Hundred Flowers Marxist Study Group- Patna Chapter

Hundred Flowers Marxist Study Group- Patna Chapter We are a collective of people with a resolve to study Marxism not only for academic purposes. guide to practice.

Hundred flowers Marxist Study Group-Patna Chapter is a forum of conscientious individuals who believe that marxism-leninism is not only a scientific ideology to study but to drive and propel things into action i.e. We are a collective of people with a resolve to study marxism not for academic purposes but to understand the workings of the material world so that we can change them.

Remembering the great teacher of the proletariat, Friedrich Engels, on his 131st death anniversary
06/08/2026

Remembering the great teacher of the proletariat, Friedrich Engels, on his 131st death anniversary

बीते रविवार को नारीवादी विचारधारा पर एक आलोचनात्मक विवेचना का सत्र रखा गया। इसमें कई लोग मौजूद थे। शुरुआत में नारीवादी व...
23/06/2026

बीते रविवार को नारीवादी विचारधारा पर एक आलोचनात्मक विवेचना का सत्र रखा गया। इसमें कई लोग मौजूद थे। शुरुआत में नारीवादी विचारधारा पर लोगों की राय सुनी गयी। कुछ लोगों की तरफ़ से यह बात आयी कि स्त्री मुक्ति आन्दोलन में इसकी एक बड़ी भूमिका रही है और यह स्त्रियों की आज़ादी और बराबरी के लिए समाधान या विकल्प हो सकता है।

लोगों की राय आने के बाद नारीवादी विचारधारा पर एक प्रजेंटेशन रखा गया जिसमें सबसे पहले यह बताया गया कि किसी भी समस्या के समाधान हेतु सबसे पहले हमें यह देखना होता है कि वह चीज़ कब और कैसे अस्तित्व में आयी। स्त्री का समाज में दोयम दर्जा शुरू से नहीं रहा था। एक समय था जब मातृसत्तात्मक समाज हुआ करता था क्योंकि तभी स्त्रियों की उत्पादन में मुख्य भूमिका थी। कबीलाई समाज में कबीले के अस्तित्व के लिए स्त्रियों की एक मुख्य भूमिका थी, इस वजह से उनका एक ऊँचा दर्जा था।

बाद में अधिशेष के उत्पादन और निजी सम्पत्ति के अस्तित्व में आने के साथ ही एक पितृसत्तात्मक परिवार, वर्ग और राज्य का उदय होता है और इसी के साथ स्त्रियों की गुलामी का इतिहास शुरू होता है। जब तक यह नहीं समझा जाएगा कि आखिर वो क्या भौतिक आधार थे जिससे स्त्रियों की गुलामी शुरू हुई, तब तक हम स्त्री मुक्ति के संघर्ष की सही दिशा नहीं तय कर सकते।
इसके बाद लोगों को नारीवादी आन्दोलन का एक संक्षिप्त इतिहास बताया गया और यह बताया गया कि किस प्रकार नारीवादी विचारधारा एक बुर्जुआ विचारधारा है। वह स्त्री उत्पीड़न के कारणों को इस प्रकार चिन्हित करती है कि चूँकि एक महिला महिला है, इस वजह से वह उत्पीड़ित है। स्त्री मुक्ति आन्दोलन में नारीवादी विचारधारा ने एक अस्मितावादी राजनीति को स्थापित करने का काम किया है। असल में अस्मितावाद की राजनीति स्त्री मुक्ति आन्दोलन में खुद एक बाधा है। आज अपने इस अनैतिहासिक, अवैज्ञानिक और भाववादी विश्लेषण की वजह से ही नारीवादी आन्दोलन सुधारवाद, एन.जी.ओ पंथ और केवल क़ानूनी अधिकारों व चुनावी प्रतिनिधित्व मिलने तक सीमित हो चुका है। आज तक कभी भी नारीवादी आन्दोलन ने राज्य या पूँजीपति वर्ग की सत्ता पर सवाल नहीं खड़ा किया बल्कि उल्टे उसे एक मध्यस्थता (Mediator) के तौर पर देखा है। ठीक इसलिए आज नारीवादी आन्दोलन में ज़्यादातर एन.जी.ओ. किस्म के संगठन सक्रिय हैं जो राज्य या कॉरपोरेट घरानों से फण्ड लेने में बिल्कुल नहीं हिचकते।

