The Root Store

The Root Store मानव जीवन को सरल एवं प्रभावी बनाने के ?

03/04/2026

प्रकृति ने दिया है असली, शुद्ध और सुरक्षित सिंदूर!
इसे सिंदूर का पौधा / कुमकुम ट्री कहते हैं।
इसका वैज्ञानिक नाम है Bixa orellana.
इसके लाल फल के अंदर मौजूद छोटे-छोटे बीजों से मिलता है —
✔️ 100% नेचुरल सिंदूर
✔️ नेचुरल लिपस्टिक
✔️ Ayurvedic रंग (Bixin)
🌱 कैसे लगाएँ सिंदूर का पौधा?
1️⃣ बीज से रोपण
✔️ पके फलों से बीज निकालें
✔️ भुरभुरी, नमीदार मिट्टी में 1 इंच गहराई पर बो दें
✔️ 10–20 दिन में अंकुर निकल आते हैं
2️⃣ कलम (Cutting) से
✔️ 6–8 इंच की स्वस्थ डंडी काटें
✔️ नीचे की पत्तियाँ हटाकर मिट्टी में लगा दें
✔️ 25–30 दिन में नई पत्तियाँ आने लगती हैं
📌 करीब 1 साल में पौधा लाल फलों से भर जाता है
और इससे प्राप्त बीज पीसकर शुद्ध सिंदूर बनाया जाता है।
👉 एक पौधा लगभग 1.5 किलो तक प्राकृतिक सिंदूर दे सकता है!

31/03/2026

Ayurvedic Morning Drink - सुबह की शुरुआत कैसी होनी चाहिए? आयुर्वेद क्या कहता है - आयुर्वेद के अनुसार आपकी सुबह की शुरुआत ही पूरे दिन का टोन सेट करती है।

आप दिन की शुरुआत कैसे करते हैं—क्या खाते-पीते हैं—यही तय करता है कि आपका दिन एनर्जेटिक रहेगा या सुस्त।

सुबह का पहला ड्रिंक सिर्फ प्यास बुझाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह आपके शरीर को अंदर से जगाने, डिटॉक्स करने और बैलेंस करने का काम करता है। सही ड्रिंक आपके डाइजेशन, इम्युनिटी और एनर्जी—all तीन पर असर डालता है।

समझते हैं कि आयुर्वेद के हिसाब से सुबह खाली पेट क्या पीना सबसे फायदेमंद हो सकता है।

1. गुनगुना पानी – सबसे बेसिक लेकिन सबसे ताकतवर
आयुर्वेद में दिन की शुरुआत गुनगुने पानी से करना सबसे बेस्ट माना गया है।

रातभर शरीर हल्का डिहाइड्रेट हो जाता है
गुनगुना पानी बॉडी को रीहाइड्रेट करता है
शरीर में जमा टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करता है

अगर इसमें थोड़ा नींबू मिला लिया जाए, तो यह और भी असरदार हो जाता है।

2. हर्बल टी – नेचुरल हीलिंग के साथ शुरुआत
सुबह की चाय अगर हर्बल हो, तो यह शरीर को बिना नुकसान के कई फायदे देती है।

अदरक वाली चाय - डाइजेशन सुधारती है, सूजन कम करती है
तुलसी की चाय - इम्युनिटी बढ़ाती है, स्ट्रेस कम करती है
दालचीनी चाय - ब्लड शुगर बैलेंस में मदद

ये ड्रिंक्स शरीर को धीरे-धीरे एक्टिव करते हैं और अंदर से वार्म करते हैं।

3. गुनगुना नींबू पानी – डिटॉक्स का आसान तरीका
सुबह नींबू पानी पीना आजकल ट्रेंड है, लेकिन आयुर्वेद में यह पहले से ही बताया गया है।

लिवर को क्लीन करता है
डाइजेशन को एक्टिव करता है
विटामिन C से इम्युनिटी सपोर्ट करता है

यह शरीर को अल्कलाइन बैलेंस में लाने में भी मदद करता है।

4. नट मिल्क – डेयरी का हेल्दी विकल्प
अगर आप दूध नहीं लेना चाहते, तो बादाम या नारियल का दूध एक अच्छा ऑप्शन है।

हेल्दी फैट्स से भरपूर
ब्रेन हेल्थ को सपोर्ट करता है
लंबे समय तक एनर्जी देता है

यह खासकर उन लोगों के लिए अच्छा है जो लाइट लेकिन न्यूट्रिशियस शुरुआत चाहते हैं।

5. आयुर्वेदिक हर्ब्स – अंदर से बैलेंस बनाने के लिए
कुछ पारंपरिक आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन भी सुबह लिए जाते हैं:

त्रिफला - पेट साफ रखने और डाइजेशन सुधारने में मदद
अश्वगंधा - स्ट्रेस और थकान कम करने में मदद

ये शरीर को अंदर से बैलेंस करने का काम करते हैं।

6. एलोवेरा जूस – गट हेल्थ के लिए
एलोवेरा जूस पेट के लिए काफी फायदेमंद है।

डाइजेस्टिव सिस्टम को सपोर्ट करता है
शरीर को डिटॉक्स करता है
गट को हील करने में मदद करता है

7. मेथी पानी – शुगर कंट्रोल के लिए
रातभर भिगोई हुई मेथी सुबह लेना खासकर डायबिटीज वालों के लिए अच्छा है।

ब्लड शुगर बैलेंस करने में मदद
मेटाबॉलिज्म सुधारता है

8. हल्दी वाला पानी – एंटी-इंफ्लेमेटरी शुरुआत
हल्दी को “गोल्डन स्पाइस” कहा जाता है।

शरीर की सूजन कम करता है
इम्युनिटी मजबूत करता है
जॉइंट हेल्थ को सपोर्ट करता है

सुबह हल्का गुनगुना हल्दी पानी शरीर को अंदर से एक्टिव करता है।

9. केसर दूध – शांत और रिलैक्स माइंड के लिए
केसर वाला दूध दिमाग को शांत करने में मदद करता है।

मूड बेहतर करता है
स्ट्रेस कम करता है
अच्छी नींद में मदद करता है

यह उन लोगों के लिए अच्छा है जिन्हें एंग्जायटी या बेचैनी रहती है।

10. जीरा-धनिया-सौंफ पानी – डाइजेशन बूस्टर
इन तीनों बीजों का पानी एक क्लासिक आयुर्वेदिक ड्रिंक है।

पेट फूलना कम करता है
डाइजेशन सुधारता है
न्यूट्रिएंट्स के अब्जॉर्प्शन को बेहतर बनाता है

11. छाछ – कूलिंग और डाइजेस्टिव ड्रिंक
छाछ एक हल्की और ठंडी ड्रिंक है जो पेट के लिए बहुत अच्छी होती है।

डाइजेशन फायर (Agni) को बैलेंस करती है
गर्मी में शरीर को ठंडक देती है
हाइड्रेशन बनाए रखती है

