12/04/2026
नौकरानी बिना कपड़ों के नं #गी सोफे पर बैठी थीं, उसे इस हालत में देख आपा खो गया ओर फिर सारी रात दोनों बिस्तर पर 👇🏻
मैं 34 साल का हूँ, दिल्ली के एक पॉश इलाके में रहता हूँ। पत्नी बिजनेस के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहती है। घर की देखभाल के लिए रीता है, जो 24 साल की एक शांत और मेहनती लड़की है।
उस रात बारिश हो रही थी। दफ्तर की फाइलों और मीटिंग्स ने मेरा सिर चकरा दिया था। रात के 11 बज रहे थे। जैसे ही मैंने चाबी घुमाई और अंदर कदम रखा, लिविंग रूम की मद्धम रोशनी में रीता सोफे पर बैठी थी।
वह अपनी रोज की साड़ी में नहीं थी। उसने एक गहरी नीली नाइटी पहन रखी थी। उसकी आंखें सीधे मेरी आंखों में थीं।
"साहब, आप आ गए?" उसकी आवाज में एक अजीब सी खनक थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।
मैं ठिठक गया। "रीता? तुम अभी तक जागी हो? और ये... तुम इस तरह यहाँ क्यों बैठी हो?"
वह उठी और धीरे-धीरे चलकर मेरे पास आई। उसके चलने के अंदाज में एक ऐसी बेबाकी थी जिसने मेरे दिल की धड़कन तेज कर दी।
उसने मेरा बैग हाथ से ले लिया और उसे मेज पर रखते हुए बोली,
"आज रात मैं आपकी नौकरानी बनकर नहीं रहना चाहती, सर।"
मेरे गले में जैसे कुछ फंस गया। "क्या मतलब है तुम्हारा?" मैंने कांपती आवाज में पूछा।
वह मेरे और करीब आई, इतनी करीब कि मैं उसके परफ्यूम की महक महसूस कर सकता था। उसने अपना हाथ धीरे से मेरे सीने पर रखा और फुसफुसाकर बोली,
"आज रात मैं आपकी होना चाहती हूँ। सिर्फ आपकी।"
उसकी बातें किसी तीखे बाण की तरह मेरे जज्बातों को छेद रही थीं। मैं जानता था यह गलत है, मैं जानता था कि मुझे उसे रोकना चाहिए।
"रीता, तुम होश में तो हो? देखो, तुम जाओ अपने कमरे में," मैंने कोशिश की कि मैं सख्त दिखूँ।
लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने मेरी आंखों में देखते हुए कहा,
"डर रहे हैं आप? या खुद से भाग रहे हैं? मैं जानती हूँ आप भी अकेले हैं और मैं भी। क्यों न इस अकेलेपन को आज खत्म कर दें?"
उसकी तीखी बातें और उसकी नशीली आंखों का जादू मुझ पर चलने लगा। मेरा दिमाग मना कर रहा था, पर दिल की धड़कनें बेकाबू हो चुकी थीं। सन्नाटे में सिर्फ हमारी सांसों की आवाज आ रही थी।
तभी उसने मेरा हाथ पकड़कर अपने चेहरे पर रखा। उस स्पर्श ने जैसे मुझमें बिजली दौड़ा दी। मैंने अपना आपा खो दिया। मेरा संयम टूटकर बिखर गया।
मैंने उसे अपनी बा #हों में भर लिया। वह जैसे इसी पल का इंतजार कर रही थी।
"सर..." उसने एक लंबी सांस ली।
उस रात घर की दीवारें भी खामोश हो गईं। हम दोनों एक-दूसरे की बा #हों में बंधे हुए सीढ़ियां चढ़कर बेडरूम तक पहुंचे। वह रात साधारण नहीं थी। वह रात थी बरसों की दबी हुई इच्छाओं के ज्वालामुखी के फटने की।
जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, हम वक्त और दुनिया, दोनों को भूलते जा रहे थे। एक ही बिस्तर पर, एक ही चादर के नीचे, वह पूरी रात सिमट गई।
जब सुबह सूरज की पहली किरण कमरे के पर्दे चीरकर अंदर आई, तो मेरी नींद खुली।
मेरे बगल में रीता सो रही थी। कल रात जो हुआ, वह किसी सपने जैसा था।
लेकिन जैसे ही मुझे अपनी स्थिति का एहसास हुआ, मेरे हाथ-पांव ठंडे पड़ गए।
हम दोनों बिना कपड़ों के एक ही चादर में लिपटे हुए थे।
होश आते ही पहला ख्याल आया—"यह मैंने क्या कर दिया?"
