा नहीं मरता।

डॉ. लोपा के अनुसार, जब आधुनिक चिकित्सा मृत्यु को टालने का हठ करती है, तब न सिर्फ मरीज़ का शरीर थकता है, बल्कि पूरा परिवार टूट जाता है।
ICU में महीने भर की साँसों की कीमत कभी-कभी जीवन भर की जमा-पूँजी को खत्म कर देती है।
रिश्तेदार कहते रहते हैं — "अभी आशा है", पर मरीज़ का शरीर पहले ही कह चुका होता है — "अब बस"।

इसलिए वे लिखती हैं — "जब मेरी बारी आए, तो बस मुझे KEM अस्पताल ले जाइए। जहाँ मुझे यक़ीन है कि अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होगा। इलाज के नाम पर कोई दीर्घकालिक कष्ट नहीं दिया जाएगा। मेरे शरीर को रोका नहीं जाएगा — उसे जाने दीजिए।"

पर सवाल यह है — क्या हमने अपने लिए ऐसा कुछ तय किया है?
क्या हमारा परिवार उस इच्छा का सम्मान करेगा? और जो करेंगे, क्या उन्हें समाज में सम्मान मिलेगा?
क्या हमारे अस्पतालों में ऐसी इच्छाओं का सम्मान होता है, या अब भी हर साँस पर बिल बनेगा और हर मृत्यु पर दोष?

यह इतना आसान नहीं है। तर्क और भावना का संतुलन साधना शायद सबसे कठिन कार्य है।
अगर हम मृत्यु को शांत, नियत और शरीर की आंतरिक गति से आई प्रक्रिया मानना सीख जाएँ, तो शायद मृत्यु का भय कम होगा, और डॉक्टरों से हमारी अपेक्षाएँ अधिक यथार्थवादी होंगी।

मेरे अनुसार, मृत्यु से लड़ना बंद करना चाहिए और उससे पहले जीवन के लिए तैयारी करनी चाहिए।
और जब वह क्षण आए — तो शांति से, सम्मान के साथ उसका सामना करना चाहिए।
*मृत्यु जीवन की यात्रा का अगला चरण है*

 # # # *"माता-पिता प्रत्यक्ष देवता स्वरूप हैं"*  *शास्त्र सम्मत प्रमाण + उदाहरण सहित*सनातन धर्म में ईश्वर की पूजा से पहल...
10/08/2026

# # # *"माता-पिता प्रत्यक्ष देवता स्वरूप हैं"*
*शास्त्र सम्मत प्रमाण + उदाहरण सहित*

सनातन धर्म में ईश्वर की पूजा से पहले माता-पिता की पूजा का विधान है। क्योंकि जो प्रत्यक्ष दे, वही देवता है।

# # # *भाग 1: शास्त्रों में प्रमाण*

# # # # *1. तैत्तिरीय उपनिषद - शिक्षा वल्ली 1.11.2*
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।
*अर्थ*: माता को देवता मानो। पिता को देवता मानो। गुरु को देवता मानो।
यहां वेद ने सीधे आदेश दिया है। मंदिर जाने से पहले घर के देवता पूजो।

# # # # *2. मनुस्मृति 2.227*
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥
*अर्थ*: जो नित्य माता-पिता, बड़ों की सेवा करता है उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं।

# # # # *3. महाभारत, अनुशासन पर्व 114.10*
पितरौ पूजयेद् यस्तु स याति परमां गतिम्
*अर्थ*: जो माता-पिता की पूजा करता है वह परम गति को प्राप्त करता है।

# # # # *4. शिव पुराण, उमा संहिता 10.24*
मातरं पितरं चैव साक्षाद् दैवतमीश्वरम्
*अर्थ*: माता और पिता साक्षात देवता और ईश्वर के समान हैं।

# # # *भाग 2: पुराणों के उदाहरण*

# # # # *उदाहरण 1: श्रवण कुमार - आदर्श पुत्र*
*स्रोत: रामायण*
बूढ़े माता-पिता अंधे थे। श्रवण उन्हें कावड़ में बिठाकर चारों धाम ले गया। जंगल में प्यास से तड़पते माता-पिता के लिए पानी लाने गया तो गलती से तीर लग गया। मरते समय भी उसने कहा "पहले मेरे माता-पिता को पानी पिला देना"।
*शिक्षा*: माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

# # # # *उदाहरण 2: गणेश जी को प्रथम पूज्य का वरदान*
*स्रोत: शिव पुराण*
एक बार शिव-पार्वती ने कहा जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही प्रथम पूज्य होगा।
कार्तिकेय निकल गए। गणेश जी ने माता-पिता के 7 बार चक्कर लगाए और कहा "मेरे लिए आप ही पूरी सृष्टि हो"।
शिव जी प्रसन्न हुए और गणेश को "प्रथम पूज्य" का वरदान दिया।
*शिक्षा*: माता-पिता की परिक्रमा = पूरी पृथ्वी की परिक्रमा।

# # # # *उदाहरण 3: राजा जनक और अष्टावक्र*
*स्रोत: अष्टावक्र गीता*
बालक अष्टावक्र टेढ़े थे। पिता ने मजाक उड़ाया तो उन्होंने कहा "शरीर टेढ़ा है, ज्ञान नहीं"। पिता को ज्ञान देकर मुक्त किया।
*शिक्षा*: संतान का कर्तव्य है माता-पिता को भी ज्ञान और सम्मान देना।

# # # # *उदाहरण 4: भीष्म पितामह*
*स्रोत: महाभारत*
पिता शांतनु के सुख के लिए भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य और राज्य त्याग की भीष्म प्रतिज्ञा ली।
*शिक्षा*: पिता की प्रसन्नता के लिए अपना सर्वस्व त्याग देना।

# # # *भाग 3: क्यों "प्रत्यक्ष भगवान" हैं?*
मंदिर का भगवान माता-पिता
अप्रत्यक्ष प्रत्यक्ष - सामने हैं
मांगने पर देते हैं बिना मांगे दे देते हैं
गलती पर दंड गलती पर भी माफ
एक समय में एक जगह 24 घंटे सेवा में लगे
*गरुड़ पुराण*: "जिस घर में माता-पिता भूखे, वहां किया हुआ दान-पूजा सब व्यर्थ है।"

# # *निष्कर्ष*

*महाभारत का सार वाक्य:*
मातृमान् पितृमान् यश्च स कुलीनः स पण्डितः
अर्थ: जिसके पास माता-पिता हैं, वही कुलीन है, वही ज्ञानी है।

> `तीर्थ कर लो, व्रत कर लो, दान कर लो`
> `पर अगर माता-पिता दुखी हैं, तो सब शून्य है।`

इसलिए शास्त्र कहते हैं - *"माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा यज्ञ है"*

05/08/2026

घर परिवार

"जिस दिन बेटे ने 1.8 करोड़ की नौकरी ठुकराई... उसी दिन पिता पहली बार उसके सामने रो पड़े"

मेरा नाम आर्यन है।
उम्र 29 साल।

आज मैं प्रयागराज में अपने पिता के साथ एक छोटी-सी पुस्तक दुकान चलाता हूँ। दुकान के ऊपर एक कमरा है, जहाँ शाम को मैं गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता हूँ।

जब कोई मेरी दुकान पर लगी मेरी आईआईटी की डिग्री देखता है तो एक ही सवाल पूछता है—

"इतनी बड़ी पढ़ाई करके... किताबें बेच रहे हो?"