12. एप्पल साइडर विनेगर ड्रिंक
थोड़ी मात्रा में पानी में मिलाकर लेने से:

मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है
वेट मैनेजमेंट में मदद मिलती है
गट हेल्थ सुधरती है

13. फ्रेश जूस – विटामिन से भरपूर शुरुआत
ताजे फलों और सब्जियों के जूस:

विटामिन और एंटीऑक्सिडेंट्स देते हैं
शरीर को एनर्जी देते हैं
इम्युनिटी मजबूत करते हैं

14. ग्रीन स्मूदी – न्यूट्रिएंट पावरहाउस
ग्रीन स्मूदी एक मॉडर्न लेकिन हेल्दी ऑप्शन है।

लीफी ग्रीन्स + फल + सुपरफूड्स
आसानी से पचने वाला
दिन की हेल्दी शुरुआत

15. हर्बल काढ़े – पारंपरिक हीलिंग ड्रिंक
जैसे दशमूल, पंचकोल काढ़ा
शरीर को अंदर से मजबूत करते हैं
इम्युनिटी और बैलेंस सुधारते हैं

यह आयुर्वेद का गहरा और पारंपरिक हिस्सा हैं।

समझने वाली बात
हर ड्रिंक हर किसी के लिए सही नहीं होता।
आपकी बॉडी टाइप (वात, पित्त, कफ), आपकी हेल्थ कंडीशन और मौसम के हिसाब से ड्रिंक चुनना चाहिए।

आप सुबह उठते ही सबसे पहले क्या पीते हैं

28/03/2026

कोकिलाक्ष,तालमखाना🌹

प्राचीन काल से तालमखाना का प्रयोग कई तरह के बीमारियों के लिए औषधि के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। क्योंकि तालमखाना या कोकिलाक्ष के बीज के औषधीय गुण अनगिनत होते हैं और इसका सही मात्रा में चिकित्सक के सलाह से प्रयोग किया गया तो कई बीमारियों से राहत पाया जा सकता है।
प्राचीन काल से इसका प्रयोग वाजीकरण चिकित्सा या यौन संबंधी समस्याओं के उपचार में किया जा रहा है। आयुर्वेदीय निघण्टु एवं संहिताओं में कोकिलाक्ष का वर्णन प्राप्त मिलता है। चरक-संहिता के शुक्रशोधन महाकषाय में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।

कोकिलाक्ष मूल रूप से यौन संबंधी बीमा1रियों के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है, विशेष रूप से पुरूषों के काम शक्ति बढ़ाने और स्पर्म काउन्ट या शुक्राणु की संख्या को बढ़ाने में बहुत असरदार रूप से काम करता है। तालमखाना मीठा, अम्लिय गुण वाला, कड़वा, ठंडे प्रकृति का, पित्त को कम करने वाला, बलकारक, खाने में रुचि बढ़ाने वाला, फिसलने वाला, वात और कफ करने में सहायक होता है। यह सूजन, पाइल्स, प्यास, पित्त संबंधी समस्या, शोफ , विष, दर्द, पाण्डु या पीलिया, पेट संबंधी रोग, पेट का फूलना , मूत्र का रुकना , जलन, आमवात या गठिया, प्रमेह या मधुमेह, आँखों के बीमारियाँ तथा रक्तदोष को कम करने में मदद करता है। इसके बीज कड़वे, मधुर, ठंडे तासीर के, भारी, कमजोरी दूर करने वाले तथा गर्भ को पोषण देने वाले होते हैं।

प्रमेह या मधुमेह में फायदेमंद कोकिलाक्ष
आजकल की भाग-दौड़ और तनाव भरी जिंदगी ऐसी हो गई है कि न खाने का नियम और न ही सोने का। फल ये होता है कि लोग को मधुमेह या डायबिटीज की शिकार होते जा रहे हैं।तालमखाना के बीजों का काढ़ा बनाकर 15-30 मिली काढ़ा में मिश्री मिलाकर पिलाने से प्रमेह में फायदा मिलता है। इसके अलावा तालमखाना बीज चूर्ण में समान मात्रा में बला, गंगेरन व गोखरू चूर्ण मिलाकर रख लें। 2-4 ग्राम चूर्ण में समान मात्रा में मिश्री मिलाकर खाने से प्रमेह में लाभ होता है।

पीलिया में फायदेमंद तालमखाना
अगर आपको पीलिया हुआ है और आप इसके लक्षणों से परेशान हैं तो तालमखाना का सेवन इस तरह से कर सकते हैं। तालमखाना के पत्तों का काढ़ा बनाकर, 15-20 मिली मात्रा में पिलाने से कामला या पीलिया, पांडु या एनीमिया, जलोदर तथा मूत्रदाह का शमन होता है।

अतिसार या दस्त रोके तालमखाना
अगर ज्यादा मसालेदार खाना, पैकेज़्ड फूड या बाहर का खाना खा लेने के कारण दस्त है कि रूकने का नाम ही नहीं ले रहा तो तालमखाना का इस तरह से सेवन करें। 2-4 ग्राम तालमखाना बीज चूर्ण को दही के साथ खिलाने से अतिसार या दस्त को रोकने में मदद मिलती है।

सांस संबंधी बीमारी में लाभकारी तालमखाना
अगर किसी कारणवश सांस लेने में समस्या हो रही है तो तुरन्त आराम पाने के लिए कोकिलाक्ष का सेवन ऐसे करने से लाभ मिलता है। 2-4 ग्राम तालमखाना बीज चूर्ण में शहद तथा घी मिलाकर खिलाने से सांस लेने की तकलीफ में लाभ होता है।

तालमखाना जलोदर में फायदेमंद
पेट में जल या प्रोटीन द्रव्य के ज्यादा हो जाने के कारण पेट फूल जाता है और दर्द होने लगता है। ऐसी परेशानी में तालमखाना बहुत फायदेमंद होता है। तालमखाना की जड़ का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से जलोदर में लाभ होता है। इस काढ़ा को पीने से सूजन, मूत्रकृच्छ्र या मूत्र संबंधी समस्या, अश्मरी या पथरी, पूयमेह (गोनोरिया), मूत्राशय तथा लीवर संबंधी रोगों में लाभ मिलता है।

स्वस्थ किडनी के लिए तालमखाना का उपयोग
किडनी से सम्बंधित परेशानियों को दूर करने में भी तालमखाना फायदेमंद पाया गया है क्योंकि इसमें मूत्रल गुण होने के कारण यह मूत्र की मात्रा को बढ़ा कर किडनी को स्वस्थ रूप से कार्य करने में मदद करता है।

खांसी में फायदेमंद कोकिलाक्ष
अगर मौसम के बदलाव के कारण खांसी से परेशान है और कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है तो इसके घरेलू इलाज से आराम मिल सकता है। कोकिलाक्ष के पत्तों का चूर्ण बनाकर, 1-2 ग्राम चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से खाँसी में लाभ होता है।