आज स्त्री मुक्ति आन्दोलन को एनजीओपन्थी सुधारवादी संगठनों की पहचान की राजनीति से मुक्त करना होगा जो स्त्री-मुक्ति के नाम पर स्त्री-मुक्ति के आन्दोलन को महज स्त्री की पहचान की लड़ाई तक सीमित कर देते हैं। नारीवादियों की राजनीति स्त्री मुक्ति की लड़ाई को स्त्री बनाम पुरुष बनाकर स्त्री मुक्ति के आन्दोलन को पूरे जनसमूह से कटकर व्यक्तिगत विद्रोह तक समेट देती हैं।

इसके ठीक विपरीत स्त्री मुक्ति आन्दोलन की दिशा पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण एक सही व्याख्या प्रस्तुत करता है। इतिहास के एक निश्चित बिन्दु पर स्त्रियों के उत्पीड़न की शुरुआत हुई थी, और यह निजी सम्पत्ति के ख़ात्मे के साथ ही ख़त्म हो सकती है। पूँजीवादी व्यवस्था में स्त्री मुक्ति के सपने को देखना आकाशकुसुम की अभिलाषा के समान है क्यों कि पूँजीवाद खुद निजी सम्पति की सबसे उन्नततम व्यवस्था है। इसका खात्मा ही स्त्री-मुक्ति का रास्ता हो सकता है। पूँजीवाद ने पितृसत्तात्मक विचारधारा को अपने अन्दर समाहित कर लिया है। एक हद तक स्त्रियों को "आज़ादी" मिलने के बावजूद आज स्त्रियाँ दोहरी गुलाम हैं। एक तरफ पूँजीवादी व्यवस्था सस्ती स्त्री-श्रमशक्ति के दोहन के ज़रिये अपना मुनाफ़ा बढ़ा रही है वहीं दूसरी तरफ पूँजीवादी पितृसत्तात्मक मानसिकता ने स्त्रियों को भी एक बिकाऊ माल बनाकर बाज़ार में खड़ा कर दिया है। इसलिए आज स्त्री मुक्ति बिना समाजवादी क्रान्ति के सम्भव नहीं है। यह भी उतना ही सच है कि स्त्री मुक्ति आन्दोलन को खड़ा किये बिना और उसे आम जनता के संघर्षों से जोड़े बिना क्रान्ति भी सम्भव नहीं है। समाजवादी क्रान्ति के बाद भी एक लम्बा कालखंड होगा जब लोगों के बीच पैठी पूँजीवादी पितृसत्तात्मक मानसिकता को खत्म करने के लिए कई सांस्कृतिक क्रांतियों से गुज़रना होगा।

इस व्याख्यान के बाद चर्चा सत्र जारी रहा।

The question of women's liberation has remained a burning question for a long time. Feminist ideology has often been pre...
19/06/2026

The question of women's liberation has remained a burning question for a long time. Feminist ideology has often been presented as the path to women's liberation. Over the past 120 years, feminism has evolved through various schools of thought and historical phases.

To better understand what feminist ideology means, its origins, and whether it can provide a path to women's liberation, the Hundred Flowers Marxist Study Group is organizing a symposium on 'Critical Analysis of Feminist ideology'.

We invite you to participate in this symposium.