मैं सिर्फ मुस्कुरा देता हूँ।

क्योंकि उन्हें नहीं पता...

कि पाँच साल पहले मेरे पास लंदन की एक बड़ी टेक कंपनी का ऑफर था, जिसकी सालाना सैलरी भारतीय पैसों में लगभग 1 करोड़ 80 लाख रुपये थी।

ऑफर लेटर आज भी मेरे पास है...

लेकिन उस पर मेरे हस्ताक्षर कभी नहीं हुए।

---

मेरी कहानी 2003 की है।

प्रयागराज के कटरा इलाके में हमारे पिता शिवनारायण जी की एक छोटी-सी पुरानी किताबों की दुकान थी।

दुकान इतनी छोटी कि एक समय में तीन ग्राहक भी आ जाएँ तो चौथा बाहर खड़ा रहता था।

मेरी माँ सावित्री जी घर में पापड़ और अचार बनाकर बेचती थीं।

हम दो भाई-बहन थे।

मैं और मेरी छोटी बहन राधिका।

घर में पैसे कम थे...

लेकिन किताबों की कमी कभी नहीं थी।

पिताजी कहते थे—

"बेटा, पैसा खत्म हो जाए तो फिर कमाया जा सकता है... लेकिन सीखने की आदत खत्म हो जाए, तो आदमी अंदर से गरीब हो जाता है।"

---

मैंने पढ़ाई को ही अपना रास्ता बना लिया।

दसवीं में जिले में पहला स्थान।

बारहवीं में 97.8 प्रतिशत।

फिर आईआईटी दिल्ली।

जिस दिन मेरा चयन हुआ...

पिताजी ने दुकान दो घंटे पहले बंद कर दी।

उन्होंने पहली बार अपने लिए नया कुर्ता खरीदा।

माँ ने पूरे मोहल्ले में लड्डू बाँटे।

और राधिका पूरे मोहल्ले में यही कहती फिर रही थी—

"मेरा भैया इंजीनियर बन गया!"

---

कॉलेज में मेरी दुनिया बदल गई।

दिन-रात पढ़ाई।

प्रोजेक्ट।

हैकाथॉन।

इंटरनशिप।

फाइनल ईयर में लंदन की कंपनी का इंटरव्यू हुआ।

सात राउंड।

आखिरी कॉल में उन्होंने कहा—

"आर्यन... वेलकम टू द टीम।"

मैं खुशी से रो पड़ा।

घर फोन किया।

पिताजी बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।

फिर धीरे से कहा—

"अब मेरी दुकान भी तेरे बिना चल जाएगी बेटा..."

---

जॉइनिंग में सिर्फ डेढ़ महीना बाकी था।

पासपोर्ट बन चुका था।

वीजा भी आ गया था।

तभी एक सुबह दुकान से फोन आया।

राधिका रो रही थी।

"भैया... जल्दी आओ..."

मैं भागकर घर पहुँचा।

दुकान बंद थी।

पिताजी अस्पताल में थे।

दिल का दौरा पड़ा था।

डॉक्टर ने कहा—

"हार्ट की तीन नसें ब्लॉक हैं। ऑपरेशन करना होगा।"

मैंने बिना सोचे अपने सारे पैसे जमा कर दिए।

ऑपरेशन सफल हुआ।

लेकिन डॉक्टर ने साफ कहा—

"अब इन्हें अकेला मत छोड़िए। तनाव बिल्कुल नहीं होना चाहिए।"

---

मैंने सोचा...

सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन जिंदगी शायद अभी और इम्तिहान लेना चाहती थी।

दो महीने बाद माँ की रिपोर्ट आई।

किडनी खराब होने लगी थी।

हर हफ्ते अस्पताल।

दवाइयाँ।

जाँच।

डायलिसिस का खतरा।

राधिका बी.कॉम. कर रही थी।

वह पढ़ाई छोड़कर घर संभालने लगी।

एक दिन मैंने उसे चुपके से रोते देखा।

वह माँ के पुराने गहने बेचने की सूची बना रही थी।

उस रात मेरी नींद नहीं लगी।

---

अगले दिन कंपनी की एचआर का फोन आया।

"आर्यन... आपकी फ्लाइट अगले सप्ताह है।"

मैंने कहा—

"क्या मैं छह महीने बाद आ सकता हूँ?"

उन्होंने मना कर दिया।

मैंने पूछा—

"क्या मैं भारत से काम कर सकता हूँ?"

उत्तर फिर वही था—

"नहीं।"

फोन कट गया।

मैंने पासपोर्ट हाथ में लिया।

फिर अस्पताल में माँ का चेहरा देखा।

पिताजी व्हीलचेयर पर बैठे थे।

राधिका बिल भरने की लाइन में खड़ी थी।

उस एक पल में...

मुझे समझ आ गया...

कुछ फैसले दिमाग नहीं...

दिल लेता है।

---

मैंने उसी शाम कंपनी को मेल भेज दिया।

"मुझे यह अवसर देने के लिए धन्यवाद... लेकिन मैं अपने परिवार को इस समय छोड़कर नहीं जा सकता।"

मेल भेजते समय मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।

लेकिन भेजने के बाद...

मन पहली बार शांत था।

---

दोस्तों ने कहा—

"तू पागल है।"

रिश्तेदार बोले—

"ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता।"

मैंने किसी से बहस नहीं की।

मैंने बस पिताजी की दुकान संभाल ली।

सुबह दुकान।

दोपहर अस्पताल।

रात को ऑनलाइन बच्चों को पढ़ाना।

धीरे-धीरे दुकान में कंप्यूटर की किताबें, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें और स्टेशनरी भी रखनी शुरू की।

कमाई बढ़ने लगी।

---

एक दिन एक गरीब लड़का दुकान पर आया।

उसके पास किताब खरीदने के पैसे नहीं थे।

मैंने उसे किताब मुफ्त दे दी।

उसने कहा—

"सर... बड़ा होकर मैं भी किसी की मदद करूँगा।"

उसी दिन मैंने दुकान के ऊपर मुफ्त कोचिंग शुरू कर दी।

पहले पाँच बच्चे आए।

फिर बीस।

फिर पचास।

---

तीन साल बाद...