कुष्ठ रोग में तालमखाना के फ़ायदे
कुष्ठ रोग अधिकतर पित्त दोष के अधिक प्रकुपित होने के कारण होते है। ऐसे में तालमखाना का प्रयोग लाभदायक होता है क्योंकि इसमें पित्त शामक गुण पाए जाते है जो कि इस रोग के लक्षणों को काम करने में सहयोग देता है।

रक्त विकार या रोगों में फायदेमंद कोकिलाक्ष
अगर रक्त संबंधी बीमारियों से आप परेशान हैं तो कोकिलाक्ष का सेवन इस तरह से कर सकते हैं। इसके लिए 1-2 ग्राम कोकिलाक्ष बीज चूर्ण का सेवन करने से रक्तज विकारों में लाभ होता है।

मूत्र संबंधी समस्या से दिलाये छुटकारा तालमखाना
मूत्र संबंधी बीमारी में बहुत तरह की समस्याएं आती हैं, जैसे- मूत्र करते वक्त दर्द या जलन होना, मूत्र रुक-रुक कर आना, मूत्र कम होना आदि। तालमखाना का सेवन इस बीमारी में बहुत ही लाभकारी साबित होता है।

गोखरू, तालमखाना तथा एरण्ड की जड़ को दूध में घिसकर पीने से यूरिन करते समय दर्द या जलन तथा पथरी में लाभ होता है। इसके अलावा 1 ग्राम तालमखाना मूल में समभाग गोखरू तथा एरण्ड की जड़ मिलाकर, दूध में पीसकर छानकर पिलाने से मूत्र करते समय दर्द, यूरिन का रुकना और पथरी आदि में लाभ होता है।

पथरी एवं मूत्रविकारों में तालमखाना का प्रयोग
पथरी एवं अन्य मूत्र विकारों में तालमखाना उपयोगी माना गया है क्योंकि इसमें मूत्रल गुण होता है। इस गुण के कारण यह मूत्र की मात्रा को बढ़ा कर मूत्रमार्ग द्वारा शरीर से पथरी आदि गन्दगी को बाहर निकालने में मदद करता है और मूत्र विकारों को दूर करता है।

कब्ज के रोगी के लिए तालमखाने के फायदे
कब्ज के रोगियों में भी तालमखाना अपने स्निग्ध गुण के कारण लाभदायक हो सकता है। इस गुण के कारण यह आँतों की रुक्षता को कम कर में जमे हुए मल को आसानी से शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है ।

स्पर्म काउन्ट बढ़ाने में गुणकारी कोकिलाक्ष
आजकल की जीवनशैली और आहार का बुरा असर हमारी लाइफ पर पड़ रहा है जिसके कारण यौन संबंधी समस्याएं होने लगी हैं। तालमखाने का इस तरह से सेवन करने पर स्पर्म काउन्ट को बढ़ाया जा सकता है।
तालमखाना बीज चूर्ण में समान मात्रा में सफेद मूसली चूर्ण तथा गोखरू चूर्ण मिलाकर, 2-4 ग्राम चूर्ण को धारोष्ण दूध के साथ पीने से शुक्राणु कम होने की समस्या ठीक होती है। इसके अलावा 5 ग्राम तालमखाना बीज चूर्ण में 5 ग्राम क्रौंच बीज चूर्ण तथा 10 ग्राम शर्करा मिला लें। 2-4 ग्राम चूर्ण को धारोष्ण दूध के साथ सेवन करें।

गठिया का दर्द करे कम तालमखाना
अक्सर उम्र बढ़ने के साथ जोड़ों में दर्द होने की परेशानी शुरू हो जाती है लेकिन तालमखाने का सेवन करने से इससे आराम मिलता है।
तालमखाना तथा गुडूची को समान मात्रा में लेकर उसका काढ़ा बनाकर, 10-20 मिली काढ़े में 500 मिग्रा पिप्पली चूर्ण मिश्रित कर सेवन करने तथा पथ्य भोजन करने से गठिया में शीघ्र लाभ होता है। इसके अलावा 5-10 मिली तालमखाना का रस तथा तालमखाना शाक का सेवन करने से वातरक्त या गाउट में लाभ होता है।

रुमेटाइड अर्थराइटिस या आमवात में फायदेमंद तालमखाना
आजकल अर्थराइटिस की समस्या उम्र देखकर नहीं होती है। दिन भर एसी में रहने के कारण या बैठकर ज्यादा काम करने के कारण किसी भी उम्र में इस बीमारी का शिकार होने लगे हैं। इससे राहत पाने के लिए तालमखाने का इस्तेमाल ऐसे कर सकते हैं। तालमखाना पञ्चाङ्ग को पीसकर लेप करने से दर्द वाले जगह पर लगाने से दर्द कम होता है।

कमर दर्द से आराम दिलाये तालमखाना

अगर दिनभर बैठकर काम करते हैं और आपके बैठने या खड़े होने का पॉश्चर सही नहीं है या दूसरे किसी बीमारी के कारण कमर में दर्द से परेशान हैं तो तालमखाने का प्रयोग ऐसे करने से जल्दी आराम मिलता है। तालमखाना के पत्तों को पीसकर लेप करने से कमर का दर्द तथा जोड़ो के दर्द में असरदार रुप से आराम मिलता है।

सूजन कम करने में असरदार कोकिलाक्ष
शरीर के किसी अंग में सूजन और दर्द होने पर कोकिलाक्ष असरदार रुप से काम करती है। गोमूत्र या जल के साथ 65-125 मिग्रा तालमखाना भस्म का सेवन करने से शोथ (सूजन) कम होता है।

अनिद्रा में फायदेमंद कोकिलाक्ष
आजकल के तनाव भरी व्यस्त जीवनशैली की देन है अनिद्रा की बीमारी, कोकिलाक्ष का सेवन बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है, काकजंघा, अपामार्ग, तालमखाना तथा सुपर्णिका का काढ़ा बनाकर, 10-20 मिली की मात्रा में पीने से अनिद्रा दूर होती है।
केवाँच तथा तालमखाने के 2-4 ग्राम फलचूर्ण में शर्करा मिलाकर गर्म दूध के साथ पीने से वाजीकरण गुणों की वृद्धि होती है।आयुर्वेद में कोकिलाक्ष के जड़, पत्ता, बीज तथा पञ्चाङ्ग का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

ये पोस्ट सिर्फ जानकारी के लिए है तालमखाना का सेवन करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह ज़रूर लें।🙏

अनु🥰

27/03/2026

Sinus Relief Ayurveda - पुराना नजला, साइनस और बार-बार छींक — समझिए असली वजह और आयुर्वेदिक समाधान - अगर आपको सुबह उठते ही लगातार छींक आती है, नाक हमेशा भरी रहती है,