गत 5 मई को अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस की विरासत को याद करते हुए हण्ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्ट स्टडी ग्रुप द्वारा ' मज़दू...
08/05/2026

गत 5 मई को अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस की विरासत को याद करते हुए हण्ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्ट स्टडी ग्रुप द्वारा ' मज़दूर दिवस और मेहनतकशों के अधिकार के लिए जारी संघर्ष ' विषय पर ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया गया।

इस परिचर्चा में मई दिवस के इतिहास पर चर्चा की गयी। इस दौरान कहा गया कि मई दिवस की शुरुआत 1886 में शिकागो शहर में हुए मज़दूर आन्दोलन से जुड़ी हुई है। उस समय अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूर 8 घंटे कार्यदिवस की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। काम के घण्टे निर्धारित नहीं होने, बेहद कम वेतन और काम करने की अमानवीय परिस्थितियों के विरोध में हुए इस आंदोलन ने दुनिया भर के मज़दूरों के लिए एक मिसाल कायम की। शिकागो शहर में मज़दूरों के आंदोलन का दमन करने के लिए पूंजीपतियों, सरकार और पुलिसिया तंत्र ने षड्यंत्र रचे और मज़दूर नेताओं को गिरफ़्तार कर, उनपर फर्ज़ी मुकदमें चलाए तथा उन्हें फांसी की सज़ा दी। इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि पूंजीवादी व्यवस्था में नियम और कानून किस तरह से पूंजीपतियों के पक्ष में काम करते है।

हालांकि, शिकागो के इस संघर्ष ने विश्वभर के श्रमिक आंदोलनों को प्रेरित किया। शिकागो में मज़दूरों के संघर्ष एवं शहीदों को याद करते हुए, 1889 में द्वितीय इण्टरनेशनल ने 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।

इसके उपरान्त, भारत में भी मज़दूर आंदोलन पर संक्षिप्त बातचीत की गयी। इस दौरान स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के दौर में हुए शुरुआती मज़दूर हड़तालों और उनके प्रभाव पर भी चर्चा की गयी। इसके बाद आज़ादी के बाद विभिन्न कालखण्डों में बदलते राजनीतिक परिदृश्य में देश में खड़े हो रहे मज़दूर आन्दोलन पर बात की गयी। यह वह दौर था, जब मज़दूरों ने अपने संघर्षों के दम पर सरकार को एक हद तक अपनी मांगें मानने पर विवश किया था। हालांकि,1991 में नवउदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद ठेका प्रथा, कॉन्ट्रैक्चुअल लेबर, हायर एण्ड फायर जैसे मज़दूर विरोधी प्रावधानों को लागू करने में तेजी आयी। 2014 में फ़ासीवादी भाजपा के सत्ता में आने के बाद से मज़दूरों के अधिकारों पर हमलें पहले से ज़्यादा तेज़ हो गए। यहाँ तक की दशकों के संघर्ष के बाद मज़दूरों ने जो थोड़े बहुत अधिकार हासिल भी किये थे, 2026 में चार लेबर कोड लाकर उसे भी ख़त्म कर दिया गया है।

सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियां, बढ़ती महंगाई और बेहद कम वेतन में नरकीय परिस्थितियों में मज़दूरी को विवश देश की मेहनतकश आबादी में असंतोष पनप रहा है। इस साल मार्च और अप्रैल के महीने देश में कई जगह मज़दूर सड़कों पर उतरकर अपने वाजिब हक की माँग कर रहे थें। लेकिन, इस दौरान उनका बर्बर दमन किया गया। विशेषकर नोएडा और मानेसर में सैकड़ों की तादाद में मज़दूरों और दर्जन भर मज़दूर कार्यकर्ताओं समेत सत्यम वर्मा जैसे जन बुद्धिजीवी एवं पत्रकार को भी फर्ज़ी मुकदमों के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया है।

आज से करीब 140 वर्ष पहले जो शिकागो में घटित हुआ था, कमोबेश वैसा ही घटनाक्रम आज भी हमारे सामने है। हमें ऐसी दमनात्मक कार्रवाइयों को पुरज़ोर विरोध करना होगा और मज़दूरों द्वारा अपने जायज़ हक के लिए किये जा रहे आन्दोलनों के समर्थन में आगे आना होगा।

You are invited to an online discussion on"Labour Day and the Continuing Struggle for Workers' Rights"May 5, 20266:00 P ...
04/05/2026

You are invited to an online discussion on

"Labour Day and the Continuing Struggle for Workers' Rights"

May 5, 2026
6:00 P Onwards

For Google Meet Link, contact us on 9102346391

Remembering the Great Teacher of the Proletariat, Karl Marx, on His 137th Death Anniversary.".....And now as to myself, ...
14/03/2026

Remembering the Great Teacher of the Proletariat, Karl Marx, on His 137th Death Anniversary.