उन्हीं बच्चों में से आठ बच्चों का चयन सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में हुआ।

अखबार में खबर छपी—

"किताब बेचने वाले आईआईटीयन ने गरीब बच्चों की जिंदगी बदल दी।"

यही खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

कुछ ही दिनों बाद...

उसी लंदन वाली कंपनी के सीईओ का ईमेल आया।

उन्होंने लिखा—

"आर्यन, हमें आपकी कहानी पता चली। अगर आप चाहें तो भारत में रहते हुए हमारे एजुकेशन प्रोग्राम का नेतृत्व कर सकते हैं।"

इस बार...

मुझे अपना घर छोड़ना नहीं पड़ा।

---

पिछले महीने पिताजी 70 साल के हुए।

दुकान पर छोटा-सा कार्यक्रम रखा गया।

उन्होंने सबके सामने मेरा हाथ पकड़कर कहा—

"मैंने इसे हमेशा बड़ा आदमी बनने को कहा था... लेकिन इसने मुझे समझाया कि बड़ा आदमी बनने और बड़ा इंसान बनने में बहुत फर्क होता है।"

माँ की आँखों में आँसू थे।

राधिका मुस्कुरा रही थी।

और मैं...

चुप था।

---

आज भी कभी-कभी रात को अलमारी खोलता हूँ।

वह पुराना ऑफर लेटर हाथ में लेता हूँ।

फिर नीचे दुकान से पिताजी की आवाज आती है—

"आर्यन... ज़रा दो कप चाय बना देना।"

मैं मुस्कुराकर वह कागज़ वापस रख देता हूँ।

क्योंकि अब मुझे समझ आ गया है...

हर सपना विदेश जाकर पूरा नहीं होता।

कुछ सपने...

अपने घर लौटकर पूरे होते हैं।

और अगर भगवान मुझे फिर वही दिन वापस दे...

तो मैं फिर वही फैसला करूँगा।

क्योंकि करोड़ों रुपये कमाकर शायद मैं अमीर बन जाता...

लेकिन उस दिन अपने माता-पिता का साथ छोड़ देता...

तो जिंदगी भर अपने आप को कभी माफ़ नहीं कर पाता।

कुछ फैसले करियर नहीं बदलते... इंसान की पहचान बना देते हैं।

#अच्छे_लोग_अच्छे_काम

चौदह बार नाम नहीं आया। चौदह बार। पिता हर बार वही एक बात कहते रहे, जो भी भर्ती परीक्षा आए, बैठो। किसी न किसी में नाम आएगा...
01/08/2026