सिर भारी लगता है या साइनस के कारण सिरदर्द रहता है — तो ये सिर्फ साधारण सर्दी नहीं है। ये एक क्रोनिक (पुरानी) समस्या बन चुकी होती है, जो धीरे-धीरे आपकी डेली लाइफ को भी डिस्टर्ब करने लगती है।

कई लोग दवाइयाँ, नेज़ल स्प्रे और टेबलेट्स बार-बार इस्तेमाल करते हैं, लेकिन राहत सिर्फ कुछ समय के लिए मिलती है। क्योंकि असली समस्या बाहर नहीं, अंदर के imbalance में होती है।

क्यों होता है बार-बार नजला और साइनस?
ये समस्या आमतौर पर तीन कारणों के कॉम्बिनेशन से बनती है:

1. शरीर में ज्यादा म्यूकस (बलगम) बनना
जब शरीर में कफ बढ़ता है, तो चिपचिपा म्यूकस जमा होने लगता है।

2. रेस्पिरेटरी सिस्टम की कमजोर इम्युनिटी
बार-बार इंफेक्शन होने लगते हैं और शरीर जल्दी रिकवर नहीं कर पाता।

3. साइनस में सूजन (Inflammation)
साइनस पैसेज में सूजन आ जाती है, जिससे ब्लॉकेज और प्रेशर बढ़ता है।

आयुर्वेद क्या कहता है इस बारे में?
आयुर्वेद के अनुसार, ये समस्या मुख्य रूप से कफ दोष के imbalance से जुड़ी होती है।

जब आप ये चीजें ज्यादा लेने लगते हैं:

ठंडी चीजें (कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम)
रात में दही
ज्यादा तला-भुना खाना

तो शरीर में कफ बढ़ता है और धीरे-धीरे:

म्यूकस जमा होता है
नाक बंद रहती है
साइनस में प्रेशर बनने लगता है

यही आगे चलकर इंफेक्शन और क्रोनिक साइनस का कारण बनता है।

समाधान क्या है?
अगर शुरुआत में ही ऐसे उपाय अपनाए जाएं जो:

शरीर को हल्की गर्मी दें
म्यूकस को पतला करें
सर्कुलेशन बढ़ाएं

तो शरीर खुद ही इस समस्या से बाहर आने लगता है।

पावरफुल आयुर्वेदिक काढ़ा — 6 असरदार चीजों का कॉम्बिनेशन
इस नुस्खे में 6 ऐसी जड़ी-बूटियां हैं जो मिलकर जड़ से काम करती हैं:

1. सोंठ (Dry Ginger)
नेचुरल एंटी-इंफ्लेमेटरी
म्यूकस को पतला करती है और सूजन कम करती है

2. लौंग (Clove)
एंटी-बैक्टीरियल
सांस की नली को साफ और खुला महसूस कराती है

3. सूखा धनिया (Coriander Seeds)
डिटॉक्सिफायर
शरीर की गर्मी को बैलेंस करता है और टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद करता है

4. दालचीनी (Cinnamon)
ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाती है
साइनस एरिया में हीलिंग को तेज करती है

5. तुलसी के पत्ते
इम्युनिटी बूस्टर
वायरल और एलर्जी ट्रिगर्स से बचाव

6. नागकेसर
रेस्पिरेटरी सिस्टम के लिए खास
साइनस की सूजन और नाक की कंजेशन कम करता है

काढ़ा बनाने का सही तरीका
1 कप पानी लें

आधा चम्मच सोंठ
2 लौंग
आधा चम्मच कुचला हुआ धनिया
1 छोटा टुकड़ा दालचीनी
4–5 तुलसी के पत्ते
1 चुटकी नागकेसर

इन सबको धीमी आंच पर उबालें जब तक पानी आधा न रह जाए।
फिर छानकर धीरे-धीरे पीएं।

कब और कितने दिन लेना है?
सुबह खाली पेट या रात को सोने से पहले
कम से कम 10–14 दिन
पुराने केस में 3 हफ्ते (बीच में 1 हफ्ते का गैप)

कैसे काम करता है ये काढ़ा?
यह कोई इंस्टेंट स्प्रे जैसा काम नहीं करता।
बल्कि धीरे-धीरे:

म्यूकस बनना कम करता है
जमा बलगम को पतला करता है
साइनस की सूजन कम करता है
इम्युनिटी मजबूत करता है

और सबसे जरूरी — बार-बार होने वाली समस्या की जड़ पर काम करता है

रिजल्ट जल्दी पाने के लिए जरूरी टिप्स

रात में ठंडी चीजें बिल्कुल कम करें
AC की सीधी हवा से बचें
हफ्ते में 2–3 बार भाप जरूर लें
डेयरी लेने पर अगर बलगम बढ़े तो मात्रा कम करें
रोज 2.5–3 लीटर गुनगुना पानी पिएं

ये छोटी आदतें काढ़े के असर को कई गुना बढ़ा देती हैं।

किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए

प्रेग्नेंट महिलाएं
जिनको अल्सर की समस्या है
हाई फीवर या तेजी से वजन घट रहा हो

ऐसे मामलों में पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

एक जरूरी बात जो लोग समझ नहीं पाते
क्रोनिक नजला, साइनस या बार-बार जुकाम — ये एक दिन में नहीं बनते।
तो इनका इलाज भी धीरे-धीरे ही होता है।

अगर आप:

अपनी डाइट सुधारते हैं
ये काढ़ा नियमित लेते हैं
और लाइफस्टाइल ठीक रखते हैं

तो धीरे-धीरे शरीर खुद ठीक होने लगता है।

आपको ज्यादा परेशानी किससे होती है — छींक, नाक बंद या सिरदर्द?

27/03/2026

कद्दू के बीज के फायदे
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सब्ज़ी के रूप में व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला कद्दू बहुत लोगों का प्रिय भोजन है। पकाने के लिए काटने के बाद कद्दू के बीज आमतौर पर फेंक दिए जाते हैं। हालांकि, कुछ समुदायों के लोग बीज का छिलका हटाकर उसे पीसकर छोटी मछलियों आदि के साथ ग्रेवी के रूप में बहुत स्वादिष्ट तरीके से उपयोग करते हैं। आइए जानें कद्दू के बीज हमारे स्वास्थ्य के लिए कितने लाभकारी और आवश्यक हैं।

कद्दू के बीज एक क्षारीय गुण वाले बीज हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं।
इसे आसानी से पचाने के लिए 6 घंटे पानी में भिगोकर अंकुरित कर सलाद के साथ खाया जा सकता है। मूंगफली की तरह इसे भूनकर, कच्चा या पीसकर सब्ज़ी की ग्रेवी में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

☞ कद्दू के बीज में L-ट्रिप्टोफैन होता है, जो अच्छी नींद लाने में मदद करता है और डिप्रेशन को कम करता है। यह ट्रिप्टोफैन, सेरोटोनिन और नियासिन में परिवर्तित होकर नींद में सहायता करता है।

