11/06/2020
करोना के बहाने एक बार हमें जिंदगी के विभिन्न पहलुओं का सिंहावलोकन करने की जरूरत है। इस कड़ी में आज नेटवर्क मार्केटिंग को जानने की कोशिश कर रहा हूं। निश्चित तौर पर सहज चीजें सबसे मुश्किल होती है। जैसे सत्य, सामाजिक जिम्मेदारी, कर्त्तव्य। सामाजिक विकास के मुद्दों पर कार्य करते हए इनका एहसास तीव्रता से और गहरे तौर पर होता है। कालेज के बाद जब सामाजिक विकास के लिए कार्य करने का सोचा तो शुरुआती 3-4 वर्षों के उपरांत ही औजार के तौर पर स्वयं सहायता समूह काफी प्रभावी लगा। लेकिन स्वयं सहायता समूहों की सफलता पर बिहार और कई पिछड़े प्रदेशों में सवालिया निशान था। समय के साथ पता चला कि स्वयं सहायता समूह जैसी सहज और सरल चीजें हमें कठिन लगती हैं , क्योंकि सहजता और सरलता हमारे ईगो को संतुष्ट नहीं पाती है और हम मुश्किल बनाने में जुट जाते हैं। ठीक इसी तरह हमने करोना के साथ किया, इसे स़भालना बहुत ही सरल था बस संक्रमण को रोकने के उपाय अपनाने थे, लेकिन हम उलझ गए बाकी चीजों में और फलस्वरुप 111 दिनों में हमने 250000 का आंकड़ा पार कर लिया और अब तो 3 लाख के करीब हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन कितने सही थे ... कि लगभग 100 वर्ष पहले इसी सहज गणित को दुनिया का आठवां अजूबा कहा था। यही गणित है आधार नेटवर्क मार्केटिंग का और करोना का। और यह कैसे हो सकता है कि करोना का गणित सही बैठे और मेरा और आपका ग़लत। अगर हमारी और आपकी गलती और अपने स्वभाव से करोना बढ़ सकता है तो हमारी आपकी मेहनत से नेटवर्क मार्केटिंग भी सफल हो सकता है। बशर्ते कि हम अपना ईगो पहले छोटा कर लें और मेहनत को कई गुना बढ़ा लें। करोना को रोकने के लिए सहज कोशिश करें और नेटवर्क मार्केटिंग को सहजता से आत्मसात कर लें। .... आओ, सोच बदलें, साथ आएं और मोदीकेयर करें।