चौदह बार नाम नहीं आया। चौदह बार। पिता हर बार वही एक बात कहते रहे, जो भी भर्ती परीक्षा आए, बैठो। किसी न किसी में नाम आएगा। फिर एक दिन, 3,28,990 लोगों वाली एक परीक्षा में उसका नंबर आया। तेईसवां।
यह कहानी सफलता की नहीं है।
यह उस पंद्रहवें फॉर्म की कहानी है, जो चौदह बार 'नहीं' सुनने के बाद भी भरा गया था।
20 जून 2026। पटना। बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रवि मनुभाई परमार ने 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा का अंतिम नतीजा पढ़ा।
2,035 पदों के लिए 2,027 नाम। आयोग के इतिहास की एक बड़ी भर्ती।
उस सूची में तेईसवें नंबर पर एक नाम था।
आस्था दमेले।
मध्य प्रदेश। टीकमगढ़ जिला। पलेरा।
बुंदेलखंड का एक कस्बा, जिसका नाम बिहार में शायद किसी ने न सुना हो।
अब उसी कस्बे की बेटी बिहार में एसडीएम बनेगी।
पहले पलेरा की बात।
2011 की जनगणना के आंकड़े कहते हैं, पलेरा तहसील की साक्षरता 51 प्रतिशत थी।
औरतों की, सिर्फ 40.75 प्रतिशत। यानी सौ में इकतालीस।
बाकी उनसठ के लिए कागज पर अपना नाम लिखना भी एक इम्तिहान था।
उसी कस्बे के एक घर में पिता छोटे-छोटे मौसमी धंधे करते थे।
सीजन आया तो काम। सीजन गया तो इंतजार।
इस घर की एक लड़की सातवीं में पढ़ती थी।
और सातवीं के बाद उसे घर छोड़ना पड़ा।
वजह कोई झगड़ा नहीं थी, कोई मजबूरी की कहानी नहीं।
पलेरा में आगे पढ़ने का ठीक इंतजाम ही नहीं था। बस इतना।
बारह-तेरह साल की उमर। एक बैग। और छतरपुर का पता।
आठवीं से बारहवीं, वहीं।
फिर दिल्ली। रामजस कॉलेज से ग्रेजुएशन। इग्नू से पोस्ट-ग्रेजुएशन।
दिल्ली ने उसे एक सपना देकर बुलाया था-यूपीएससी।
उसे यकीन था, पहले ही प्रयास में आईएएस।
दो प्रयास बीते।
दोनों में नाम नहीं आया।
प्रभात खबर से बातचीत में आस्था ने माना कि वह धक्का बहुत गहरा था।
फिर उसने एक के बाद एक फॉर्म भरे।
एमपीपीएससी। यूपीपीएससी। राजस्थान पीएससी। सीएसआईआर और कुछ और भर्तियां।
गिनती जोड़िए, इक्कीस परीक्षाएं।
सफलता सिर्फ सात में।
और चौदह बार वही सन्नाटा, सूची में नाम नहीं।
मनोविज्ञान में इस सन्नाटे का एक नाम है।
मनोवैज्ञानिक मार्टिन सेलिगमैन ने इसे 'सीखी हुई बेबसी' कहा।
बार-बार असफल होने पर इंसान कोशिश करना छोड़ देता है।
लेकिन हर कोई ऐसा नहीं करता। फर्क इस बात से पड़ता है कि वह असफलता को क्या नाम देता है।
‘मैं कभी नहीं कर पाऊंगा’
या ‘इस बार नहीं हुआ।‘
और बड़े भाई ने एक दूसरी बात कही, जो और बड़ी थी।
कि सफलता सिर्फ नतीजा नहीं है। जो पढ़ाई हम कर रहे हैं, वह भी अपने आप में हासिल है।
छोटी बहन के लिए तो आस्था स्कूल के दिनों से ही मिसाल थी।
एक घर, जिसमें कोई अफसर नहीं था
पर हर आदमी को पता था कि हारे हुए इंसान से क्या कहना है।
एंजेला डकवर्थ ने इसे एक शब्द दिया, Grit।
उन्होंने अमेरिका की वेस्ट पॉइंट मिलिटरी अकादमी में हजारों कैडेटों को परखा।
नतीजा यह निकला कि कौन टिकेगा, यह उनके टेस्ट-स्कोर, क्लास-रैंक या शारीरिक ताकत से तय नहीं होता था। तय करती थी जिद। लंबी, ऊबाऊ, रोज की जिद।
यानी रोज-रोज की वही जिद, जो किसी बड़े टैलेंट से भी ज़्यादा दूर तक ले जाती है। आस्था का इक्कीस फॉर्म भरने वाला हाथ उसी जिद का सबूत है।
अब उस परीक्षा की बात, जिसने उसे अफसर बनाया।
13 दिसंबर 2024। प्रीलिम्स। 3,28,990 अभ्यर्थी।
पर्चा लीक होने के आरोप लगे। पटना में विरोध हुआ। मामला हाईकोर्ट तक गया। एक केंद्र की परीक्षा दोबारा करानी पड़ी।
अप्रैल 2025 में मुख्य परीक्षा, पटना के 32 केंद्रों पर।
इंटरव्यू जनवरी से फरवरी 2026 तक चले, 5,401 अभ्यर्थियों के।
और नतीजा आया 20 जून 2026 को।
गिनिए - डेढ़ साल।
यह उसका पहला प्रयास था। और पहला प्रयास डेढ़ साल लंबा था।
जो कहते हैं कि तैयारी सबसे मुश्किल होती है, उन्होंने कभी नतीजे का इंतजार नहीं किया होगा।
उसकी तैयारी में कोई जादू नहीं था। चार आदतें थीं, जो कोई भी उठा सकता है।
अगर घर में कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, तो यह हिस्सा Save कर लीजिए।
1. अपने हाथ से नोट्स
2. हर उत्तर के साथ डायग्राम
3. रोज अखबार का विश्लेषण
4. रोज एक घंटा योग और ध्यान
कभी-कभी सफलता पूरी किताब नहीं, सिर्फ चार आदतों पर टिकी होती है।
20 जून की शाम, जब नतीजा आया, पिता को रैंक से मतलब नहीं था।
उन्हें एक ही बात जाननी थी, बेटी को कौन सा पद मिला।
और जब पता चला कि एसडीएम, तो उनका सीना चौड़ा हो गया।
पिता ने कभी यह नहीं कहा-‘अब छोड़ दो।‘
उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘जो भी भर्ती परीक्षा आए, बैठो।
किसी न किसी में नाम जरूर आएगा।‘
कभी-कभी पूरी जिंदगी सिर्फ एक वाक्य के सहारे खड़ी रहती है।
मां का हाल दूसरा था।
प्रभात खबर के मुताबिक, वे अब तक इस नतीजे को कबूल ही नहीं कर पाई हैं।
आस्था खुद भी नहीं। जब कोई बधाई देता है, तब लगता है -हां, कुछ हुआ है।
मेरी मां गृहिणी हैं।
मैंने उन्हें बुरी खबर बहुत जल्दी मान लेते देखा है।
और अच्छी खबर पर हमेशा एक ही सवाल सच में?
मुझे लगता है, जो मांएं बरसों तक बच्चे की नाकामी अपने भीतर सहेजती रहती हैं, उनके दिल में उम्मीद के लिए जगह कम बच जाती है।
इसलिए अच्छा होने पर वे उसे तुरंत उठाती नहीं। पहले छूकर देखती हैं, कि टूट न जाए।
हम सब किसी एक चिट्ठी के इंतजार में बैठे हैं। कोई रैंक की, कोई नौकरी की, कोई सिर्फ एक 'हां' की।
जिंदगी में सबसे कठिन काम पहला फॉर्म भरना नहीं होता।
सबसे कठिन काम होता है, चौदह 'नहीं' के बाद -पंद्रहवां फॉर्म भरना।
अगर आपके घर में, या आपके दोस्तों में कोई ऐसा है जो इन दिनों बार-बार नाकाम हो रहा है, तो यह कहानी उसकी दीवार तक पहुंचनी चाहिए।
मुमकिन है, आज उसे किसी भाषण की नहीं, बस पलेरा के उस पिता की एक लाइन की जरूरत हो।
मैं राहुल हूं। मैं उन लोगों की खबरें ढ़ूंढ़ता हूं जिनका नाम सूची में देर से आता है, पर आता है। ऐसी सच्ची कहानियां यहां मिलती रहेंगी-साथ चलिए।

ीं #चौदह_बार_नाकामी #बुंदेलखंड_की_बेटी

एक किसान माँ जिसने दो कलेक्टर बनाए🙏🙏🙏उनके पहनावे में माथे पर एक गहरा कुमकुम, शरीर पर गांव जैसा पहनावा और बहुत मेहनत से स...
17/07/2026

एक किसान माँ जिसने दो कलेक्टर बनाए
🙏🙏🙏
उनके पहनावे में माथे पर एक गहरा कुमकुम, शरीर पर गांव जैसा पहनावा और बहुत मेहनत से सिला हुआ शरीर था। उन्हें देखकर लगता था कि वह गांव की एक सीधी-सादी महिला हैं, लेकिन वह सीधी-सादी महिला नहीं थीं। वह एक ताकतवर माँ थीं जिन्होंने अपने तीन बच्चों में से दो को पढ़ाया-लिखाया और उन्हें एडमिनिस्ट्रेशन में कलेक्टर और कमिश्नर जैसे सबसे ऊंचे पदों पर बिठाया।

एक गन्ना मज़दूर के घर जन्मी और ऐसी ही बैकग्राउंड वाली, महाराष्ट्र के बीड ज़िले के ताड़सोना (Tadsonna) नाम के एक छोटे से गांव की एक प्रेरणा देने वाली कहानी है, जो हमें हर माँ की ताकत का एहसास कराती है। यह कहानी असराबाई मुंढे की है, जो एक सीधी-सादी किसान माँ थीं। हाल ही में बुढ़ापे की वजह से उनका निधन हो गया। वह IAS ऑफिसर तुकाराम मुंढे और अशोक मुंढे की माँ थीं।