☞ कद्दू के बीज में फाइटोस्टेरॉल्स पाए जाते हैं, जो LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल) को कम करते हैं।

☞ कद्दू के बीज खनिजों से भरपूर होते हैं। इनमें फॉस्फोरस, मैंगनीज़, मैग्नीशियम, आयरन और कॉपर जैसे आवश्यक तत्व आसानी से उपलब्ध होते हैं।

☞ यह विटामिन K का अच्छा स्रोत है।

☞ कद्दू के बीज में प्रचुर मात्रा में जिंक होता है, जो ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम में सहायक है।

☞ कद्दू के बीज विटामिन E के स्रोत हैं। 100 ग्राम बीज में लगभग 35.10 मि.ग्रा. टोकोफेरॉल पाया जाता है।

☞ यह विटामिन B समूह (थायमिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन, पैंटोथेनिक एसिड, विटामिन B-6 और फोलेट) का भी अच्छा स्रोत है।

☞ 100 ग्राम कद्दू के बीज में लगभग 30 ग्राम प्रोटीन होता है।

☞ कद्दू के बीज के सेवन से कैल्शियम ऑक्सलेट किडनी स्टोन बनने से बचाव होता है।

☞ यह फीताकृमि (टेपवर्म) और अन्य परजीवियों को दूर करने में सहायक है।

☞ कद्दू के बीज का तेल बढ़े हुए प्रोस्टेट के कारण होने वाली मूत्र संबंधी समस्याओं को कम करता है।

☞ कद्दू के बीज मधुमेह रोगियों में इंसुलिन स्राव को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।

"शुद्ध शाकाहारी खानपान से स्वस्थ जीवन"...लसोड़ा या गूंदा या लिसोड़ा की सब्जी या अचार खाया होगा लेकिन यह भी जान लें कि यह ...
24/03/2026

"शुद्ध शाकाहारी खानपान से स्वस्थ जीवन"...

लसोड़ा या गूंदा या लिसोड़ा की सब्जी या अचार खाया होगा लेकिन यह भी जान लें कि यह वनस्पति कफ जनित रोगों के लिए महाऔषधि है.

अब तो वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध किया है कि मारवाड़ी गूंदे या लसोड़े हमारे शरीर के लिए एंटीऑक्सीडेंट यानी विषैले तत्वों को बाहर निकालने के लिए महत्वपूर्ण है और इससे हमारी त्वचा भी जवां रहती है.

लिसोड़ा का वृक्ष सारे भारत में पाया जाता है. यह दो प्रकार का होता है, छोटा और बड़ा लिसोडा. गुण धर्मं दोनों के एक समान है.

भाषा भेद की दृष्टि से यह भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है हिंदी और मारवाड़ी में लिसोड़ा, मराठी और गुजराती में इसे बरगुन्द, बंगाली में बहंवार, तेलगु में चित्रनक्केरू, तमिल में नारिविली, पंजाबी में लसूडा, फारसी में सपिस्तां व अंग्रेजी में इसे सेबेस्टन नाम से जाना जाता है.

वसंत ऋतू में इसमे फूल आते है और ग्रीष्म ऋतू के अंत में फल पक जाते है. यह मधुर-कसैला, शीतल, विषनाशक, कृमि नाशक, पाचक, मूत्रल, जठराग्नि प्रदीपक, अतिसार व सब प्रकार दर्द दूर करने वाला, कफ निकालने वाला होता है. सूखी खांसी ठीक करने के लिए यह बहुत ही उपयोगी होता है.

जुकाम खांसी ठीक करने के लिए इसकी छाल का काढ़ा उपयोगी होता है. इसके फल का काढ़ा बना कर पीने से छाती में जमा हुआ सुखा कफ पिघलकर खांसी के साथ बाहर निकल जाता है इसलिए इसे श्लेष्मान्तक (संस्कृत में) भी कहा जाता है. इसके कोमल पत्ते पीस कर खाने से पतले दस्त (अतिसार) लगना बंद होकर पाचन तंत्र में सुधार हो आता है.

उपरोक्त गुणों के साथ साथ इसकी छाल को पानी में घिस कर पीस कर लेप करने से खुजली नष्ट होती है. इसके फल के लुआव में एक चुटकी मिश्री मिलाकर एक कप पानी में घोल कर पीने से पेशाब की जलन आदि मूत्र रोग ठीक होते है.

बहुवार या लसोड़ा (Cordia myxa) एक वृक्ष है जो भारतीय उपमहाद्वीप, चीन एवं विश्व के अनेक भागों में पाया जाता है। इसे हिन्दी में 'गोंदी' और 'निसोरा' भी कहते हैं। संस्कृत में 'श्लेषमातक' कहते हैं। इसके फल सुपारी के बराबर होते हैं। कच्चा लसोड़ा का साग और आचार भी बनाया जाता है। पके हुए लसोड़े मीठे होते हैं तथा इसके अन्दर गोंद की तरह चिकना और मीठा रस होता है, जो शरीर को मोटा बनाता है।

लसोड़े के पेड़ बहुत बड़े होते हैं इसके पत्ते चिकने होते हैं। दक्षिण, गुजरात और राजपूताना में लोग पान की जगह लसोड़े का उपयोग कर लेते हैं। लसोड़ा में पान की तरह ही स्वाद होता है। इसके पेड़ की तीन से चार जातियां होती है पर मुख्य दो हैं जिन्हें लमेड़ा और लसोड़ा कहते हैं। छोटे और बड़े लसोडे़ के नाम से भी यह काफी प्रसिद्ध है। लसोड़ा की लकड़ी बड़ी चिकनी और मजबूत होती है। इमारती काम के लिए इसके तख्ते बनाये जाते हैं और बन्दूक के कुन्दे में भी इसका प्रयोग होता है। इसके साथ ही अन्य कई उपयोगी वस्तुएं बनायी जाती हैं।

लसोड़ा के आयुर्वेदिक गुण :
1) यह मधुर, कसैला, शीतल, ग्राही, कृमि नाशक, विषनाशक, केशों के लिए हितकारी, अग्निवर्द्धक, पाचक, मूत्रल, स्निग्धकारी, कफ निकालने वाला, अतिसार व जलन दूर करने वाला तथा शूल और सब प्रकार के विष को नष्ट करने वाला तथा शीतवीर्य होता है
2) इसका काढ़ा कफ और पतले दस्त को दूर करने में गुणकारी होता है ।
3) लसोड़ा पेट और सीने को नर्म करता है और गले की खरखराहट व सूजन में लाभदायक है।
4) लसोड़ा पित्त के दोषों को दस्तों के रास्ते बाहर निकाल देता है और बलगम व खून के दोषों को भी दूर करता है।
5) लसोड़ा पित्त और खून की तेजी को मिटाता है और प्यास को रोकता है।
6) लसोड़ा पेशाब की जलन, बुखार, दमा और सूखी खांसी तथा छाती के दर्द को दूर करता है। इसकी कोपलों को खाने से पेशाब की जलन और सूजाक रोग मिट जाता है।
7) लसोड़ा के कच्चे फल शीतल, कषैला, पाचक और मधुर होता है। इसके उपयोग से पेट के कीड़े, दर्द, कफ, चेचक, फोड़ा, विसर्प (छोटी-छोटी फुंसियों का दल) और सभी प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं। इसके फल शीतल, मधुर, और हल्के होते हैं।

