03/09/2026
मित्रों नमस्कार, आज #दक्षिण दिशा में #मुख्यद्वार संबंधित फलाफल की कुछ चर्चा करते हैं।
पिछले पोस्टों में उत्तर एवं पूर्व दिशा में मुख्यद्वार संबंधित फलाफल बताया गया है।
#ग्रन्थों में बताया गया है कि द्वार निर्णय हेतु पूर्व दिशा की गणना ईशान कोण से, दक्षिण दिशा की गणना अग्नि कोण से, पश्चिम दिशा की गणना नैरित्य कोण से और उत्तर दिशा की गणना वायव्य कोण से करनी चाहिए।
पुर्वाणयैशान्यां याम्याग्नेय्यां दक्षिणानि जानीयात्।
द्वाराणि नैर्रित्त्यादीनि पश्चिमान्युत्तराणि वायोश्च।।
( #वास्तुसार, बृ. दै. रं., #बृहद् वा. माला )
वास्तुविद्या में दक्षिण दिशा संबंधित द्वार प्रभाव चित्र में लिखा है।
जिसमें पहला पद पावक(अग्नि) का है जिसे कहीं कहीं पर अनल,अनिल,अग्नि भी बताया गया है।
पहले पद(अग्नि) पर मुख्यद्वार होने से गृह स्वामी को मृत्यु तुल्य कष्ट बताया गया है।
विमर्श :- पहले भी बताया है कि शास्त्रों में सिर्फ शरीर से प्राण निकलना ही मृत्यु नहीं है,इसके आठ प्रकार बताए गए हैं।
व्यथा दुःखं भयं लज्जा रोगः शोकस्तथैव च।
मरणश्च अवमानश्च मृत्युरष्टविधः स्मृतः।।
(बृहद दै. रं.)
अर्थात व्यथा, दुःख,भय, लज्जा,रोग,शोक,कलंक आदि मृत्यु के ही स्वरूप हैं।
यह अग्नि (साहस,सामर्थ्य, शक्ति)का प्रमुख स्थान है, जो द्वार स्थिति के कारण कटा हुआ जैसा प्रभावी हो जाता है।
(इससे शिरा,वंश, मर्म पीड़ित होने की संभावना रहती है)
शास्त्रों में निर्देश मिलता है कि भवन का कोई भी कोण कटा हुआ नहीं होना चाहिए।
दूसरा पद है पूषा का इसका प्रभाव भी नाश(हानि) एवं दारुण कष्ट बताया गया है।
तीसरा पद है वितथ का यहां पर मुख्यद्वार का प्रभाव कष्टकारी बताया गया है।
विमर्श:-हालांकि अन्य ग्रंथ,पुराणों में अन्य प्रभाव भी बताया गया है जिसके बारे में भी चर्चा करेंगे।
Upendra Vastu Resolve
चौथा पद है गृहक्षत का जो सभी प्रकार से संपत्ति देने वाला बताया गया है।
पांचवां पद है यम का जिसका प्रभाव सर्वनाश बताया गया है।
छठा पद है गंधर्व का जिसका प्रभाव कर्मों में वृद्धि करता है बताया गया है।
सातवां पद है भृंगराज का जिसका प्रभाव पशुधन नाश बताया गया है।
और आठवां पद है मृगा का जिसका प्रभाव मरण एवं संतान हानि बताया गया है।
अन्य ग्रन्थों में दक्षिण दिशा में मुख्यद्वार संबंधित फलाफल को देखने का प्रयास करते हैं।
अल्पसुतत्वं प्रैष्यं नीचत्वं भक्ष्यपान सुतवृद्धिः।
रौद्रं कृतघ्नमधनं सुतवीर्यघ्नं च याम्येन।।
( यह समरांगन सूत्रधार,वास्तु रत्नाकर,वास्तु रत्नावली, वास्तुसार, बृहद संहिता आदि ग्रन्थों में)
अग्निस्थाने वह्निभयं पूष्णि च