आसरबाई मुंढे ने बहुत ही आसान हालात में, खेती करते हुए और कई मुश्किलों का सामना करते हुए अपने बच्चों को पढ़ाई का महत्व सिखाया। हालांकि परिवार की हालत सीमित थी, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया। उनका एक ही मानना ​​था — "पढ़ाई और ईमानदारी इंसान को महान बनाती है।" बहुत मुश्किल हालात में भी उन्होंने ज़िद करके अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया, जिनमें से दो कलेक्टर और कलेक्टर के बड़े पद पर पहुँचे, और एक बेटा प्रोफ़ेसर है।

पढ़ाई की अहमियत की वजह से ही उनके दोनों बच्चों ने बड़े सपने देखे और उन्हें पूरा किया। उनके बेटे तुकाराम मुंढे (IAS) और उनके बड़े भाई अशोक मुंढे ने एडमिनिस्ट्रेशन में ऊँचे पदों पर पहुँचकर देश सेवा का रास्ता चुना।

तुकाराम मुंढे महाराष्ट्र में एक बहुत ईमानदार, बहादुर और फ़र्ज़ निभाने वाले अफ़सर के तौर पर जाने जाते हैं। उन्होंने जहाँ भी काम किया, डिसिप्लिन, ट्रांसपेरेंसी और करप्शन के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया अपनाया। उनके काम ने आम लोगों में एडमिनिस्ट्रेशन के प्रति भरोसा जगाया।

उनके बड़े भाई अशोक मुंढे ने भी अपनी माँ के मूल्यों का सम्मान करते हुए अपने काम से एडमिनिस्ट्रेशन में शानदार योगदान दिया।

इस कामयाबी के पीछे कोई बड़ी विरासत, कोई बड़ी दौलत नहीं थी—यह सिर्फ़ उनकी माँ के मूल्य, कड़ी मेहनत और शिक्षा में अटूट विश्वास था।
धन्य है 🙏 माँ

G D अग्रवाल इनका नाम है। ज़रा गूगल करके या जैमिनी से चैट जीपीटी से जिससे पूछना होगा पूछ लीजिएगा। ग्रेटा थनबर्ग, सोनम वां...
14/07/2026

G D अग्रवाल इनका नाम है।
ज़रा गूगल करके या जैमिनी से चैट जीपीटी से जिससे पूछना होगा पूछ लीजिएगा। ग्रेटा थनबर्ग, सोनम वांगचुक जैसे तमाम लोगों से पहले ये आदमी था। जो हिंदुस्तान कहिये या यूं कहिए प्रकृति को बचाना चाहता था। और 111 दिन के अनशन के बाद इसने अपने प्राण त्याग दिए।

मुझे आज भी याद है बस एक छोटी सी ख़बर बनी। इस देश का दलाल मीडिया और उन्मादी लोग इस महान विचारक को खा गए। इनकी पढ़ाई देखिएगा ये कोई बाबा नहीं थे।

उच्च शिक्षा: उन्होंने IIT रुड़की (तब रुड़की यूनिवर्सिटी) से सिविल इंजीनियरिंग की और फिर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से पर्यावरण इंजीनियरिंग में Ph.D. की।
अकादमिक और प्रशासनिक कद: वह IIT कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख (HOD) रहे। इसके साथ ही, वह भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पहले सदस्य सचिव (Member Secretary) भी थे।

कभी दिमाग़ फिर गया होगा तो सोचा इस देश को बचा लें। तो गंगा को बचाने के लिए अनशन पर बैठ गए।
लेकिन हमको गंगा तो बचानी नहीं थी। हम पता नहीं क्या ही बचा रहे थे? जो न ख़त्म हुआ था। न ख़त्म होगा। लेकिन हमको बचाने का ज़िम्मा दिया गया था सो सब बचा ही रहे थे। इसलिए गंगा के नाम पर धंधा हुआ कि उसको बचाना है। लेकिन बचाया नहीं गया जेबें ज़रूर भर गई।

और एक शख़्स इस दुनिया से चला गया इस देश को बचाने के लिए। हम सब मरेंगे क्योंकि हमने सही लोगों को कभी नहीं पहचाना। हम बस दलालों को सिर आंखों पर बिठाकर रखते हैं।

जिस इंसान के पास आराम, शोहरत और विदेश में बसने के तमाम रास्ते खुले थे, उसने सब कुछ छोड़कर गंगा और प्रकृति के लिए लड़ना चुना।
111 दिनों का महा-अनशन और व्यवस्था की बेरुखी। साल 2018 में, 86 वर्ष की आयु में, उन्होंने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने, उस पर बन रहे बड़े बांधों को रुकवाने और 'गंगा महाधुत कानून' पास कराने के लिए हरिद्वार में अनशन शुरू किया।

111 दिनों तक वह केवल पानी और शहद पर रहे। एक ऐसा वैज्ञानिक, जिसने देश के विकास और पर्यावरण की नीतियों को गढ़ा था, वह घुट-घुट कर मर रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए यह कोई बड़ी खबर नहीं थी। वे धार्मिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक नूराकुश्ती और खोखले राष्ट्रवाद को बेचने में व्यस्त थे।

जीडी अग्रवाल मर गए, वो भी विदेश में रह सकते थे लेकिन उन्होंने एक ऐसा कृतघ्न देश चुना जो उनका उपकार तक न माने, वहां उन्होंने लड़ते - लड़ते मरना चुना।

11/07/2026

यह मृत्यु नहीं, रूपांतरण है मेरी जान !
सड़ते आम में जीवन की संभावनाओं से बेहतर क्‍या है
सृष्टि को अपने लाभ से नहीं, स्‍वयं को आहुति देकर समझें