लेकिन तभी रीता ने अपनी आँखें खोलीं और मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा।
"साहब, पछता रहे हैं क्या?" उसने शरारत भरी आवाज़ में पूछा।
उसकी मासूमियत और उस रात की यादों ने मेरे सारे डर को एक पल में मिटा दिया।
मैंने ऑफिस फोन किया और बीमारी का बहाना बनाकर छुट्टी ले ली।
वह पूरा दिन हमने उसी कमरे में गुजारा, बातों और मस्ती में वक्त का पता ही नहीं चला।
दोपहर के 3 बज रहे थे। हम साथ में लंच कर रहे थे कि तभी मेरे फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर मेरी पत्नी 'अंजलि' का नाम चमक रहा था।
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। रीता का चेहरा भी अचानक सफेद पड़ गया।
मैंने कांपते हाथों से फोन उठाया।
"हेलो अंजलि?"
"सुनो, मैं घर पहुँचने वाली हूँ। फ्लाइट जल्दी लैंड हो गई, मैं टैक्सी में हूँ। 10 मिनट में घर पहुँच जाऊँगी!" अंजलि ने उत्साह में कहा और फोन काट दिया।
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
"रीता! अंजलि आ रही है! जल्दी जाओ यहाँ से!" मैं चिल्लाया।
रीता जल्दी से उठी, अपनी नाइटी संभाली और बिना कुछ बोले अपने कमरे की तरफ भागी।
मैंने जल्दी-जल्दी बिस्तर ठीक किया, कपड़े पहने और घर को ऐसे व्यवस्थित किया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
ठीक 10 मिनट बाद डोरबेल बजी।
अंजलि अंदर आई, उसने मुझे गले लगाया और बोली, "तुम घर पर हो? छुट्टी ली क्या?"
"हाँ, थोड़ी तबीयत ठीक नहीं थी," मैंने झूठ बोला।
अंजलि सोफे पर बैठी और उसने रीता को आवाज़ दी।
"रीता! जरा पानी लाना और मेरा बैग ऊपर रख दो।"
रीता कमरे से बाहर आई। वह अब अपनी पुरानी साधारण साड़ी में थी।
उसका सिर झुका हुआ था। उसने चुपचाप पानी का गिलास अंजलि को दिया।
तभी अंजलि ने कुछ ऐसा कहा कि मेरे कानों में गरम तेल पड़ गया।
"रीता, तुमने इसे बताया या नहीं?" अंजलि ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
मैं हक्का-बक्का रह गया। "क्या... क्या बताना था?"
अंजलि मुस्कुराई और मेरा हाथ पकड़कर बोली,
"दरअसल, रीता मेरी दूर की रिश्तेदार है। इसके घर की हालत खराब थी, इसलिए मैंने इसे यहाँ काम पर रखा। लेकिन कल इसका रिश्ता पक्का हो गया है।"
मैं चुप रहा, पसीने से तर-बतर।
अंजलि आगे बोली,
"और सबसे बड़ी बात... रीता ने कल मुझे फोन करके बताया था कि उसे शक है कि तुम घर में अकेले उदास हो, इसलिए वह कल रात तुम्हारे लिए कुछ 'खास' प्लान कर रही थी ताकि तुम खुश रहो। क्या उसने तुम्हें सरप्राइज दिया?"
मेरे गले में शब्द सूख गए।
तभी मेरा ध्यान मेज पर रखे रीता के फोन पर गया।
उस पर एक मैसेज फ्लैश हुआ, जो अंजलि ने ही भेजा था:
**"काम हो गया? क्या उसने जाल में फंसकर गलती की?"**
अचानक मुझे समझ आया। यह कोई इत्तेफाक नहीं था।
अंजलि मुझसे तलाक चाहती थी और उसे सबूत चाहिए थे।
ऊपर वाले कमरे में लगा छुपा हुआ कैमरा अब सब कुछ रिकॉर्ड कर चुका था।
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Annu rawat