20/09/2026
विष्णु तिवारी की जिंदगी के करीब 20 साल जेल की चारदीवारी में गुजर गए, लेकिन 2021 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें उस मामले में बरी कर दिया, जिसमें उन्हें बलात्कार और SC/ST एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया था। ललितपुर के सिलावन गांव के रहने वाले विष्णु को 16 सितंबर 2000 को गिरफ्तार किया गया था। उस समय उनकी उम्र करीब 23 साल थी। 2003 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बलात्कार के मामले में 10 साल की सजा और SC/ST एक्ट के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ चलनी थीं।
विष्णु ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन उनकी अपील लंबे समय तक लंबित रही। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनवरी 2021 में मामले की सुनवाई के बाद अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और गवाही में गंभीर कमियां पाईं और उनकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। अदालत की टिप्पणियों में यह भी सामने आया कि उनकी अपील करीब 16 साल तक defective matter के रूप में लंबित रही और बाद में कानूनी सहायता के जरिए मामले को आगे बढ़ाया गया। यानी मामला सिर्फ आरोप और सजा तक सीमित नहीं था, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में हुई लंबी देरी भी इस कहानी का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा थी।
इन 20 वर्षों के दौरान विष्णु ने अपने परिवार के कई सदस्यों को खो दिया। रिपोर्टों के अनुसार उनके माता-पिता और दोनों भाइयों की मृत्यु हो गई, लेकिन वह जेल में होने के कारण उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सके। रिहाई के बाद उन्होंने मीडिया से कहा था कि जेल में बिताए वर्षों ने उनके शरीर और परिवार दोनों को तोड़ दिया था। 43 साल की उम्र में जेल से बाहर आने के बाद उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि जिंदगी को दोबारा कहां से शुरू किया जाए।
इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी NHRC ने भी संज्ञान लिया था। मार्च 2021 में आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से रिपोर्ट मांगी थी और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई तथा विष्णु के पुनर्वास और राहत के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी थी। NHRC के दस्तावेजों में यह भी दर्ज है कि विष्णु के लिए मुआवजे की मांग को लेकर शिकायत की गई थी।
यहां एक जरूरी कानूनी अंतर समझना भी महत्वपूर्ण है। अदालत ने विष्णु तिवारी को बरी किया था और अभियोजन का मामला पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे सीधे “झूठा SC/ST केस साबित हुआ” जैसे शब्दों में पेश करना कानूनी फैसले की भाषा से ज्यादा व्यापक दावा हो सकता है। इसी तरह किसी व्यक्ति को बरी किया जाना अपने आप यह साबित नहीं करता कि शिकायतकर्ता ने जानबूझकर झूठ बोला था। इस मामले में अदालत के फैसले में अभियोजन के साक्ष्यों और मामले की कमियों पर जोर था।
विष्णु तिवारी का मामला भारत में wrongful conviction, कानूनी सहायता, अपील में देरी और राज्य की जवाबदेही जैसे गंभीर सवाल जरूर उठाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अलग-अलग मामलों में माना है कि राज्य की कार्रवाई से मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन होने पर मुआवजा एक संवैधानिक राहत हो सकता है।