जीवन को समझने के मूलतः दो ही तरीके हैं।
पहला तरीका वह है जिसमें मनुष्य स्वयं को इस संसार का केंद्र मान लेता है।
उसका सुख उसका अपना सुख होता है, उसका दुख उसका अपना दुख। उसके परिवार का विस्तार ही उसका संसार होता है और उसके बाहर की दुनिया उससे केवल उतना ही संबंध रखती है, जितना उसके हित अथवा अहित से जुड़ा हो। ऐसे लोग जीवन को लाभ और हानि के तराजू पर तौलते हैं। उन्हें भविष्य जानने की उत्कंठा रहती है, क्योंकि वे वर्तमान से अधिक आने वाले कल के भय में जीते हैं।
इसी भय की भूमि पर व्यापार भी खड़ा होता है। अनेक लोग ज्योतिष को विज्ञान के रूप में नहीं, भय के कारोबार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। ग्रहों की चाल से अधिक महत्व उपायों की सूची को दिया जाता है। जातक को यह विश्वास दिलाया जाता है कि कोई ग्रह उसका सर्वनाश कर देगा और उससे बचने का उपाय केवल वही बता सकता है। इस प्रक्रिया में शास्त्र पीछे छूट जाते हैं और व्यवसाय आगे निकल जाता है।
महामृत्युंजय मंत्र इसका एक उदाहरण है। सामान्यतः इसे मृत्यु से बचने का मंत्र कहकर प्रचारित किया जाता है। जबकि उसके शब्दों का अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। उसमें प्रार्थना है कि जैसे पक चुका फल सहज रूप से डंठल से अलग हो जाता है, वैसे ही जीव भी बंधनों से मुक्त हो। वहाँ मृत्यु से पलायन नहीं, बल्कि मृत्यु के भय से मुक्ति की कामना है। मृत्यु को शत्रु नहीं, प्रकृति के नियम के रूप में स्वीकार करने की चेतना है।
दूसरा दृष्टिकोण प्रकृति का है। यहाँ मनुष्य स्वयं को केंद्र नहीं, बल्कि विराट व्यवस्था का एक छोटा-सा अंश मानता है। वह समझता है कि सृष्टि किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं बनी है। वह अनादि है, अनंत है और निरंतर परिवर्तनशील है। इसी परिवर्तन का नाम जीवन है।
उपनिषद कहते हैं कि जो जन्मा है, वह नष्ट नहीं होता, केवल अपना रूप बदलता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह केवल एक शरीर का परित्याग कर दूसरे रूप में अपनी यात्रा जारी रखती है। चाहे कोई इन बातों को आध्यात्मिक सत्य माने या दार्शनिक प्रतीक, उनका मूल संदेश यही है कि परिवर्तन ही सृष्टि का सबसे स्थायी नियम है।
प्रकृति स्वयं इस सत्य की सबसे बड़ी शिक्षक है। एक बीज मिट्टी में दबता है। यदि उसे केवल ऊपर से देखा जाए तो लगता है कि वह समाप्त हो गया। पर वास्तव में उसका अंत नहीं, उसकी यात्रा का आरंभ होता है। वही बीज अंकुर बनता है, पौधा बनता है, वृक्ष बनता है और फिर हजारों नए बीजों को जन्म देता है।
एक पका हुआ आम कुछ दिनों बाद सड़ जाएगा। उसका गूदा मिट्टी में मिल जाएगा। देखने वाले को लगेगा कि उसका अस्तित्व समाप्त हो गया। लेकिन उसी के भीतर छिपा बीज अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होगा। वर्षों बाद वही एक विशाल वृक्ष बनेगा, जिसकी शाखाओं पर फिर हजारों आम लगेंगे। यदि उस पहले आम ने स्वयं को बचाकर रखने का प्रयास किया होता, तो वह कभी वृक्ष नहीं बन पाता। उसका गलना ही उसके भविष्य का जन्म है।
मनुष्य भी इसी नियम का हिस्सा है। उसका शरीर पंचमहाभूतों से बना है और अंततः उन्हीं में विलीन हो जाता है। किंतु उसके विचार, उसका ज्ञान, उसकी भाषा, उसकी संस्कृति, उसके संस्कार, उसकी संतानें और उसके कर्म समाज में जीवित रहते हैं। यही कारण है कि कबीर, बुद्ध, महावीर, गांधी या तुलसीदास अपने शरीर से नहीं, अपने विचारों से आज भी उपस्थित हैं। प्रकृति किसी को नष्ट नहीं करती, केवल उसका स्वरूप बदल देती है।
इसलिए जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम कितने वर्ष जीवित रहे। प्रश्न यह है कि हमने अपने अस्तित्व को कितनी दूर तक पहुँचाया। क्या हमने केवल अपना शरीर बचाया, या अपने बाद भी जीवित रहने वाले विचार, मूल्य और संस्कार छोड़े?
जिस दिन मनुष्य इस अंतर को समझ लेता है, उसी दिन मृत्यु का भय समाप्त होने लगता है। तब वह जान लेता है कि जीवन किसी एक देह का नाम नहीं है। जीवन उस अखंड प्रवाह का नाम है, जो अनंत काल से चल रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा। हम उस प्रवाह की केवल एक लहर हैं। लहर मिटती है, समुद्र नहीं।....

#मानवजीवन #प्रकृति #मनुष्य #जीवन #इंसान #जीवनदर्शन

न्यूयॉर्क ।  टाइम्स स्क्वायर। दुनिया की सबसे चमकदार स्क्रीन पर एक मां की तस्वीर थी। न कोई फिल्म स्टार। न कोई अरबपति। न क...
11/07/2026

न्यूयॉर्क । टाइम्स स्क्वायर।
दुनिया की सबसे चमकदार स्क्रीन पर एक मां की तस्वीर थी। न कोई फिल्म स्टार। न कोई अरबपति। न कोई नेता। बस एक मां। और नीचे, भीड़ में खड़ा उसका बेटा मुस्कुरा रहा था।

हजारों लोग उस स्क्रीन को देख रहे थे।
लेकिन उस बेटे को सिर्फ अपनी मां की आंखें दिख रही थीं।

यह तस्वीर किसी विज्ञापन की नहीं थी।

यह एक वादे के पूरे होने की तस्वीर थी।

उस बेटे का नाम है, अभिजय अरोड़ा वुय्युरु।

आज वह गूगल में एआई प्रोडक्ट मैनेजर है।

लेकिन यह कहानी गूगलसे नहीं शुरू होती।

यह शुरू होती है 2012 से।

अभिजय ने आईआईटी की परीक्षा दी।
वह असफल हो गया।

जिस मां ने खुद कभी नई किताबों का सुख नहीं देखा, पुरानी और उधार की किताबों से पढ़ाई की...
उसी मां की आंखों में उस दिन अपने बेटे के लिए आंसू थे।

पति का साया पहले ही उठ चुका था।

एक अकेली मां...

जिसने बेटे को पालना भी था,
पढ़ाना भी था,
और हर हार के बाद उसका हौसला भी बनना था।

उस रात अभिजय ने मां से सिर्फ़ एक बात कही

'एक दिन आपको मुझ पर गर्व होगा।'

लेकिन वादे पूरे होने में समय लगता है।

ग्रेजुएशन के बाद नौकरी की तलाश।

एक हैकाथॉन की जीत।

GMAT की तैयारी।

बार-बार कोशिश।

बार-बार असफलता।

इतनी असफलताएं कि कई लोगों ने कहा

'अब छोड़ भी दो।'

लेकिन कुछ सपने छोड़ने के लिए नहीं होते।

वे पूरे होने के लिए होते हैं।

फिर एक दिन...