इसके पके फल मधुर, शीतल और पुष्टिकारक हैं, यह रूखे, भारी और वात को खत्म करने वाले होते हैं।

लसोड़ा के फायदे व उपचार:
1) बार-बार आने वाले ज्वर में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा की छाल का काढ़ा बनाकर 20 से लेकर 40 मिलीलीटर को सुबह और शाम सेवन करने से लाभ होता है।
२) प्रदर रोग के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा के कोमल पत्तों को पीसकर रस निकालकर पीने से प्रदर रोग और प्रमेह दोनों मिट जाते हैं।
3) दाद के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा के बीजों की मज्जा को पीसकर दाद पर लगाने से दाद मिट जाता है।
4) फोड़े-फुंसियां के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े के पत्तों की पोटली बनाकर फुंसियों पर बांधने से फुंसिया जल्दी ही ठीक हो जाती हैं।
5) गले के रोग उपचार में लसोड़ा के फायदे : लिसोड़े की छाल के काढ़े से कुल्ला करने से गले के सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
6) अतिसार के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े की छाल को पानी में घिसकर पिलाने से अतिसार ठीक होता है।
7) हैजा (कालरा) के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोडे़ की छाल को चने की छाल में पीसकर हैजा के रोगी को पिलाने से हैजा रोग में लाभ होता है।
8)दांतों का दर्द दूर करने में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े की छाल का काढ़ा बनाकर उस काढ़े से कुल्ला करने से दांतों का दर्द दूर होता है।
9) बल शक्तिवर्द्धक में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े के फलों को सुखाकर उनका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को चीनी की चाशनी में मिलाकर लड्डू बना लें। इसको खाने से शरीर मोटा होता है और कमर मजबूत जाती है।
10) शोथ (सूजन) दूर करने में में लसोड़ा के फायदे : लसौड़े की छाल को पीसकर उसका लेप आंखों पर लगाने से आंखों के शीतला के दर्द में आराम मिलता है।
सबर श्रीमूथा जी की वॉल से
#दुर्लभपौधा

#वनओषध

22/03/2026

चावल से डरना शुरू हो गया है , क्यों?- आजकल बहुत से लोग चावल का नाम सुनते ही डरने लगते हैं। कई लोग मानते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है या फिर पेट में गैस और भारीपन होने लगता है।

इसी वजह से कई लोगों ने अपनी थाली से चावल को पूरी तरह हटाना शुरू कर दिया है।

लेकिन अगर हम आयुर्वेद की बात करें तो वहां चावल को बहुत ही उत्तम और पवित्र भोजन माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार चावल ऐसा आहार है जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है, पचने में हल्का होता है और मन को भी शांत रखने में मदद करता है।

अब सवाल यह है कि अगर चावल इतना अच्छा है तो आज के समय में इसे कई समस्याओं की वजह क्यों माना जा रहा है। इसका कारण चावल नहीं बल्कि चावल पकाने और खाने का हमारा तरीका है।

समय की कमी और आधुनिक जीवनशैली की वजह से हमने वह पारंपरिक तरीका छोड़ दिया है जिससे हमारे पूर्वज चावल पकाया करते थे। अगर उसी सही तरीके को फिर से अपनाया जाए तो चावल एक बहुत ही हल्का और संतुलित भोजन बन सकता है।

चावल का सही चुनाव कैसे करें
सबसे पहला कदम है चावल का सही चुनाव करना। आज बाजार में कई तरह के चावल मिलते हैं लेकिन आयुर्वेद के अनुसार हमेशा पुराना चावल खाना बेहतर माना जाता है।

पुराना चावल वह होता है जिसे कटे हुए कम से कम एक साल हो चुके हों। नया चावल पकने पर ज्यादा चिपचिपा हो जाता है और पचने में थोड़ा भारी माना जाता है। इससे शरीर में कफ बढ़ सकता है, जिससे भारीपन, सुस्ती और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इसके विपरीत, पुराना चावल समय के साथ थोड़ा सूख जाता है और उसका स्वभाव हल्का हो जाता है। ऐसा चावल पचने में आसान होता है और शरीर को ज्यादा आराम देता है।

इसलिए जब भी चावल खरीदें तो कोशिश करें कि कम से कम एक साल पुराना चावल लें। इसके साथ ही बहुत ज्यादा पॉलिश किए हुए सफेद चावल की जगह अनपॉलिश्ड चावल जैसे सोना मसूरी या पारंपरिक बासमती चावल का चुनाव करना बेहतर रहता है क्योंकि इनमें प्राकृतिक पोषक तत्व ज्यादा सुरक्षित रहते हैं।

चावल को धोना और भिगोना क्यों जरूरी है
चावल पकाने से पहले उसे अच्छी तरह धोना और भिगोना बहुत जरूरी होता है। कई लोग चावल को बस एक बार पानी से धोकर सीधे पकाने रख देते हैं, लेकिन यह सही तरीका नहीं है।

चावल के ऊपर अतिरिक्त स्टार्च और कभी-कभी धूल या अन्य कण भी लगे होते हैं। इसलिए चावल को कम से कम तीन से चार बार साफ पानी से धोना चाहिए। धोते समय हल्के हाथों से दानों को रगड़ना चाहिए और तब तक धोना चाहिए जब तक पानी साफ न दिखने लगे।

इसके बाद धुले हुए चावल को लगभग आधे घंटे से एक घंटे तक पानी में भिगोकर रखना चाहिए। भिगोने से चावल के दाने पानी सोख लेते हैं और जल्दी पकते हैं। इससे चावल पचने में भी ज्यादा आसान हो जाता है और पेट में गैस या भारीपन की समस्या कम होती है।

चावल पकाने का सही तरीका
आजकल अधिकतर घरों में चावल प्रेशर कुकर में पकाया जाता है क्योंकि इससे समय की बचत होती है। लेकिन पारंपरिक तरीके में चावल खुले बर्तन में पकाया जाता था।

खुले बर्तन में चावल पकाने से भाप और अतिरिक्त गर्मी बाहर निकलती रहती है जिससे चावल हल्का और खिला-खिला बनता है।
इसके लिए आप मिट्टी की हांडी, पीतल के बर्तन या मोटे तले वाले स्टेनलेस स्टील के बर्तन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