".....And now as to myself, no credit is due to me for discovering the existence of classes in modern society or the struggle between them. Long before me bourgeois historians had described the historical development of this class struggle and bourgeois economists, the economic anatomy of classes. What I did that was new was to prove:
(1) that the existence of classes is only bound up with the particular, historical phases in the development of production,
(2) that the class struggle necessarily leads to the dictatorship of the proletariat,
(3) that this dictatorship itself only constitutes the transition to the abolition of all classes and to a classless society."

- Karl Marx (Letter to Weydemeyer, 1852)

Remembering Joseph Stalin, the Great Teacher of the Proletarian Class, on his 147th birth anniversary.....
18/12/2025

Remembering Joseph Stalin, the Great Teacher of the Proletarian Class, on his 147th birth anniversary.....

Remembering Friedrich Engels, the great teacher of the proletariat, on his 205th birth anniversary (28 November)Nature i...
29/11/2025

Remembering Friedrich Engels, the great teacher of the proletariat, on his 205th birth anniversary (28 November)

Nature is the proof of dialectics, and it must be said for modern science that it has furnished this proof with very rich materials increasingly daily, and thus has shown that, in the last resort, Nature works dialectically and not metaphysically; that she does not move in the eternal oneness of a perpetually recurring circle, but goes through a real historical evolution. In this connection, Darwin must be named before all others. He dealt the metaphysical conception of Nature the heaviest blow by his proof that all organic beings, plants, animals, and man himself, are the products of a process of evolution going on through millions of years. But, the naturalists, who have learned to think dialectically, are few and far between, and this conflict of the results of discovery with preconceived modes of thinking, explains the endless confusion now reigning in theoretical natural science, the despair of teachers as well as learners, of authors and readers alike.
- Friedrich Engels (Socialism: Utopian and Scientific)

हण्ड्रेड फ़्लावर्स मार्क्सिस्ट ग्रुप द्वारा महान अक्टूबर क्रान्ति की 108वीं वर्षगांठ पर 'अक्टूबर' फिल्म का प्रदर्शन एवं अ...
08/11/2025

हण्ड्रेड फ़्लावर्स मार्क्सिस्ट ग्रुप द्वारा महान अक्टूबर क्रान्ति की 108वीं वर्षगांठ पर 'अक्टूबर' फिल्म का प्रदर्शन एवं अक्टूबर क्रान्ति की प्रासंगिकता पर परिचर्चा का आयोजन

समय : 4 बजे संध्या,
9 नवम्बर, रविवार, 2025

स्थान : शहीद भगतसिंह पुस्तकालय, गोसाईं टोला, पटना

हण्ड्रेड फ़्लावर्स मार्क्सिस्ट स्टडी ग्रुप द्वारा पटना में जाति प्रश्न पर दो दिवसीय अध्ययन शिविर का आयोजन किया गया था। आज...
30/08/2025

हण्ड्रेड फ़्लावर्स मार्क्सिस्ट स्टडी ग्रुप द्वारा पटना में जाति प्रश्न पर दो दिवसीय अध्ययन शिविर का आयोजन किया गया था। आज शिविर का पहला दिन था। कई नौजवान इसमें शामिल रहे। आज जाति व्यवस्था के उद्गम और विकास पर बातचीत की गयी। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में जाति व्यवस्था कैसे विकसित हुई, इसपर विस्तार से चर्चा की गयी। अन्त में परिचर्चा का सत्र भी रखा गया।

Address

Patna University
Patna
800005

Telephone

9939815231

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Hundred Flowers Marxist Study Group- Patna Chapter posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share