हार्वर्ड से बुलावा आया।

और वहीं से उस सफर ने नई दिशा पकड़ ली।

2025 में गूगल का ऑफर मिला।

लेकिन शायद अभिजय की सबसे बड़ी उपलब्धि नौकरी नहीं थी।

वह पल था...

जब उसने अपनी मां को फोन किया और कहा

'मां... ऊपर देखो।'

न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर की विशाल स्क्रीन पर उनकी तस्वीर थी।

एक मां...

जिसने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा...

आज पूरी दुनिया उसे देख रही थी।

कहते हैं, बेटे मां का नाम रोशन करते हैं।

लेकिन सच यह है...

मां पहले अपना जीवन जलाती है,
तब कहीं जाकर बेटे की दुनिया रोशन होती है।

यह पढ़ते-पढ़ते मुझे अपनी मां याद आ गई।

मुझे याद है...

सुबह हमसे पहले उनकी आंख खुलती थी।

रात सबसे बाद में वही सोती थीं।

हमारे स्कूल की फीस, किताबें, कपड़े, भविष्य...

इन सबके बीच उन्होंने कब अपनी इच्छाओं को चुप करा दिया, हमें कभी पता ही नहीं चला।

शायद आपकी मां ने भी ऐसा ही किया होगा।

हममें से ज़्यादातर लोग अपने जीवन की सबसे बड़ी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत को देते हैं।

लेकिन सच यह है...

हमारी हर सफलता के पीछे किसी मां की अधूरी नींद,
किसी मां की टली हुई ज़रूरत,
और किसी मां का अनकहा त्याग खड़ा होता है।

अभिजय ने टाइम्स स्क्वायर पर एक बिलबोर्ड खरीदा।

लेकिन उसने दुनिया को उससे भी बड़ी बात याद दिला दी—

मां को सम्मान देने के लिए करोड़ों रुपये नहीं चाहिए।

कभी-कभी सिर्फ़ पांच मिनट का एक फोन कॉल भी काफी होता है।

एक बिलबोर्ड बुक करना शायद आसान है।

मां का कर्ज़ चुकाना...

आज भी नामुमकिन है।

अगर यह पोस्ट यहां तक पढ़ ली है...

तो एक काम कीजिए।

किसी खास दिन का इंतजार मत कीजिए।

आज ही...

बस यूं ही...

अपनी मां को फोन कीजिए।

हो सकता है...

आपकी आवाज ही आज उनके लिए टाइम्स स्क्वायर की सबसे बड़ी रोशनी बन जाए।

आपने अपनी मां को आखिरी बार 'बिना किसी वजह' कब फोन किया था...

जब बैंक के बाबू ने खाता चेक किया, तो पता है क्या बोला?माता जी, आपके खाते में सिर्फ ₹16 बचे हैं!बूढ़ी माँ अपनी 'विधवा पें...
09/07/2026

जब बैंक के बाबू ने खाता चेक किया, तो पता है क्या बोला?
माता जी, आपके खाते में सिर्फ ₹16 बचे हैं!

बूढ़ी माँ अपनी 'विधवा पेंशन' की उम्मीद में, चिलचिलाती धूप में कई किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुँची थीं। सोचा था, इस बार कुछ पैसे मिल जाएंगे तो महीने भर के राशन और दवा का इंतज़ाम हो जाएगा।

₹16...! ज़रा सोचिए, उस वक्त उस बेसहारा माँ के दिल पर क्या गुजरी होगी? सुनने की समस्या की वजह से उन्हें यह भी नहीं पता कि उनकी हक की पेंशन कहाँ, किस दफ्तर की फाइल में दम तोड़ चुकी है। बैंक वाले बताते हैं कि यह माँ हर महीने इसी उम्मीद में दूर से पैदल चलकर आती हैं, और हर बार इसी तरह खाली हाथ, अपनी सूनी आँखों में आँसू लिए वापस लौट जाती हैं।

बिहार में सोशल सिक्योरिटी पेंशन के तहत इन बुजुर्ग और विधवा महिलाओं को हर महीने ₹1,100 मिलने का प्रावधान है। किसी रईस के लिए ₹1,100 महज़ एक शाम के नाश्ते का बिल हो सकता है, लेकिन इस माँ के लिए यह उनके स्वाभिमान और दो वक्त की रोटी का इकलौता सहारा है।

अब हमारे सिस्टम के कर्ता-धर्ताओं से कुछ तीखे सवाल

कागज़ी डिजिटल इंडिया का क्या फायदा? जब एक बुजुर्ग महिला को यह बताने वाला कोई नहीं है कि उसकी पेंशन 'e-KYC', 'आधार लिंकिंग' या 'DBT' के किस तकनीकी मकड़जाल में अटकी हुई है?

बैंक और ब्लॉक के अधिकारियों की आत्मा कहाँ सोई है? जब एक असहाय बुजुर्ग महिला हर महीने दफ्तर के चक्कर काट रही है, तो क्या किसी एक भी बाबू का फर्ज नहीं बनता कि वो कुर्सी से उठकर उसकी समस्या का समाधान कर दे?

क्या कागज़ों के नियम इंसानी जान से बड़े हैं? नियम बनते हैं जनता की सहूलियत के लिए, लेकिन यहाँ नियम ही गरीबों का गला घोंट रहे हैं।

यह सिर्फ एक माँ की कहानी नहीं है। हर राज्य से लेकर है अब तक, न जाने कितने ऐसे बुजुर्ग हैं जो ब्लॉक और बैंकों के चक्कर काटते-काटते दम तोड़ देते हैं, लेकिन उनकी पेंशन चालू नहीं होती।

बड़ी-बड़ी योजनाओं के होर्डिंग्स लगाने वाली सरकार और एयरकंडीशनर कमरों में बैठकर फाइलें सरकाने वाले अधिकारियों को तुरंत जागना चाहिए। अगर हकदार को उसका हक पाने के लिए भी भीख मांगनी पड़े, तो समझ लीजिए कि हमारा सिस्टम पूरी तरह वेंटिलेटर पर है।

इस बेबस माँ की खामोश चीख का ज़िम्मेदार कौन है? आखिर कब मिलेगा इन्हें न्याय? क्या कोई साहब इनकी आवाज़ सुनेगा, या अगली बार फिर ये ₹16 का बैलेंस देखने पैदल ही आएंगी?