खुले बर्तन में चावल पकाने की विधि
सबसे पहले, जितना चावल लेना है, उसके लगभग चार से पांच गुना पानी बर्तन में डालकर उबालने रख दें।
जब पानी में अच्छा उबाल आ जाए तो उसमें भीगा हुआ चावल डाल दें। आंच मध्यम रखें और चावल को धीरे-धीरे पकने दें।
जैसे-जैसे चावल उबलता है, वैसे-वैसे ऊपर सफेद झाग जैसा पानी दिखाई देने लगता है। यह अतिरिक्त स्टार्च होता है जिसे मांड कहा जाता है।
जब चावल लगभग पक जाए और दाने नरम होने लगें तब गैस बंद कर दें और बर्तन को थोड़ा ढककर मांड को सावधानी से बाहर निकाल दें।

मांड निकालने के बाद जो चावल बचता है, वह हल्का, खिला-खिला और पचने में आसान हो जाता है।

चावल को और संतुलित बनाने का तरीका
पके हुए चावल को और संतुलित बनाने के लिए उसमें थोड़ा सा शुद्ध देसी गाय का घी मिलाया जा सकता है।
घी चावल के रूखेपन को कम करता है और इसे पचाने में आसान बनाता है। इससे शरीर में गैस बनने की संभावना भी कम होती है।
अगर किसी को कफ या सर्दी की समस्या ज्यादा रहती है तो चावल पकाते समय पानी में एक या दो लौंग, थोड़ा हल्दी या थोड़ी काली मिर्च भी डाली जा सकती है।
अगर पेट में गैस की समस्या रहती है तो पके हुए चावल में थोड़ा भुना हुआ जीरा मिलाना भी फायदेमंद माना जाता है।

इस तरीके से बने चावल के फायदे
इस तरह से पकाए गए चावल हल्के होते हैं और खाने के बाद भारीपन या सुस्ती महसूस नहीं होती।

जब चावल खुले बर्तन में पकाकर उसका मांड निकाल दिया जाता है तो उसका ग्लाइसेमिक प्रभाव भी कम हो सकता है। इसलिए सीमित मात्रा में इस तरह का चावल डायबिटीज वाले लोग भी अपने भोजन में शामिल कर सकते हैं।

चावल हमेशा ताजा ही खाएं
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि चावल हमेशा ताजा और गर्म ही खाना चाहिए। पके हुए चावल को लंबे समय तक रखकर बाद में दोबारा गर्म करके खाना सही नहीं माना जाता।

बार-बार गर्म करने से चावल पचने में भारी हो सकता है और पेट से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए उतना ही चावल पकाएं जितना एक समय के भोजन के लिए जरूरी हो।

ताजा चावल को मूंग की दाल, सब्जियों या कढ़ी के साथ खाने से यह एक संतुलित और पोषक भोजन बन जाता है।

Conclusion
चावल अपने आप में कोई खराब भोजन नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि हम उसे किस तरह चुनते हैं, कैसे धोते हैं और किस तरीके से पकाते हैं।

अगर चावल को सही तरीके से पकाया जाए और संतुलित मात्रा में खाया जाए तो यह शरीर को ऊर्जा देने वाला, हल्का और संतुलित भोजन बन सकता है।

इसलिए चावल से डरने की बजाय उसके सही पारंपरिक तरीके को अपनाना ज्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है।

क्या आप भी चावल खाने के बाद भारीपन या नींद महसूस करते हैं?
#भारत बचाओ आंदोलन #

16/03/2026

चैत्र मास चल रहा है,चैत का महीना मधु मास होता है इस महीने में गन्ने और गन्ने से बने हुए किसी भी पदार्थ का सेवन निषेध होता है यानी मधु मास में मीठा बिल्कुल निषेध है।
रक्त के अंदर इस महीने मिठास भरी होती है यानी रक्त के अंदर मिठास की मात्रा ज्यादा होती है।
तो इस महीने में नीम की ताजी कोपल 10 -15 पत्तियां और एक से दो दाने काली मिर्च सुबह निराहार मुंह इसका सेवन करना चाहिए।
इस महीने नीम पत्र का सेवन करने से रक्त की शुद्धि होती है और रक्त में बड़ी हुई मिठास सामान्य हो जाती है।
शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बिल्कुल सही हो जाती है।
और जीवनी शक्ति बढ़ जाती है और इससे हमारे शरीर में कोई भी बाहरी संक्रमण नहीं होता है।
इसका सभी का अनुसरण करना चाहिए इससे रोग व्याधियां दूर रहती हैं वर्ष भर हमारा शरीर निरोगी रहता है।
सभी गंभीर बीमारियों से बचने के लिए चैत माह में यह प्रयोग रामबाण है।

10/03/2026

Superfood Barley - जौ: एक ऐसा सुपरफूड जो आज हर घर में होना चाहिए - आज की लाइफस्टाइल में ज्यादातर बीमारियां हमारी गलत खान-पान की आदतों और बैठे-बैठे रहने की वजह से बढ़ रही हैं।

ऐसे में कुछ पारंपरिक अनाज ऐसे हैं जिन्हें अगर हम अपनी डाइट में शामिल कर लें, तो कई समस्याओं से बचा जा सकता है। ऐसा ही एक अनाज है जौ।

जौ को आयुर्वेद में बहुत खास माना गया है। यह सिर्फ एक साधारण अनाज नहीं, बल्कि कई लाइफस्टाइल बीमारियों में उपयोगी माना गया है। पाचन से जुड़ी समस्याएं हों, मोटापा हो, कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, फैटी लिवर, हृदय रोग या शरीर में ब्लॉकेज जैसी समस्याएं—इन सब में जौ को लाभकारी बताया गया है।

संस्कृत में जौ को “यव” कहा जाता है। आयुर्वेद के कई प्राचीन ग्रंथों जैसे अष्टांग हृदय, सुश्रुत संहिता और भावप्रकाश निघंटु में इसके गुणों का विस्तार से वर्णन मिलता है।

आयुर्वेद के अनुसार जौ के गुण
आयुर्वेद में किसी भी खाद्य पदार्थ को समझने के लिए उसके गुणों को जानना जरूरी होता है। जौ के बारे में आचार्य वाग्भट्ट बताते हैं कि इसके कुछ मुख्य गुण इस प्रकार हैं।

जौ स्वभाव से थोड़ा रूखा होता है, यानी इसमें ड्राइनेस का गुण होता है। इसकी तासीर ठंडी मानी जाती है और यह थोड़ा भारी भी होता है, यानी इसे पचने में समय लग सकता है। इसके स्वाद में हल्की कसैलापन और मिठास दोनों होते हैं।

दोषों की बात करें तो जौ पित्त और कफ को शांत करने वाला माना जाता है। यानी जिन बीमारियों का संबंध पित्त और कफ से होता है, उनमें यह काफी उपयोगी हो सकता है। हालांकि यह वात को थोड़ा बढ़ा सकता है, इसलिए वात प्रकृति वाले लोगों को इसे सही तरीके से खाना चाहिए।

जौ के सेवन के सात बड़े फायदे
1. वजन और पेट की चर्बी कम करने में मदद
आजकल मोटापा और पेट की चर्बी बहुत आम समस्या बन चुकी है। आयुर्वेद के अनुसार जौ में एक खास गुण होता है जिसे लेखन गुण कहा जाता है। इसका मतलब है कि यह शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी को धीरे-धीरे कम करने में मदद करता है।

जो लोग मोटापे के साथ-साथ पित्त से जुड़ी समस्याओं जैसे शरीर में ज्यादा गर्मी, जलन, एसिडिटी या ज्यादा पसीना आने से परेशान रहते हैं, उनके लिए जौ बहुत फायदेमंद माना जाता है।

आधुनिक रिसर्च में भी यह पाया गया है कि जौ का सेवन कोलेस्ट्रॉल कम करने, डायबिटीज को कंट्रोल करने, ब्लड प्रेशर संतुलित रखने और हृदय स्वास्थ्य बेहतर करने में मदद कर सकता है।

जौ का पानी कैसे बनाएं
मोटापा या मेटाबॉलिज्म सुधारने के लिए जौ का पानी काफी लोकप्रिय उपाय है।

इसके लिए 2 से 3 चम्मच पर्ल जौ लें। इसे दो-तीन बार अच्छे से धो लें। फिर इसे लगभग चार कप पानी में डाल दें और बेहतर होगा कि इसे रात भर भिगोकर रखें।

अगले दिन इसी पानी को उबालें और तब तक उबालें जब तक चार कप पानी घटकर लगभग दो कप न रह जाए। इसके बाद इसे छान लें।
इस पानी को दिन में दो से तीन बार थोड़ा-थोड़ा करके पिया जा सकता है। चाहें तो इसमें थोड़ा सा सेंधा नमक और नींबू का रस भी मिला सकते हैं।

शरीर को मजबूती और ऊर्जा देता है
आयुर्वेद में जौ को ऐसा अनाज बताया गया है जो शरीर को स्थिरता और ताकत देता है। इसका नियमित सेवन करने से शरीर में स्टैमिना और ताकत बनी रहती है।

इसके अलावा यह मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ाने, त्वचा की रंगत सुधारने और रक्त को शुद्ध रखने में भी सहायक माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार यह आवाज को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

एक हेल्दी पारंपरिक रेसिपी
जौ को कई तरीकों से खाया जा सकता है। एक आसान और हेल्दी तरीका है जौ की खिचड़ी।

इसके लिए जौ को पहले रात भर भिगो दें। अगले दिन इसे एक पैन में पकाएं। दूसरी तरफ एक कड़ाही में थोड़ा घी गर्म करें। उसमें जीरा डालें। चाहें तो हरी मिर्च और थोड़ा प्याज भी डाल सकते हैं।

इसके बाद घर में उपलब्ध सब्जियां जैसे गाजर, खीरा या टमाटर डालें और हल्का पकाएं। अब इसमें हल्दी, धनिया पाउडर, जीरा पाउडर और स्वादानुसार मसाले डालें।

अंत में पका हुआ जौ इसमें मिलाएं, थोड़ा सेंधा नमक डालें और ऊपर से हरा धनिया डाल दें। इस तरह आपकी पौष्टिक जौ खिचड़ी तैयार हो जाती है।

2. कब्ज में राहत
जौ में प्राकृतिक रूप से ऐसे तत्व होते हैं जो मल त्याग को आसान बनाते हैं। यह मल की मात्रा बढ़ाने में भी मदद करता है।

जिन लोगों को कब्ज की समस्या रहती है या जिन्हें ठीक से पेट साफ नहीं होता, उनके लिए जौ का सेवन फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए जौ की रोटी, दलिया या खिचड़ी को डाइट में शामिल किया जा सकता है।

हालांकि जिन लोगों की प्रकृति वात प्रधान है, उन्हें जौ खाते समय थोड़ा घी जरूर लेना चाहिए, ताकि इसकी रूखाई संतुलित हो सके।

3. पेट फूलना और गैस में राहत
अगर किसी को बार-बार पेट फूलने या गैस बनने की समस्या रहती है, तो जौ का पानी मदद कर सकता है।
ऐसे में दिन में दो-तीन बार लगभग 50 से 80 मिली जौ का पानी पीना लाभकारी हो सकता है। इससे पेट की असहजता कम हो सकती है।

4. घाव और अल्सर में लाभ
आयुर्वेद में बताया गया है कि शरीर में कहीं भी घाव हो—चाहे वह मुंह के छाले हों, पेट के अल्सर हों या जलन की समस्या हो—ऐसे मामलों में जौ का सेवन लाभकारी माना जाता है।

यह पित्त को कम करता है, जिससे जलन कम होती है और घाव भरने की प्रक्रिया में मदद मिलती है। डायबिटीज के मरीजों में जहां घाव जल्दी नहीं भरते, वहां भी जौ सहायक हो सकता है।

5. डायबिटीज में सहायक
आयुर्वेद में कहा गया है कि डायबिटीज यानी प्रमेह के रोगियों के लिए जौ बहुत उपयोगी है। जौ का सत्तू बनाकर भी इसका सेवन किया जा सकता है।

इसके लिए दो से तीन चम्मच जौ सत्तू लें, उसमें पानी मिलाएं और थोड़ा सेंधा नमक तथा भुना जीरा पाउडर मिलाकर पी सकते हैं। इसे सुबह खाली पेट या दोपहर में लिया जा सकता है।

6. किडनी और मूत्र संबंधी समस्याओं में लाभ
जिन लोगों को पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब आना, यूटीआई या किडनी से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए जौ का पानी उपयोगी माना जाता है।

ऐसे मामलों में दिन में तीन-चार बार लगभग 50 से 60 मिली जौ का पानी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लिया जा सकता है।

7. कफ से जुड़ी बीमारियों में फायदा
जौ शरीर में कफ दोष को कम करने में मदद करता है। इसलिए जिन लोगों को सर्दी-जुकाम, एलर्जिक राइनाइटिस, खांसी, बलगम या अस्थमा की समस्या रहती है, उनके लिए जौ का सेवन फायदेमंद हो सकता है।

ऐसे लोगों को जौ का पानी पीने के बजाय जौ की रोटी या दलिया खाना ज्यादा बेहतर माना जाता है।

Conclusion
जौ एक ऐसा पारंपरिक अनाज है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए कई तरह से लाभकारी हो सकता है। यह पाचन सुधारने, वजन संतुलित रखने, डायबिटीज और कफ से जुड़ी समस्याओं में मदद करने के साथ-साथ शरीर को ताकत भी देता है।

अगर इसे सही तरीके से और नियमित रूप से अपनी डाइट में शामिल किया जाए, तो यह कई लाइफस्टाइल बीमारियों से बचाव में मदद कर सकता है।

क्या आपके घर में जौ इस्तेमाल होता है?

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