#बुजुर्गोंकासम्मान

01/07/2026

"फादर्स डे पर बाप का बदला" 😂🥹
फादर्स डे वाले दिन सुबह-सुबह मैंने फेसबुक खोला।
दोस्त लोग अपने पिताजी के साथ फोटो डाल रहे थे।
कोई लिख रहा था— "मेरे पापा मेरे हीरो हैं..."
कोई लिख रहा था— "मेरे पापा मेरे सुपरमैन हैं..."
मैंने भी जोश में आकर पोस्ट डाल दी—
"मेरे पिता जी किसी भी फादर्स डे के मोहताज नहीं हैं। उनका जब भी दिल करता है, जूता उठाकर याद दिला देते हैं कि बाप-बाप होता है!" 🤣
पोस्ट वायरल हो गई।
हजारों लाइक।
सैकड़ों कमेंट।
मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था।
तभी दरवाजे पर आवाज आई—
"ओए लेखक साहब!"
मैंने बाहर देखा...
पिताजी मोबाइल हाथ में लिए खड़े थे।
और उनके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर मेरी आत्मा तक कांप गई।
उन्होंने पूछा—
"बहुत बड़ा कॉमेडियन बन गया है तू?"
मैं समझ गया...
पोस्ट इनके हाथ लग गई है।
मैं भागने लगा।
लेकिन इस बार कुछ अजीब हुआ।
पिताजी ने जूता नहीं उठाया।
उन्होंने कहा—
"आज नहीं मारूंगा।"
मैंने राहत की सांस ली।
लेकिन मुझे क्या पता था कि असली खतरा अभी शुरू हुआ है।
शाम को घर में रिश्तेदार आ गए।
चाचा, ताऊ, मौसी, फूफा...
पूरा परिवार।
मैं सोच रहा था कोई पूजा-वूजा होगी।
तभी पिताजी कुर्सी पर खड़े हो गए।
और बोले—
"आज फादर्स डे है। और मेरे बेटे ने फेसबुक पर मेरे बारे में बहुत कुछ लिखा है। अब मेरी भी बारी है।"
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
उन्होंने अपना मोबाइल निकाला।
और बचपन की तस्वीरें दिखानी शुरू कर दीं।
पहली फोटो...
मैं नंगा बैठा हुआ था और सामने स्टील की थाली में मिट्टी खा रहा था।
पूरा घर हंस पड़ा।
मैंने कहा—
"पापा हटाइए ये!"
वो बोले—
"अभी तो शुरुआत है बेटा।"
दूसरी फोटो...
मैं पांच साल का था।
पड़ोस वाली पिंकी के साथ शादी-शादी खेल रहा था।
माथे पर लाल टीका।
गले में माला।
पिताजी बोले—
"ये हमारा बेटा है। पांच साल की उम्र में ही प्रेम विवाह कर चुका था।"
पूरा घर ठहाके मारकर हंस पड़ा।
मैं पसीना-पसीना हो गया।
फिर उन्होंने एक पुरानी कॉपी निकाली।
बोले—
"अब इसके बचपन की कविताएं सुनिए।"
मैंने सोचा कोई अच्छी कविता होगी।
लेकिन उन्होंने पढ़ना शुरू किया—
"चंदा मामा दूर के, पकौड़े बनाएं सूर के..."
पूरा घर हंस-हंसकर लोटपोट।
मैं शर्म से मर रहा था।
फिर अचानक पिताजी चुप हो गए।
उन्होंने कॉपी बंद कर दी।
और बोले—
"मजाक बहुत हो गया।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने पहली बार देखा...
उनकी आंखें हल्की सी भर आई थीं।
उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा—
"आज ये सब हंस रहे हैं ना... लेकिन इन्हें एक बात नहीं पता।"
"जब ये पैदा हुआ था तो अस्पताल में सिर्फ 1700 रुपये का बिल था... और मेरी जेब में 900 रुपये।"
सब चुप।
"मैंने अपनी घड़ी बेच दी थी।"
कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया।
उन्होंने आगे कहा—
"जब ये पांचवीं में फेल हुआ था... तो पूरी कॉलोनी इसे बेवकूफ कह रही थी।"
"लेकिन मैंने किसी को कुछ नहीं कहा।"
"रात को छत पर जाकर अकेले रोया था।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
और मुस्कुराकर बोले—
"जब ये पहली बार नौकरी के लिए शहर गया था... तो स्टेशन से लौटते समय मैं बस में नहीं बैठा।"
"पूरे दस किलोमीटर पैदल चला।"
क्योंकि अगर बस में बैठता तो लोग पूछते—
'इतना उदास क्यों है?'
और मैं रो पड़ता।"
अब पूरे घर की आंखें नम थीं।
फिर उन्होंने जेब से कुछ निकाला।
एक छोटा सा टूटा हुआ प्लास्टिक का खिलौना।
मैं पहचान गया।
मेरी बचपन वाली लाल कार।
जो मैं पांच साल की उम्र में खो चुका था।
मैं हैरान रह गया।
"ये आपके पास कैसे है?"
पिताजी हंसे।
बोले—
"जिस दिन तू रो-रोकर इसे ढूंढ रहा था... उस दिन मुझे खेत में मिली थी।"
"सोचा था बड़ा होगा तो दूंगा।"
"लेकिन तू बड़ा हो गया... और मैं भूल गया।"
अब मैं खुद को रोक नहीं पाया।
मैं उठकर उनके गले लग गया।
पूरे घर के सामने।
पहली बार।
तभी पिताजी ने धीरे से मेरे कान में कहा—
"और सुन..."
मैंने कहा—
"जी पापा?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
"फेसबुक पर लिख देना... कि बाप सिर्फ जूता नहीं उठाता।"
"कभी-कभी पूरी जिंदगी उठा लेता है... ताकि बेटा गिर न जाए।"
बस...
उस दिन समझ आया कि बचपन में जिस जूते से मैं डरता था...
असल में वही जूता धूप में जलते पैरों पर चलकर मेरे लिए रोटी कमाने जाता था।
और जिस आदमी पर मैं मजाक करता था...
वो आदमी चुपचाप अपनी पूरी जिंदगी मेरी खुशियों के नाम लिख चुका था।
उस रात मैंने फेसबुक पर सिर्फ एक लाइन लिखी—
"बचपन में लगता था पापा मुझे जूते से चलाते हैं... आज समझ आया, वो खुद घिस गए ताकि मैं चल सकूं..." ❤️🥹
और यकीन मानिए...
उस पोस्ट पर सबसे पहला लाइक मेरे पिताजी का था। ❤️🙏🏻

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